कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १९६ ) बीजक कबीरदास ।
आत्मा भिन्नह्वैजाइगो तब सब शरीरै एकौ कार्य करनको समर्थ न होइगो ।
कैसे, जैसे जीव इनते अपनेको जुदो मानैगो हंसस्वरूपमें स्थित होइगो सो
इनहींको चपाइ लेइगो घरकी रारिनिवारि जायगी । सो इसतरहते जो कोई
अपने स्वरूपको जानि घरकी रारिनिबेरै परमपुरुष श्रीरामचन्द्रमें लगै सोई
जन मेरो है ॥ ३ ॥
इति तीसराशब्द समाप्त ।
अथ चौथाशब्द ॥ ४ ॥
संतौ देखत जग बौराना ।
साँच कहौं तौ मारन धावै झूठे जग पतियाना ॥ १ ॥
नेमी देखे धर्मी देखे प्रात करहि असनाना ।
आतम मारि पषाणहिं पूजैं उनमें कछू न ज्ञाना ॥ २ ॥
बहुतक देखे पीर औलिया पढ़ैं किताब कुराना ।
कै मुरीद तदवीर बतावैं उनमें उहै जो ज्ञाना ॥ ३ ॥
आसन मारि डिंभ १ धरिबैठे मनमें बहुत गुमाना ।
पीतर पाथर पूजन लागे तीरथ गर्व भुलाना ॥ ४ ॥
माला पहिरे टोपी दीन्हे छाप तिलक अनुमाना ।
साखी शब्दै गावत भूले आतम खबरि न जाना ॥ ५ ॥
हिंदू कहै मोहिं राम पियारा तुरुक कहै रहिमाना ।
आपसमें दोउ लरिलरि मूये मर्म न काहू जाना ॥ ६ ॥
घरघर मंत्रजे देत फिरतहैं महिमाके अभिमाना ।
गुरुवा सहित शिष्य सब बूड़े अंतकाल पछिताना ॥७॥
१ डिंभ दम्भका अ। भ्रंशहै ।