कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
रमैनी । ( १७५ )
तौलि जाइहै कि हलुकै गरुहै अर्थात् अहंब्रह्म मानिबो तो धोखाहै जो कछु-
होइ तोकहिजाइ औतोलि जाइ ॥३॥ जौनेलोकमें न भूखह न तृषाहै न धूपहै
न छांहीं है न दुःखहै न सुखहै तौने साहबके लोकमें प्रकाशरूप ब्रह्मरहैहै॥४॥
साखी ॥ अपरमपरअरूपमगुरंगी, नहिंतेहिसंख्याआहि ॥
कहहिंकबीर पुकारिकै, अद्भुत कहिये ताहि ॥५॥
वह साहबको लोक परमरूपहै ताको प्रकाश जो है वह ब्रह्म सो परमपुरुष
है कहे परम नहीं है तौनेको आपनेहीको मानिबो जो है कि वह ब्रह्महमीं हैं
सो धोखाहै तौनेके मगमरगे जीवहैं तिनकी संख्या नहीं है अर्थात् वही प्रका-
शमें भरेरहे जे समष्टि जीवह ते व्यष्टि ह्वैगये हैं तिनकी संख्या नहीं है सो
कबीर जी पुकारिकै कहै हैं कि आपही कल्पना करिकै वह प्रकाश रूप ब्रह्म
कोमान्यो कि वह ब्रह्ममैं हौं सो वह तो लोकप्रकाशहै हे जीव! वहप्रकाशब्रह्म नहीं
ह्वैसकैहै यही धोखाम जीव बूड़ो जाइ है यह बड़ो आश्चर्य हैं औ जोयह
पाठहोइ ॥ अपरमपारै परमगुरु ज्ञानरूप बहुआहि ॥ तौ यह अर्थ है अपरम
जोहै प्रकाशरूप ब्रह्म ताहू के पारजोहै परमलोक जाको प्रकाश वह ब्रह्महै
ताको परमश्रेष्ठकहेमालिक जे परमपुरुष श्रीरामचन्द्रहैं तिनको न जान्यो वहजो
है प्रकाशब्रह्म ताको जोज्ञान कियो कि ब्रह्ममहौं वहै जो है धोखा ब्रह्म तेहिते
बहुआहि कहे जीव बहुत ह्वैगये काहेते कि ज्ञानबहुतहै ज्ञानीज्ञान करिकै ब्रह्म
मानैं हैं औ योगी जेहैं ते ज्योतिरूप में आत्माको मिलाइकै ब्रह्म मानै हैं
इत्यादिक नानारूप करिकै ऐक्यमानै हैं औ और सगुण उपासनावारे कोई
चतुर्भुज कोई अष्टभुज कोई देबी कोई गणेश कोई सर्य इत्यादिकनमें ऐक्य-
मानैं हैं ज्ञानकरिकै तेहिते ज्ञाननाना हैं औ साहब तो मनबचनके परे वह लोक
में एकही बनो है ॥ ५ ॥
इति सतहत्तरवीं रमैनी समाप्त ।
( १७६ ) बीजक कबीरदास ।
अथ अठहत्तरवीं रमैनी ।
चौपाई ।
मानुष मन्म चूकेजगमाझी । यहितनकेर बहुतहैं साझी ॥ १ ॥
तातजननिकहै हमरोवाला । स्वारथलागि कीन्हप्रतिपाला २
कामिनिकहै मोर पिय आही।वाघिनिरूप गरासै चाही॥ ३॥
पुत्र कलत्र रहैं लवलाये । जंबुक नाईं रह मुँहवाये ॥ ४ ॥
काकगीध दोउ मरण विचारैं। शूकरश्वान दोउ पंथनिहारैं ५
धरती कहै मोहिं मिलिजाई । पवन कहै मैं लेब उड़ाई ॥६॥
अग्नि कहै मैं ई तन जारौं।सो न कहै जो जरत उबारौं॥७॥
ज्यहि घर को घरकहै गवारे । सो बैरी है गले तुम्हारे ॥ ८ ॥
सो तन तुम आपनकैकजानी।विषयस्वरूप भुले अज्ञानी॥९॥
साखी ॥ यतने तनके साझिया, जन्मोभरि दुखपाय ॥
चेतत नाहीं बावरे, मोर मोर गोहराय ॥ १० ॥
मानुष जन्म चुकेजगमाझी । यहितनकेरबहुतहसाझी ॥ १ ॥
तातजननिकहैहमरोवाला । स्वारथलागिकीन्हप्रतिपाला २
कामिनिकहैमोरपियआही। वाघिनिरूपगरासैचाही ॥ ३ ॥
हे जीव ! तैं मानुष जन्मजगतके बीच में पायक चूकिगयो साहब को भजन
न कियो या तनके साझिया बहुत हैं ॥ १ ॥ औमाता पिता कहैं हैं हमारों
पुत्रह आपने अर्थ में लगिकै प्रतिपालकरै है ॥ २ ॥ औ कामिनि जो परस्त्री
है सो कहै है हमारो बड़ो प्यारो पति है बाघिनिरूप रति समय में गरासि-
बोई चाहै है अथवा वाके संगते मूड़हू काटो जायहै ॥ ३ ॥
रमैनी । ( १७७ )
पुत्र कलत्र रहें लवलाये । जम्बुकनाई रहमुहबाये ॥ ४ ॥
कागगीधदोउमरणविचारै । शूकरश्वानदोउपंथनिहारै ॥५॥
धरतीकहै मोहिंमिलि जाई। पवन कहै मैलेव उड़ाई ॥ ६ ॥
अगनिकहै मैं ई तन जारों । सोनकहै जोजरतउवारों ॥७॥
पुत्र कलत्र जो घरकी स्त्री को लालच लगाये रहे हैं धनलेवे की औ वाको
उनकी चिंता म मांससुखान जात है जैसे सियार मांस खावेको मुंहफारे रहे है
तैसे वोऊहैं ॥४॥ औकाग जेहैं गीधजे हैं शूकर जेहैं श्वान जेहैं ते मरनको पंथ
तेरो निहारै हैंया विचारै हैं कि जो मरै तौ हम मांसखायँ॥ ५॥औधरती कहै है
कि मोहिं में मिलिजाइ पवन कहै है कि याकी खाक मैं उड़ाय लैजाउँ॥ ६॥औ
अग्नि चाहै है कि याके तनको जारिडारों सो या बात कोई नहीं कहै है जाते
जरत में उबार होई बचिजाय ॥ ७ ॥
