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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 276

( २२६ ) बीजक कबीरदास ।
साखी देकै जो कह्यो ताकोहेतु यहहै कि, संत समुझेंगे कि, सांच कहैं हैं कि,
झूठ कहैं हैं। अथवा हे जीवो ! मेरो सिखावन सुनो-श्रीरामचन्द्रके चरणमें
रतिमानिके जैसे, सब भयो है, नानामत कियो है, तैसे, एकबार मेरो वचन
सुनि रामचरणमें रतिमानिके संत होउ । व्यंग्य यहहै कि, जो संतहोउगे तो
जननमरणते रहित हैजाउगे औरी भांति न छूटोगे । अथवा अपना चतुर
और को सिखवै कहे अपनो चतुर नहीं है मायाही में परे हैं और और को
कनक कामिनीमें सयानी कहे विचारकरावै है कि, कनक कामिनीरूप मायाको
बिचारकै देख्यो या मिथ्या है । सो जो आप चतुर नहीं भये कनककामिनी
नहीं त्यागे तो उनके उपदेशते कनककामिनी माया कब त्यागेंगे ॥ ४ ॥
इति तेरहवां शब्द समाप्त ।
अथ चौदहवांशब्द ॥ १४ ॥
रामरा संशय गांठि न छूटै। ताते पकरि पकरि यमलूटै॥१॥
ह्वै मसकीन कुलीन कहावो तुम योगी संन्यासी
ज्ञानी गुणी शूर कवि दाता ई मति काहु न नासी ॥ २ ॥
स्मृति वेद पुराण पढै सब अनुभवभाव न दरशै ।
लोह हिरण्य होय धौ कैसे जो नहि पारस परशै ॥ ३ ॥
जियत न तरे मुये का तरिहौ जियतै जो न तरै ।
गहि परतीति कीन जिन जासों सोई तहँ मरै ॥ ४ ॥
जो कछु कियो ज्ञान अज्ञाना सोई समुझु सयाना ।
कहै कबीर तासों का कहिये देखत दृष्टि भुलाना ॥ ५ ॥
राम रा संशय गांठि न छूटै। ताते पकरि पकरि यमलूटै १