कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 274, कुल 766 में से
संदर्भ में पढ़ें( २२४ ) बीजक कबीरदास ।
कों सेमरके शाखा बढ़ाये फूल अनूपम बानी ।
केतिक चात्रिक लागि रहेहैं चाखत रुवा उड़ानी ॥ २ ॥
कहा खजूर बड़ाई तेरी फल कोई नहिं पावै।
ग्रीषम ऋतु जब आय तुलानी छाया काम न आवै ॥ ३ ॥
अपना चतुर और को सिखवै कामिन कनक सयानी ।
कहै कबीर सुनो हो संतो ! रामचरण रति मानी ॥ ४ ॥
राम तेरी माया ढुंदि मचावैं।
गति मति वाकी समझि परै नहिं सुर नर मुनिहिं नचावै॥१॥
श्रीकबीरजी कहै हैं कि, हे जीवो ! राममें जो तिहारी माया जो कपट सो
दुन्दिमचावै है। कैसीमायाहै कि, जाकी गति मति नहीं समझिपरै, सुरनर
मुनि जे हैं तिनहूं को नचावै। अर्थात् उनहूंकॊ लागिहै। सो साहब को न
जानिबो रूपकारण जगत्को आदि मंगलमें कहि आये हैं ॥ १ ॥
का सेमरके शाखा बढ़ये फूल अनूपम बानी ।
केतिक चात्रिक लागि रहेहैं चाखत रुवा उड़ानी ॥ २ ॥
सो हेजीवो ! तुम द्वन्दमाया को त्यागौ साहबको जानो या संसाररूप सेम-
रको वृक्ष तामें नाना बासना नाना देवतनकी उपासनारूप शाखा बढ़ाये कहाहै।
तैनेवृक्षमें अनुपम कहे साहब के जाननेवारे विशेषकर ज्ञानवारे जो नहीं कह्यो
ऐसी गुरुवनकी वाणीसोई फूलहै । ताहीते भयो जो धोखा ब्रह्मको ज्ञान सोई-
फलहै। तामे केत कौ चात्रिकरूप जीवलागि रहेहैं। यहां चात्रिकै कह्यो और
पक्षी न कह्यो, सो चात्रिक पियासो रहै है और इनहूंके मुक्तिकी चाह रहैहै।
पक्षी रस नहीं पावै है इन मुक्ति नहीं पावै है। चाखतमें रुवा उड़ै है पक्षीके
जीभमें लपटिजाय है, जीभहूको रससूखि जायहै। यहां वा ज्ञानको जब अनु-
१ क्या।