जेहिघरको घरकहै गवारे । सो वैरी है गले तुम्हारे ॥ ८ ॥
सोतनतुमआपन कै जानी विषयस्वरूपभुलेअज्ञानी ॥६॥
साखी । यतने तनके साझिया, जन्मो भरिदुखपाय ॥
चेतत नाहीं बावरे मोर, मोर गोहराय ॥ १० ॥
जेहि घरको शरीरको तू कहै है कि मेरो है सोघरशरीर तेरेगले की बेरीकहै
फांसीहै अथवा बैरी है यमके यहां गलाकटावेंगे ॥८॥ हे अज्ञानी ! तौनेशरीरको
तू आपनो मानिकै विषयनमें परिकैभूलि गयो है ॥९॥ सो यतने जेतने कहिआयें
ते यहि तनके साझी हैं तिन तेजन्म भरि तैं दुःखपायकै हेबावरे ! कहे मूढ
मोरमोर तैं गोहरावै है कि यातनमेरो है अजहूं चेतनहीं करै है कि यातनैमोकां
फांसेहै ॥ १० ॥
इति अठहत्तरवीं रमैनी समाप्त ।
१२
( १७८ ) बीजक कबीरदास ।
अथ उन्नासिवीं रमैनी ।
चौपाई ।
बढ़वतवाढ़ि घटावत छोटी । परखतखर परखावतखोटी १
केतिक कहौं कहांलों कही । औरौ कहौं परै जो सही॥२॥
कहे विनामोहिं रहो न जाई। बेरंहि लैलै कूकुर खाई ॥ ३॥
साखी ॥ खाते खाते युगगया, अजहुं न चेतो जाय ॥
कहहिं कबीर पुकारि कै, जीव अचेतै जाय॥ ४॥
बढ़वतवाढ़िघटावतछोटी।परखतखरपरखावतखोटी ॥१॥
केतिककहौं कहांलों कही । औरौ कहौं परै जो सही ॥२॥
कहे बिना मोहिं रहो न जाई । बेरहिलैलै कूकुरखाई ॥३॥
यह माया को प्रपंच जोहै सो बढ़ावत जाइतो बढ़तई जाय है रंकते इंद्रहू
ह्वैजाय तऊ चाह बढ़तई जायहै औ जो घटाइबैलगे तो घटिही जाइहै औ नाना-
मतमें लगि मनमुखी बिचारैहै तब तो खर कहे सांचैहै औ जब काहू साधुते
परखायो तब झूठहीहै जायहै ॥ १ ॥ औमैं केतिको बातकह्यो परन्तु पाथरकै-
सो पानी बहि जाइहै बेधै तौ हुईनहीं है मैं कहांलों कहौं औ औरऊ कहौं जो
सहीपरै कहे जो तोको सांच जानिपरै ॥२ ॥ हे जीव!तेरे ये दुःखदेखिकै मोको
दयाहोइहै ताते बिनाकहे मोसों नहीं रहिजाइहै जौने बेरा रामनाम संसार सागर-
के उतरिबे को मैं बताइदेउँहौं तौने बेराको कूकुर जे तामस शास्त्रवारे गुरुवालोग
ते खाई जाइहैं कहे मेरोकहो तामें नहीं लगन देइहैं औरै औरै मतमें लगाइ
देइहैं जो यहपाठ होई “बिरहिनि लैलैकूकुर खाइ” तौ यह अर्थ है कि बिरहिन
जेलोगहैं जिनको साहबकी अप्राप्ति है तिनको गुरुवालोग खाइ जाइहैं अथवा
बीर जे साहबहैं तिनते हीनजे प्राणी हैं तिनको कूकुर खाइहैं ॥ ३ ॥
साखी ॥ खाते खाते युगगया, अजहुं न चेतो जाय ॥
कहहिंकबीर पुकारिकै, जीव अचेतै जाय ॥ ४ ॥
: Is it जॉनorजौन? It has two slant strokes above: जौन. Wait, look at छड़ावनvsछुड़ावन: Let's look at छड़ावन: The letter छ: curl at top left, loop in middle, loop at bottom right, tail. Below the bottom loop, is there a ु(u-matra)? No! It's completely flat:छड़ावन. Wait, in line 16: सपनहू नहीं है जौन छड़ावन वारोहै॥१॥ Wait, look atछूटावनvsछड़ावन: छ+ड़+ा+व+न=छड़ावन. Wait, is there a dot under ड? In old prints, डoften representsड़. It has a bindu: छड़ावन. Let's write छड़ावन`.
जिनजीव गुरुवा लोगनकेसमुझाये नानामतमें लागि कहूं सांच साधूते खराखोट
नहीं परखाये तेजीव चाहत तो मुक्तिको लाभहैं परन्तु जिनसुकर्मनते अंतःकरण
`शुद्धिद्वारा सांचे साधुको ज्ञान बतायो ठहरै सो
( १८० ) बीजक कबीरदास ।
बिचारहैं नेति नेति कहैहै याते सब खोटही द्वैगयो ॥ ३ ॥ श्रीकबीरजी कहै हैं
सांचो जो है साहब रक्षकताको न जान्यो जिनकहे झीन आशा जो है कि
हमब्रह्म है जायँ तौनेको तोरि ब्रह्ममें लीनहोगे फिरि संसार परोगे तब काकों
खोरी देहुगो तुम्हीं ब्रह्महौ ॥ ४ ॥
इति असिर्वीं रमैनी समाप्ता ।
अथ इक्यासिवीं रमैनी ।
चौपाई ।
देवचरित्र सुनौ रे भाई । सो तो ब्रह्मा धिया नशाई ॥ १ ॥
ऊजेसुनी मँदोदरि तारा।ज्यहिघर जेठ सदा लगवारा॥२॥
सुरपतिजाइअहल्यहिछलिया। सुरगुरुघरणि चंद्रमाहरिया ३
कह कबीर हरिके गुणगाया । कुंतीकर्ण कुंवारेहि जाया ४
देवचरित्र सुनौरे भाई । सोतो ब्रह्माधिया नशाई ॥ १ ॥
ऊजेसुनीमँदोदरि तारा । ज्यहिघर जेठसदा लगवारा ॥२॥
बड़ेबड़े जीव मायामें परिकै भूलिगयेहैं छोटे जीवनको कहा कहियेहे भाइउ!
