कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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यह जीव शरीर धरचो तब एकै नारी जो वाणी सो नानाप्रकार की जो है
कल्पना सोई है जाल ताको पसारि देत भई । तब जगमें नाना प्रकारको
अँदेशा होत भयो कहे नानाप्रकारके मतन करिकै जगतके कारणको खोजत-
भये परन्तु ब्रह्मा विष्णु महेश हू भी अन्त न पावतभये; थकिकै नेतिनेति त कहि
दियो आत्माको विचार न कियो कि कौनकोहै ॥ ३ ॥
नाँगफाँस लीन्हे घट भीतर मूसि सकल जग खाई ।
ज्ञान खड्ग विन सबजग जूझै पकरि काहु नहिंपाई४॥
सो ये कैसे अन्त पावै नागफांस कहे त्रिगुणकी फांसी लिये घटके भीतर
माया बनीरहै है सोई सब संसारको मूसिकै खाई लेइहै । मूसिकै खाइ जो
कह्यो सो वैतौ नाना मतनमें परे यहजानैं हैं कि, यही सत्यहै परन्तु माया
जो है सो परमपुरुषको जानिबो मूसि लियो कहे चोराइलियो । परमपुरुष जे
श्रीरामचन्द्रहैं तिनको औ अपने आत्माको जानिबो कि, साहबकोहौं मैं औ
मायादिकनं को मिथ्या मानिबो यह जो ज्ञानखड्ग है ताके बिना सब जग जूझो
जाइहै । वह मायाको कोई पकरि न पायो अर्थात् यथार्थ मायाही कोई न
जान्यो, तब साहबको अपनो स्वरूप को जानै ॥ ४ ॥
आपुहि मूल फूल फुलवारी आपुहि चुनि चुनि खाई ।
कहहि कबीर तेई जन उबरे ज्यहि गुरु लियो जगाई ॥५॥
आपहि वह मायामूल अविद्याहै जगतके नानापदार्थ करत भई कहे कारण
अविद्याभई। औ आपहीफुलवारी कहे कार्य अविद्या ह्वैकै जगतके नानापदार्थ भई
औ आपही कालरूपह्वैकै चुनि चुनि खाइहै । सो कबीरजीकहैं हैं स्वप्न जो
माया तौनेते जगाय साहब को बताइदियो है जाको सद्गुरु तेई जन उबरै हैं।
१-नाग फांस कहिये वाणीको क्यों कि जैसे नागकी दो जिह्वा होती है वैसे
ही वाणी के दो अर्थ होते हैं संसार मुख अर्थ से नरक में पडता है और गुरुमुख अर्थसे
मोक्ष पद को प्राप्त होताहै । २ क्या ।