कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २१६ ) बीजक कबीरदास ।
हिन्दू ब्रत एकादशि साधैं दूध सिंघाड़ा सेती ।
अनको त्यागैं मन नहिं हटकैं पार न करें सगोती ॥ २ ॥
तुरुक रोजा नमाज गुजारैं विसमिल बाँँग पुकारैं ।
उनकी भिश्त कहांते होइहै सांझै मुर्ग़ीमारैं ॥ ३ ॥
हिन्दू जे हैं ते अन्नको त्यागिकै एकादशी व्रत साधै हैं कहे उपासे रहै हैं
औ फलाहार करै हैं । औ बिहान भये नानाप्रकारके व्यंजन बनाइकै सगे जे हैं
गोतीभाई तिनको लैके पारण करै हैं औ मनको नहीं हटकै हैं कहेदशौ इन्द्रिय
ग्यारहौं मनको नहीं हटकै हैं अर्थात् यह एकादशी नहीं करै हैं । अथवा जैसे
सगोतीमें कहे सगाई में अर्थात् जैसे बिवाहमें जाफतमें खाय हैं तैसे पारण
करै हैं ॥२॥ औ मुसल्मान रोजा रहै हैं औ नमाज गुजारैहैं औ बिसमिल्लाको
बांग दैके पुकारैं हैं औ सांझको मुर्गी मारिके पोलाव बनाइ खाय हैं सो कहोतो
उनकी भिश्त कैसे होइगी ॥ ३ ॥
हिन्दू किं दया मेहर तुरुकनकी दूनों घट सों त्यागी ।
वे हलाल वे झटका मारैं आगि दुनों घर लागी ॥ ४ ॥
हिन्दूकी दया तुरुककी मिहर है जो हिन्दू दया करत तौ यम ते छूटत
अरु जो मुसल्मान मिहर करत तौ यमते छूटत । सो ये दोऊ दया औ मिहर-
को आपने घटते त्यागि दियो है मुसल्मान कहैं हैं कि गलेकी रगसेभी अल्लाह
नगीचहै औ घट घट में मौजूदहै औ गला काटतई हैं सो गौ सेइकै गला
काटते हैं औ हिन्दू कहैं हैं कि ब्रह्मसर्वत्र पूर्ण है औ झटका मारैं हैं कहैं मूड़
काटिडारै हैं सोऊ ब्रह्म की ही गलाकाटै हैं या प्रकार ते कबीर जी कहै हैं कि
दूनों घरमें आगिलगी है यह अज्ञानरूपी आगि दूनों की बुद्धिको दाहे
डारै है ॥ ४ ॥
हिंदू तुरुक कि एक राह है सतगुरु इहै बताई ।
कहहि कबीर सुनो हो संतो राम न कहौ खोदाई ॥ ५ ॥
हिन्दू मुसल्मानकी एकै राहहै राम न कह्यो खोदाइ कह्यो खुदा न कह्यो
राम कह्यो । नाम सब वही बादशाहके हैं सो वह बादशाहको हिन्दू तुरुककी