देवचरित्र सुनौ ब्रह्मा अपनी कन्यासंग भूलि गये ॥ १ ॥ ऊजे मन्दोदरी
ताराजेहैं तिनके घरमेंजेठही लगवारहोत आयोहै जो कहो सुग्रीव बिभीषणकों
कहतेहौ तौ तिनके घर न कहते तिनके कहते औ ई लहुरे हैं वेजेठकहैं सो
ब्रह्माके हवाले कह्यो ब्रह्माके पुत्र आपसमें काज करतभये सो पुलस्त्य जेठे हैं
ते लहुरे भाईकी कन्याको बिवाहे या मन्दोदरीके घरको हवाल भयो औ
ऋक्षराजस्त्री भये तिन्हें सूर्य औ इन्द्रगहे तिनते सुग्रीव औ बालिभये सो प्रथम
सूर्य ग्रहण कीन्हो सो उनकी स्त्री भई औ सूर्यते जेठेइन्द्रहैं तेऊपीछे ग्रहणकियो
ताराके घरको हवाल भयो सो तारा मन्दोदरीके घर जेठही लगवार होत आयो
है जो लहुर पाठहोइ तौ सुग्रीव बिभीषण बने हैं सो यहां नहीं है ॥ २ ॥
रमैनी । ( १८१ )
सुरपतिजाइअहल्याछलिया। सुरगुरुघरणिचंद्रमाहरिया ३
कहकवीरहरिके गुणगाया । कुंतीकर्णकुवारेहिजाया ॥४॥
सुरपतिअहल्याको गमनकरतभयो औ सुरगुरु जे बृहस्पति हैं तिनकी स्त्रीको
चन्द्रमा गमन करतभयो ॥ ३ ॥ औ कुन्ती जो हैं सो कुंवारेहिमां कर्णको
उत्पन्न कियो है सो कर्म तो या डौलके हैं जो नीचहू नहीं करै है परन्तु कबी-
रजी कहै हैं कि हरिके गुण गावतभये ताते इनहूकी सज्जनहीं में गिनती भई
ऐसहुमें हरिरक्षाकैलियो सो हे जीव ! तैं केता अपराध कियो ॥ ४ ॥
इति इक्यासिवीं रमैनी समाप्तं ।
2
अथ बयासिवीं रमैनी ।
चौपाई ।
सुखकबृक्षयकजक्तउपाया । समुझिनपरीविषयकछुमाया १
छौक्षत्री पत्री युग चारी । फल द्वै पापपुण्य अधिकारी २
स्वादअनंतकछुवर्णिनजाहीं । कर चरित्र सो तेही माहीं ३
नटवरसाजसाजिया साजी । सो खेलै सो देखै बाजी ४
मोहा बपुरा युक्ति न देखा । शिवशक्तीबिरंचिनहिंपेखा ५
साखी ॥ परदेपरदे चलिगया, समुझि परी नहिं बानि ॥
जो जानै सो बाचिहै, होत सकल की हानि ॥६॥
सुखकबृक्षयकजक्तउपाया । समुझिनपरीविषयकछुमाया १
छौक्षत्रीपत्री युगचारी । फलद्वै पाप पुण्यअधिकारी ॥ २ ॥
स्वादअनन्तकछुवर्णिनजाही । करचरित्रसो तेहीमाही॥३॥
साहबको बिसरायकै सूखा जो बृक्षहै यह संसार माया कहे पावत भयो बिषय
बिषरूप माया न समुझिपरी संसारीह्वैगयो ॥ १ ॥ शरीर धारनकैट छा उरमिनको
( १८२ ) बीजक कबीरदास ।
धारण करनेवाला जो जीव क्षत्री सो पत्री कहे पक्षी है जौने वृक्षचारिउ युगमें पक्षीद्वै
गयो अथवा क्षयमान जे नवगुण हैं तिनको धारणकीन्हे जो जीव सोई पत्री कहे
पक्षी है नवगुण कौन हैं सुखदुःख इच्छा प्रयत्न राग द्वेषधर्माधर्म भावना
यहितरहको जीव जो है पक्षी सो पापपुण्य फल ताको खाइबेको चारिउयुग
अधिकारीहै ॥ २ ॥ तिन फलनमें बहुतस्वादहै कछु कहो नहीं जायहै
तेहीवृक्ष में जीवरूप पक्षी चरित्रकरै है सो आगे कहैं ॥ ३ ॥
नटवरसाजसाजिया साजी । सो खेलैसो देखै बाजी ॥४॥
मोहावपुरा युक्तिन देखा । शिवशक्ती बिरंचिनहिंपेखा ॥५॥
नटके बेटा कैसी साज साजि कहे नानारूप धारण करिकै आवैजाय है जो
वाजीगर जौने खेलखेलै है तौने देखै है अर्थात् जे ब्रह्ममें लगेते ब्रह्मही देखै हैं जे
जीवात्मामे लगैहैं ते जीवात्मैको देखैहैं इत्यादि जो जौने मतमेंहैं सो ताही में
लगोहै सांच बताये लरैधावै है काहे ते उनकी वासना अनेक जन्म ते वही
है ॥ ४ ॥ गुरुवाकारिकै मोहा जो वपुराजीव है सो साहबके जानिबे की युक्ति
न देखत भयो शिवशक्त्यात्मक जगत् पूर्व कहिआये हैं सो या शिवशक्ति बिरंचि
मायारूप या बात न जानतभये ॥ ५ ॥
साखी ॥ परदे परदे चलिगया, समुझि परी नहिंवानि ॥
जो जानै सो वाचि है, होत सकलकी हानि ॥ ६ ॥
परदे परदे कहे बिना साहबके जाने संसारमें जीव चलिगया कहे संसारमें
