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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 284, कुल 766 में से

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पृष्ठ 284

( २६४ ) बीजक कबीरदास ।
क्षर सुधिहोय" तौ यह अर्थ है कि, जो एक आत्माही को सत्य मानोगे तों
साहब को बिना अक्षर कहे बिना अनादि माने सुधि कहे सुरति तुम को कैसे
होयगी । औ कौनसुरति देयगो । औ सुधिबिन कहे जो सुधि न भई तो सहज
कहे सो हंसो कैसे होयगो । तेहिते बिनाज्ञाता को ज्ञानकरु कहे अबैते अपने
को ज्ञाता मानि रहे हैं कि, मैं अपनो बिचारकरत करत औ सबको निषेध
करत करत जो पदार्थ रहि जाय है ताहीको मानिलेउंगो कि, यहीतत्व है सों
यह भ्रमछांड़ो, तेरेजानेते साहब न जानिपरेगे साहब मनबचन क परे हैं । सो
जौन बिना ज्ञाताको ज्ञान है जो साहब देय हैं काहेते कि, वह ज्ञान काहूकों
नहीं जाने है जब साहब आपनो रूपदेय हैं, तब वह रूपते जानि परै, साहब
हीके रूपको जानोपरै है । वाको ज्ञाता कोई नहीं है । सो ज्ञानकरु अर्थात्
रकार ध्वनि श्रवण रूप साधनकरु तब साहबई तोको हंसस्वरूपः दैके आपने
नामरूप लीलाधामको स्फुरित करायदैयेंगे । तौने हंसस्वरूप की आँखिते श्रवण
ते साहब को देखु औ साहबके गुणसुनु । सो कबीरजी कहै हैं कि, यहि तरह
ते जाके बिना ज्ञाताको ज्ञान है सोई मेरोज़न है । अर्थात् जौनलोक में
हमारी स्थिति है तौनही लोकको वहजन है बिनाज्ञाताकोज्ञान कौन कहावै है
जो साहब देय हैं तामेंप्रमाण ॥ "तेषांसततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि बुद्धियोगं तं येनमामुपयांतितें " ॥ इतिगीतायाम् ॥ ५ ॥
इति सोलहवां शब्द समाप्त ।
अथ सत्रहवां शब्द ॥ १७ ॥
राम गाइ औरन समुझावै हरि जाने बिन विकल फिरै ॥ १॥
जा मुख वेद गायत्री उच्चरै ता सु वचन संसार तरै ।
जाक पाँव जगत उठि लागै सो ब्राह्मण जिउ वद्ध करै ॥ २॥
अपना ऊंच नीच घर भोजन ग्रीण कर्म करि उदर भरै ।
ग्रहण अमावस ढुकि ढुकि माँगै कर दीपकलिये कूपपरै॥३॥