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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 263

शब्द। ( २१३ )
अथ नवमशब्द ॥ ९ ॥
संतौ बोले ते जग मारै ।
अन बोलेते कैसे बनिहै शब्दै कोइ न विचारै ॥ १ ॥
पहिले जन्म पूतको भयऊ बाप जनमियाँ पाछे ।
बाप पूतकी एकै माया ई अचरज को काछे ॥ २ ॥
उंदुर राजा टीका बैठे विषहर करै खवासी ।
श्वान बापुरा घरनि ठाकुरो बिल्ली घरमें दासी ॥ ३ ॥
कागज कार कारकुडू आगे बैल करै पटवारी ।
कहहि कबीर सुनौ हो संतौ भैसैं न्याउ निवारी ॥ ४ ॥
संतौ बोले ते जग मारै ।
अनबोलेते कैसे बनिहै शब्दै कोइ न विचारै ॥ १ ॥
पहिले जन्म पूतको भयऊ बाप जनमिया पाछे ।
बाप पूतकी एकै माया ई अचरज को काछे ॥ २ ॥
हे संतौ! जो बोलौहौं कहे जोमैं बताउंहौं सोतो मानै नहीं है बोलेते जगमा-
रैहै कहे शास्त्रार्थकरैहै औ जो न बोलौं तो बनैकैसे शब्दको कोई नहीं बिचारै
॥ १ ॥ अरु पहिले पूतजो जीव है ताको जन्म हैलेइहै तब पिता जोहै जीव-
को अनुमान ब्रह्म ताको जन्म होइहै । पिताजीवको काहेते कह्यो कि, जब शुद्ध
जीव एकते अनेक ब्रह्मही द्वारभयोहै वह माया सबलित ब्रह्मपूतहै औ जीव
मायाहींमें परचोहै दोनों माया सबलितहैं सो बापजोहै जीव औ पूतजोहै ब्रह्म
तिनकी महतारी एक मायाही है अर्थात् यहीते अनादिकालते दोनों प्रकटहैं
वहींमें पैरहैं। सो तैं बिचारु तौ यह अचरजको काछैहै अर्थात् तैंहीं अपने
अज्ञानते यह अचरज काछे है औ नानारूप धेरैहै ॥ २ ॥