जातरहा बाणी जोहै वेद शास्त्र सो तात्पर्य करिकै साहबको बतावैहै सो जीव-
को न समुझिपरयो जो कोई वेदशास्त्रादि में तात्पर्य करिकै परमपुरुष पर
श्रीरामचन्द्रको जानै सोई बाचैहै अपरोक्ष अर्थ जगत्मुख जानिकै सबकी हानि
होतही जाय है ॥ ६ ॥
इति बयासिर्वीं रमैनी समाप्त ।
" ? No, "गुण"
"जे"
"साहबहैं"
"तिनको"
"ज्ञान"
"जाको"
"लखायो"
"है"
"ताको"
Let's check line 19 (prose line 6):
"मनतहँई लय भयो मनोनाश बासना क्षयहैगई जब मनोनाश भयो तब धाया"
Wait:
"मनतहँई" (together)
"लय"
"भयो"
"मनोनाश"
"बासना"
"क्षयहैगई" (together: क्ष-य-है-ग-ई)
"जब"
"मनोनाश"
"भयो"
"तब"
"धाया"
Let's check line 20 (prose line 7):
"कहे हंसरूप में स्थितहै साहबके पास को धावत भयो ॥ २ ॥ क्षत्रियसोहै जो"
Wait:
"कहे"
"हंसरूप"
"में"
"स्थितहै"
"साहबके"
"पास"
"को"
"धावत"
"भयो"
"॥ २ ॥"
"क्षत्रियसोहै"
"जो"
Let's check line 2
( १८४ ) बीजक कबीरदास ।
आपनेको और और देवताके दास मानै है यहनाममिटाइदेइऔ यह जीवका जीव
नाममिटाइदेइ औ हंसरूप में स्थितह्वैकै जीवको नाम रामदास धरावै तबहीं
यहजीवको प्रतिपाल होईहै आपने देखतै जन्म मरणको लैहे कहे छोड़िदेइ
है ॥४॥ सो जो कोई या भांति साधन करै सो हालै निशानेमें घाउकरै अर्थात्
मनोनाश बासक्षय हालै ह्वै जाइहै औ जेमनमतराउह अपने मनमतमें अपनेको
राजामानै हैं जूझिकै संसारमें परे अर्थात् कोई आपनेनको ब्रह्ममानै है कोई
आत्मैंको मालिकमानैहै ते जैसे मिथ्या वासुदेव अपनेको कृष्णमानि जूझिपरयो
ऐसे येऊ मनमाया करिकै मारे जाय हैं ॥ ५ ॥
साखी ॥ मनमतमरैनजीवई, जीवहिमरण न होय ॥
शून्यसनेहीरामविन, चलेअपनपौखोय ॥ ६ ॥
मनमती न मरै है न जियै है काहेते जीवहि मरण न होय जीवको जीवत्वनहीं
जाइ है जिअब तो तब कहिये जब साहबको जानिकै साहबके लोकहि में जन्म
मरण छूटि जाय मरिबो तब कहिये जब ब्रह्ममें लीनहोय जीवत्व छूटिजाइ
जनन मरण न होइ सो शून्य जे हैं वे धोखा तिनके सनेही जे मनमती हैं तेमरै
हैं न जिये हैं जीवको तत्त्व नहीं जाइ है जीव सनातनको है तामें प्रमाण ॥
( ममैवांशोजीवलोकेजीवभूतः सनातनः ) ॥ ६ ॥
इति तिरासिवीं रमैनी समाप्त ।
अथ चौरासिवीं रमैनी ।
चौपाई ।
जोजिय अपनेदुखै सँभारू ।सोदुःखव्यापिरहोसंसारू॥१॥
माया मोह बंध सब लोई । अल्पै लाभ मूलगो खोई॥२॥
मोर तोर में सबै बिगूता । जननीउदर गर्भमहँसूता ॥ ३॥
ई बहुरूप खेलै बहु बूता । जनभौरा असगये बहूता ॥४॥
उपजैखपै योनिफिरि आवै।सुखक लेशसपनेहुंनाहिंपावै॥५॥
रमैनी । ( १८५ )
दुःख सँताप कष्ट बहुपावै । सो न मिला जो जरत बुझावै ६
मोर तोर में जर जग सारा। धिग जीवन झूठो संसारा ॥७॥
झूठे मोह रहा जगलागी । इनते भागि बहुरि पुनि आगी ॥८॥
जेहित कै राखे सबलोई । सो सो सयान बाचे नहिं कोई ॥९॥
साखी ॥ आपु आपु चैते नहीं, औ कहौतौ रिसिहा होइ ॥
कहकवीरसपनेजगै, निरस्ति अस्ति नहिं कोइ ॥१०॥
जोजियअपनेदुखैसँभारू । सोदुखव्यापिरहोसंसारू ॥ १॥
मायामोह बंध सबलोई । अल्पै लाभ मूलगो खोई ॥ २ ॥
मोरतोरमें सबै विगूता । जननी उदर गभमहँसूता ॥ ३ ॥
ई बहुरूप खेलै बहु बूता । जनभौंराअसगये बहूता ॥ ४ ॥
हे जीव ! जौन दुःखयह संसारमें व्यापिरह्यो है तौने अपने दुःखकों सँभारु
अर्थात् तौने दुःखसे निकसु ॥ १ ॥ मायामोहमें सब बँधेहौ सो अल्पतो लाभ
है अर्थात् विषय सुखतो थोरही है तिन सबकेमूल संपूर्ण दुःख के मेटनवारे जे
परमपुरुष श्रीरामचन्द्र हैं ते खोइनाइ हैं कहे बिसरि जाय हैं ॥ २ ॥ मोर
