कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २२८ ) बीजक कबीरदास ।
द्वै जायहैं तौने साहबसों जो कोई (जहैं साहबको मत गहिकै) परतीति कहैं
बिश्वासकीनहै सो जानतहै कहे संसारहीमें अमर है गयो है ॥ ४ ॥ सो कबी-
रजी कहैं हैं कि, ये जीव ज्ञान करैं हैं कि अज्ञान करैं हैं ताहीको सब कुछ
मानिकै अपने को सयान मानैहै तिनसों कहा कहिये जो अपनी दृष्टिते देखत
देखत भुलायदियो । स्मृतिवेद पुराण चक्रवर्ती परमपुरुष श्रीरामचन्द्रहीको कहैं
हैं, उन्हींके भक्त हनुमान् विभीषणादिक अमर भयेहैं, सो देखतेहैं औ यह नहीं
समुझैं हैं कि, सबके मालिक बादशाह श्रीरामचन्द्र हैं, इनहीके छोड़ाये छूटैंगे
औरके छोडाये न छूटैंगे ॥ ५ ॥
इति चौदहवां शब्द समाप्त ।
अथ पन्द्रहवां शब्द ॥ १५ ॥
रामरा चली विनावन माहो । घर छोड़ेजात जोलाहो॥१॥
गज नौ गज दश गज उनइसकी पुरिया एक तनाई ।
सात सूत नौ गाड़ बहत्तरि पाट लागु अधिकाई ॥ २ ॥
तापट तूल न गजन अमाई पैसन सेर अढ़ाई ।
तामें घटै बढ़ै रतिओ नहिं कर कच कर घरहाई ॥ ३ ॥
नित उठि बैठ खसम सों बरबस तापर लाग तिहाई ।
भीनी पुरिया काम न आवै जोलहा चला रिसाई ॥ ४ ॥
कहै कबीर सुनोहो संतो जिन्ह यह सृष्टि उपाई ।
छोड़ि पसार रामभजु बौरे भवसागर कठिनाई ॥ ५ ॥
रामरा चली विनावन माहो । घर छोड़ जात जोलाहो॥१॥
रामरा कहै रा जिनको मराहै अर्थात् रकार बीजको जिनके अभावहै साह-
बको नहीं जानें । ऐसेजे समष्टिजीव तिनके इहां माहो है कारणरूपा माया
सोबिनावनको कहे बिनवावनको चली अर्थात् जगत् बनवाइबेको चली । इहां