तोर याही में सब जीव विगूता कहे अरुझि रहे है याहीते जननीके उदरमें
सदा सूतत है अर्थात् गर्भवास नहीं मिटे है ॥ ३ ॥ जैसे भौंरा फूलनमें रस
लेनको जाइ है संध्या द्वै गई तब कमल संपुटित द्वैगयो तब फँसिगयो तैसे ये
जीव बहुरूपते बहुत पराक्रम करिकै खेलखेलै हैं कहे विषय रसलेनको जाय ही
मायामें फँसिजाय हैं ॥ ४ ॥
उपजैकपैयोनिफिरिआवै।सुखकलेशसपनेहुंनहिंपावै ॥५॥
दुःखसँतापकष्ट बहुपावै । सो न मिला जो जरतबुझावै॥६॥
उपजै है औ खपैकहे मरै है पुनि पुनि योनिमें फिरि आवै है सुखको लेश
सपन्यो नहीं पावै है ॥ ५ ॥ दुःख संताप कष्ट बहुतपावै है जो आगीते जरत
( १८४ ) बीजक कबीरदास ।
बुझावै सो गुरुनहीं मिलै है इहांदुःखसंताप कष्ट तीनबार जो कह्यो तामें कुछ
भेद है दुःख वह कहावै है जो काहूह मारे होइहै औ जो रोगादिकन करिकैहोइ
है सो संकष्टकहावै है औ जो कोई हानिते होइहै सो संताप कहावै है ॥ ६ ॥
मोरतोरमें जरजग सारा । धिगजीवन झूठो संसारा ॥७॥
झूठेमोहरहाजगलागी । इनतेभागि बहुरि पुनिआगी ॥८॥
जेहितकै राखे सबलोई । सो सयान बाचे नहिं कोई ॥९॥
औ तोर मोर करिकै सब संसार जर जाइ हैं यहसंसार साहब को चिद्रूप
करिकै नहीं देखै वे यह संसारको संसाररूप करिकै देखै हैं यही झूठो है सो
ऐसे झूठे संसारमें जीवनको जीबेको धिक्कार है ॥ ७ ॥ मायाको जो मोहहै
सो सब संसारमें लगिरह्यो है सो झूठो है इनते जो कोई भागिबेऊ
कियो तौ फेरि वही झूठे ब्रह्माग्निमें जरै है ॥ ८ ॥ जेने सबलोई कहैं
लोगन को हितकै राखे हैं ते सयान कालसे कोई नहीं बचै हैं तू कैसे
बचैगो ॥ ९ ॥
साखी ॥ आपुआपु चेतैनहीं, औ कहौतौ रिसिहा होइ ॥
कहकबीरसपनेजगै, निरास्तिअस्तिनाहिंकोई ॥१०॥
आपु आपुकहै अपने स्वरूपको नहीं चेतै है कि मैं परमपुरुष श्रीरामचन्द्र-
केहौं सो मैं जो समुझाऊं हौं तौ रिसहा होइ है सो कबीरजी कहै हैं कि जो-
सपने जागै सपन कहा है देहको अभिमानी मनमुखी है जागे कहै अपने
मनते यह बिचारिलेइ कि मैं जाग्यो मैं ब्रह्म है गयो अथवा आपनेको जान्यो
मैंहीं सबको मालिकहौं और कोई दूसरो छोड़ावनवारो नहीं है म अपने क।
जान्यो सो छूटिगयो सो कोई साहबको न मान्यो सो निरस्तिकहे नास्तिक है ।
सो अस्तिकहे आस्तिक न होइहै सो कहा जागैहै नहीं जागै है अर्थात् वह
ज्ञानतो धोखाहै संसार समुद्र ते तेरी रक्षाकहा करैगो ताते वहसाहबको समु-
झिजाते तेरोसंसार समुद्रते उवार करिदेइ ॥ १० ॥
इति चौरासिवीं रमैनी सम्पूर्णा ।
इति ।
अथ शब्दः प्रारभ्यते ।
पहलाशब्द ॥ १ ॥
संतौ भक्ति सतौगुरु आनी ।
नारीएक पुरुषदुइ जाये बूझोपंडितज्ञानी ॥ १ ॥
पाहनफोरिगंगयक निकरी चहुंदिशि पानीपानी ।
तेहिपानी दुइपर्वतबूड़े दरियालहरि समानी ॥ २ ॥
उड़िमक्खी तरुवरके लागी बोलै एकैबानी ।
वहिमक्खीके मक्खानाहीं गर्भरहा बिनपानी ॥ ३ ॥
नारीसकल पुरुषवहिखायी ताते रहेउ अकेला ।
कहै कबीर जो अबकी समुझै सोईगुरु हमचेला ॥ ४ ॥
सन्तौभक्तिसतोगुरुआनी ।
नारीएकपुरुषदुइजाये बूझोपण्डितज्ञानी ॥ १ ॥
हे सन्तो ! हे जीवौ ! तुमतो शांतरूपहौ । गुरुजे हैं सबते श्रेष्ठ परम पुरुष
श्रीरामचन्द्र तिनकी सतोकहे सातो जे भक्ति हैं ते आनी कहे आनई हैं अर्थात
सगुण निर्गुणके परे मनबचनके परे है कौन सातभक्ति हैं ते कहैं हैं “ शांत ”
प्रथम ताकर द्वैभेद १ सूक्ष्मा २ सामान्या । सो शांतिके सूक्ष्माके साम-
न्याके जुदे जुदे लक्षण हैं ताते तीनि भक्ती ये हैं । औ १ दास्य २ सख्य ३
वात्सल्य ४ शृङ्गार चारि येमिलाय सातभक्ति भईं । सोई जे हैं सा तौ रसहैं
ते मन बचन में नहीं आवै हैं जब प्राप्तिहोइहैं तबहीं जानिपरैहै कि ऐसे हैं ।
( १८४ ) बीजक कबीरदास ।
सो या भांति साहवकी जे सातौभक्तिहैं ते गुप्तह्वै गईं काहेते कोऊ न जानत-
भयो सो कहै हैं नारी जोहै कारणरूपा माया सोद्वैपुरुषको प्रकटकियो एकजीव
दूसरो ईश्वर सो पांच ब्रह्मईश्वर प्रकट भयेहैं सो आदि मंगलमें कहिआयेहैं।
जनीप्रादुर्भावे धातुहै या जायोको अर्थ प्रकटकरबोई है औ मायाते जीव ईश्वर
प्रकटभये हैं तामें प्रमाण ॥ ( मायाख्यायाःकामधेनोर्वत्सौजीवेश्वरावुभाविति
जीवेशावाभासेनकरोति मायाचाविद्याचेतिश्रुतेः ) ॥ सो हे पण्डित ज्ञानी ! तुम
बूझौ तौ सारासारके बिचार करनवांरे सांचहौ यहवाणी जो है सोई तुम को
भरमाइ दियो है ॥ १ ॥
पाहनफोरिगंगयकनिकरी, चहुंदिशिपानी पानी ।
तेहि पानी दुइपर्वत बूड़े, दरिया लहरि समानी ॥२॥
पाहन कहिये कठिनको सो कठिन मनहै ताको फोरिकै गंगा निकसी नाना
पदार्थनमें जो राग होई है सोई गंगाहै सो वही रागरूपा मायामें परिकै जीव
संसारमें रागकरि बूडिगये। औ ईश्वर उत्पत्ति प्रलय करिकै दोनों जीव ईश्वर जे
हैं तेई दुइभारी पर्वत हैं ते बूडिगये। औ दरिया जो धोखा ब्रह्महै तामें रागरूपी
जो है गंगा ताकी जो लहरि है सो समाइ जातीभई अर्थात् सब धोखहीमें राग
करत भये, सांच वस्तुमें जिनजाना तेई बाचे अथवा वही रागगंगा लहरि संसा-
रसागरमें समाइजाती भई । सबजीव ईश्वर संसारमें रागद्वेषकरिकै बूडिगये ।
अथवा वहै जो बाणीगंगा सो पाहन जो मनहै तौनेको फोरिकै निकरी है सो
चारिउ ओर पानीपानी है रही है तौने पानी दुइ पर्बत बूडे एक जीव एक
ईश्वर औ गङ्गा समुद्रमें समानी हैं यहां बाणीरूप गङ्गको पर्यवसान दरिया
जो ब्रह्महै ताही में होतभयो ॥ २ ॥
उड़ि मक्खी तरुवर को लागी, बोलै एकै बानी ।
वहि मक्खी के मख्खा नाहीं, गर्भ रहा विनपानी ॥ ३ ॥
मक्खीजे हैं जीव ते तरुवर जो है देह तामें उड़िकै आपने आपने बासननते
लागतभये अर्थात् प्रलय जबभई तबभई तब वही ब्रह्ममें लीनभये, पुनि
जबसृष्टिभई तब पुनि शरीर पावत भये ॥ अथवा मक्खी जेहैं जीव ते संसार
शब्द १ (१८९)
वृक्षमें लागतभये ते सब एकबाणी बोलै हैं कि, “एक ब्रह्मही है दूसरो नहीं है”
साहबको नहीं जानै है सो वहीमक्खी जो जीवहै ताकेमक्खा नहीं है कहेप्रथम
जीव जो हिरण्यगर्भ समष्टि जीवहै ताके पति नहीं है परन्तु बिना पानी गर्भर-
हतईभयो जीवते संसारमेंकटै यह आपहीते नामको जगत् मुख अर्थ करिकै
संसारी ह्वैगयो साहब तौ याको उद्धार करिबो रमानाम दियो ताकि मेरेनाम
मेरो अर्थ जानिकै मेरेपास आवै संसार न होइ ॥ ३ ॥
नारीसकल पुरुषहि खायी, ताते रही अकेला ।
कहै कबीर जौ अबकी समझै, सोइ गुरु हमें चेला ॥ ४ ॥
नारी जो है वहै कारणरूपा माया, सो सबजीव ईश्वर जेपुरुषहैं तिनको खाइ-
लियो, कहे आपने पेटमें डारिलियो; अर्थात् उन के काहूके ज्ञान न रहिगयो,
आपनोचेरो बनाइ लियो । तेहिते हे संतौ ! हे:जीवो ! तुमतो शुद्धहौ, इनको
छोड़िदेउ, तब साहब जे हैं ते
( १९० ) बीजक कबीरदास ।
अथ दूसरा शब्द ॥ २ ॥
संतौ जागत नींद न कीजै ।
काल न खाय कल्प नाहिं ब्यापै देहजरानाहिं छीजै ॥ १ ॥
उलटी गङ्ग समुद्रहि सोखै शशि औ सूरगरासै ।
नवग्रह मारि रोगियाबैठे जलमें बिंब प्रकासै ॥ २ ॥
बिनुचरणन को दशदिशि धावै बिन लोचन जगसूझै ।
ससा सो उलटि सिंह को ग्रासै ई अचरज कोऊ बूझै ॥ ३ ॥
औंधे घड़ा नहीं जल डूबै सूधेसों घट भरिया ।
जेहिकारण नर भिन्न भिन्न करु गुरुप्रसादते तरिया ॥ ४ ॥
पैठि गुफामें सब जग देखै बाहर कछुव न सूझै ।
उलटाबाण पारथिव लागै शूराहोय सो बूझै ॥ ५ ॥
गायन कहै कबहुं नहिंगावै अनबोला नितगावै ।
नटवर बाजीपेखनी पेखै अनहदहेतु बढ़ावै ॥ ६ ॥
कथनी बदनी निजुकै जोहैं ईसब अकथकहानी ।
धरती उलटि अकासहि वेधै ई पुरुषहि की बानी ॥ ७ ॥
विना पियाला अमृतअचवै नदी नीरभरि राखै ।
कहै कबीर सो युग युगजीवै राम सुधारस चाखै ॥ ८ ॥
संतो जागत नींद न कीजै ।
काल न खाय कल्प नहिं ब्यापै देह जरानाहिंछीजै ॥ १ ॥
हे संतौ ! हे जीवौ ! तुमतो चैतन्यरूप हौ तुम काहेको सोवौहौ अर्थात्
काहे जड़ भ्रममें परेहो मायादिक तो जड़ हैं औ तिहारो अनुभव जो ब्रह्महै
सोऊ जड़ है । काहेते कि, तिहारो मन तो जड़है ताहीकी कल्पना ब्रह्महै ।
शब्द । (१९१)
जो कहो "मनको विषय ब्रह्म है" यह तो कोई वेदांतमें नहीं है तो जहां भर
मन वचनमें आवै तहांभर अज्ञान कल्पितहै। औ "अहंब्रह्मास्मि" (मैं ब्रह्महौं)
मानिबो तो मूलाज्ञानमें है । यह वेदांतको सिद्धांतहै जैसे, धूरि धूम बादर
घटादिकके आकाशही रहिजायहै। कबीरजी कहैंहैं कि, तैसे तीनों अवस्थामें
तुमहीं रहिजाउहौ। जहांभर ब्रह्म कहैंहैं औ विचारकरैंहैं सोमन वचनमें आइ-
जाइहै ताते, मनही को कल्पितहै; ताते वोज़ड़हैं, सो तुम नहींहौ। तुमतौ
चैतन्यहौ। तिहारेरूपको कालनहीं खाय है। औ कौनौ कल्पना नहीं व्यापै है
अर्थात् कौनौ तुम्हारे स्वरूप में कल्पना नहीं उठै है । औ तेरो जोस्वरूपहै
याते परमपुरुष श्रीरामचन्द्रके समीप रहैहै। सो रूप जरा जो बुढ़ाई है ताते
नहीं छीनै है अर्थात् कबहूं बुढ़ाई नहीं होइहै सदा किशोर बनोरहै है ॥ १ ॥
उलटी गंग समुद्रहि सोखै शशि औ सूर गरासै ॥
नवग्रहमारि रोगिया बैठै जलमें बिम्ब प्रकासै ॥ २ ॥
रागरूपी जोहै गङ्गा सो संसारमुख ब्रह्ममुख ह्रैरहीहै। सो जो उलटै साह-
बमुख होइ साहबमें जीव अनुरागकरै तो समुद्रजोहै संसारसागर औधोखा
ब्रह्मसागर ये दुहुनको सोखिलेइ। औ शशि जो है जीवात्मा मानिबो कि एक
आत्मही है, दूसरो पदार्थ नहीं है यहज्ञान; औ सूर जो है नाना निरंजनादिक
ईश्वरनके दास मानिबेको ज्ञान; तौनेको गरांसिलेइहै । औ यहसांचो साहब
कोहै जान याको देइहैं संसारवालो जो रोगहै सो पारखहीते जायहै। सो नव-
ग्रह जब निबल होइहै तब रोगहोइहै। सो नवग्रह नवद्रव्यहैं। नवद्रव्यके
नाम १ पृथ्वी २ अप् ३ तेज ४ वायु ५ आकाश ६ काल ७ आत्मादिक
८ दिशा ९ मन तिनकोमारिकै कहे मिथ्या मानिकै औ अपनी आत्माको
साहब को दास मानिकैबैठे, तब रागरूपी जलमें बिंब जो है शुद्ध साहब को
अंश याको स्वरूप, जाको प्रतिबिंब धोखा ब्रह्महै औ संसारहै तौन प्रकाशै कहे
अपने स्वस्वरूपको जानै ॥ २ ॥
बिन चरणनको दशदिशि धावै बिन लोचन जग सूझै॥
ससा सो उलटि सिंहको ग्रासै ई अचरज कोऊ बूझै ॥३॥
( १९२ ) बीजक कबीरदास ।
तब बिना चरणनको कहे संसारमुख चलिबो ब्रह्ममुखचलिबो याको छूटिगयो ।
अर्थात् येई चरणहैं तिनते हीन है गयो । तब नवधाभक्तिको छोड़िकै दश
कहे दशौ जो साहबकी “अनुरागात्मिका” भक्तिहैं तोनेके दिशःको धावै है ।
अथवा नवद्वारको छोड़िकै दशौ द्वारको जो है मकरतार साहब के इहांकी डोरी
लगी है तहांको धावै है । औ शरीरनको जे प्राकृत नयन हैं ते याके न रहि-
गये । साहब को दियो जो याको हंसस्वरूप है तौने के नेत्रकरिकै साहब को
चिद्दिद् रूप यह संसार सो सूझि परन लग्यो कहे बूझिपरनलग्यो । तब
अरेमूढ़ ! भ्रमरूपजो है ससा खरहा अहंब्रह्म विचार सो, तैं जो है समर्थ
सिंह ताको ग्रासै है । सो वहतो धोखाहै वही भर्म भूलि गयो । सो हेजीवो !
यह अचरज कोऊ बूझै । औ जोनज्ञान मैं कहि आयों तौनकरि साहबमें
लगो । जो कवहूं न होई नई बात होय सो यह आश्चर्य है । ससा सिंहकों
कबहूं नहीं खाइहै जीव ब्रह्म कबहूं नहीं होयहै सो तुम कबहूं ब्रह्म न होउगे ।
वह ब्रह्म तुम्हारई अनुभवहै ताहि में तुम भुलाने हौ ॥ ३ ॥
औंधे घड़ा नहीं जल भरिया सूधे सों घट भरिया ॥
जेहि कारण नर भिन्नभिन्न करु गुरुप्रसादते तरिया ॥ ४ ॥
औंधा घड़ा जो जल में डारि दीजै तौ नहीं डूबैहै, जलनहीं भरि आवैहै ।
सो तैं जो साहबको पीठिदै कै ब्रह्ममें औ संसार में लगै सो तौ धोखाहै। जैसे सूधे
घटमें जलभरि आवै है तैसे तैंहूं साहबकी ओर मुखकरु, जब साहब तेरेऊपर
प्रसन्नहोइगो तबहीं तैं ज्ञान भक्ति करिकै पूरा होइगो । जाकारण नर भिन्न
भिन्न करै है कहे भिन्न भिन्न पदार्थ मानै है औ सब पदार्थ साहबको चिदचिद् रूपक-
रिकै नहीं देखै हैं। सो यह भ्रम समुद्र गुरु सबते श्रेष्ठ अंधकारको दूरिकरनवारे
परमपुरुष जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनके प्रसादते तरोगे । अथवा साहबके बतावनवारे
अंधकारके दूरि करनवारे जब गुरुमिलैंगे तब तिनके प्रसादते तरोगे ॥ ४ ॥
पैठि गुफामों सब जग देखै बाहर कछुव न सूझै ॥
उलटा बाण पारथिव लागै शूर होय सो बूझै ॥ ५ ॥
दुर्लभ मनुष्य शरीररूपी जो गुफाहै तौनेमें पैठिकै कहेशरीर पाइकै चिदचिद
साहबको रूप सब संसार याको सूझिपरै औसाहबके रूपते बाहिरे औकुछ वस्तु
न सूझिपरै । सुरतिरुपी जो बाणहै सो जगत्मुख ब्रह्ममुख ईश्वरमुख
जीवात्मामुख है रहाहै सो उलटा कहे उलटिकै पार्थिवकहे राजा जे परम-
पुरुष श्रीरामचन्द्रहैं तिनमें लगावै । यहबात जो कोई शूरा होइ कहे ब्रह्मज्ञा-
न ईश्वरज्ञान जीवात्मज्ञान की एक आत्मै सत्यहै तिनको जीति लेइ
सो बूझै तबहीं जन्ममरण याको छूटै है ॥ ५ ॥
गायन कहै कवहूं नहिं गावै अनबोला नितगावै ॥
नटवर वाजी पेखनी पेखै अनहद हेतु बढ़ावै ॥ ६ ॥
गायन जोहै वाणी वेदशास्त्र पुराण सो तात्पर्य करिकै अनिर्वचनीय साहबको
कहैं हैं तौनेको तौ कबहूं नहीं गावैहै और अनबोला जो निराकार धोखा ब्रह्महै
जो कबहूं बोलते नहीं है, सो कैसे पूरपरै । कौनीतरहते अनबोलाको गावै हैं सो
आगे कहै हैं । वह जो धोखा ब्रह्मको देखनोहै सो नटवत् बाजी है कहे झूठै है
वहां कछु नहीं देखि परै है जो कहो अनहदको हेतु तो बढ़ावैहै कहे दशौधुनि
अनहद की तौ सुनि परै है ॥ ६ ॥
कथनीबदनी निजुकै जोहै ई सब अकथ कहानी ॥
धरती उलटि आकाशहि बेधै ई पुरुषहिकी वानी ॥ ७ ॥
सोई तो सब कथनी बदनीहै । जो विचारिकै देखौ तौ अनहद आदिकैकै
ई सब अकथ कहानी हैं। साहबके जाननवारे पूरेसंतनके कहिबे लायक नहीं है,
झूठैहैं कछु इनमें है नहीं। सबमनके अनुभवहैं । पुरुषजेहैं तिनकी यह बानीकहे
स्वभावहै । धरती जो जड़मायाहै ताको उलटिदेइहै, वाको मुख मुरकाई देइहै
वासों आप फिरि आवैहै । औ आकाश जोब्रह्महै ताको बेधैकहे ब्रह्मके पार जाय
है ताम प्रमाण ॥ "सिद्धाब्रह्मसुखेमग्ना दैत्याश्चहरिणाहताः । तज्ज्योतिर्भेदनेश-
क्तासिकाहरिवेदिनः ॥" औकुपुरुषजे हैं ते संसारमें लगे हैं कि, धोखाब्रह्ममें-
लगैहैं उनकी बानीकहे यहै स्वभावहै ॥ ७ ॥
विना पियाला अमृत अचवै नदी नीर भरि राखै ॥
कहै कबीर सो युगयुग जीवै राम सुधा रस चाखै ॥ ८ ॥
१३
( १९४ ) बीजक कबीरदास ।
स्थूल सूक्ष्मादिक जे पांचौं शरीरहैं तेई पियालाहैं । स्थूलसूक्ष्म कारण करिकै
विषयानंद पिये हैं । औ महाकारण कैवल्य ते ब्रह्मानंदपिये हैं । पांचौ शरीर
पियाला ते निकसिकै जे पुरुष साहबको दियो जो हंसस्वरूपहै तामें स्थित हैकै
साहबको प्रेमरूपी जो अमृतहै ताको अँचवै हैं जाते जन्म मरण न होई। तिन
को जगत्के रागरूपी नीरकारिकै भरी जो नदी है जाको आगे वर्णनकरिआयेहैं
"नदियानीर नरकभरि आई" सो तिनको राखै कहे छारई हैं अर्थात् झूरहीहैं ।
अथवा संसारमें जो रागकियेहैं सो नरक भरीहैं ताको निकारिकै रसरूपी भक्ति
जो साहबकी नीर ताको भरिराखै । सो कबीरजी कहै हैं कि, सोई युगयुग
जीवैहै, कहे वहीको जनन मरण नहीं होय, जो या भांति परमपुरुष जे श्रीराम-
चंद्रहैं तिनके प्रेमरूपी सुधारसको चाखैहै ॥ ८ ॥
इति दूसराशब्द समाप्त ।
अथ तीसरा शब्द ॥ ३ ॥
संतौ घरमें झगराभारी ।
रातिदिवस मिली उठिउठि लागैं पांचढोटायकनारी ॥१॥
न्यारोन्यारो भोजन चाहैं पांचौ अधिक सवादी ।
कोइकाहूको हटा न मानै आपुहिआपुमुरादी ॥ २ ॥
दुर्मति केरदोहागिनी मेटै ढोटैचाप चपेरै ।
कहकवीरसोई जन मेरा घर की रारि निबेरै ॥ ३ ॥
सन्तोघरमें झगराभारी ।
रातिदिवसमिलि उठिउठिलागैं पांचढोटायकनारी ॥ १ ॥
आगे या कहिआयेहैं कि बिना पियाला अमृत अचवैहैं औ जे नहीं अचवैहैं
तिनको कहै हैं । हेसंतौ ! हे जीवौ ! या घर जो शरीरहै तामें भारी झगरा
मच्यो है । पांचौ ढोटा जे पांचौ तत्त्वहैं औ नारी जो मायाहै सोउठि उठिलागैहैं
कहे झगराकरैहैं । यहै उपाधिराति दिन जीवको लगिरहैहै ॥ १ ॥