कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २१४ ) बीजक कबीरदास ।
उंदुर राजा टीकाबैठे बिषहर करै खवासी ।
इवान बापुरा धरनिठाकुरा बिल्ली घरमें दासी॥ ३ ॥
उंदुर जोहे मूस सो तौ राजा भयो टीकामें बैठ्यो औ बिषहर सर्प सो खवा-
सी करैहै औ श्वान बापुरा जो है सोधरनि ठाकुरा कहे बस्तु लैके ढांकिके धरै
है कहे भंडारीहै औ बिल्ली घरमें दासी है सो खानवालिनि है । अर्थात् उंदुरकहैं
वह साहबको ज्ञान जाको दूरकै दियो है । उंदुरमूसको संस्कृतमें कहैं हैं सो
उंदर कहे मूसतो जीवहै सो उंदुर शरीरको आपनो मानिलियो है सोई राजाम-
यो अरु वाको खानवालो जोहै सर्पसो कालहै । सो खवास भयो कहे क्षण पल
घरी पहर वाको खात बीती तो होतनायहै सो खवास ह्वैकै यहकाल वाकी
आयुर्दायको खातई जायहै । औ नाना प्रकार की जो बिषयहैं तेई बीरा है ताको
खवावत जायहै । अरु श्वानकहे वह स्वानुभावानन्द जोहै सो बापुरा जो जीव
ताकोधारिकै ढांकि लियो है कहे साहबको ज्ञान नहीं होन देइहै औ बिल्ली जो है षट्
दर्शनकी बाणी सोघरमें दासी हैरही है कहे नाना मतन में लगावैहै साहबकी
भक्ति रस जो है सोई है गोरस ताको खाइ लेइ है ॥ ३ ॥
कागज कार कारकुड आगे बैल करै पटवारी ।
कहहि कबीर सुनो हो सन्तो भैंसै न्याउ निवारी॥४ ॥
कागज कार कहे लिखो कागज कार कुड जो बैलहै ताको आगे धरो है ।
सोई बैल पटवारी करैहै । सो कारो कागज कहे लिखो काजग जो गुरुवा
लोगनकी बनाई पोथी तिनको आगेधरिके बैलजे गुरुवा लोगन के चेलाहैं ते
पटवारी करैं हैं । अर्थात् कायानगरी के बसैया जे मन बुद्धि चित्त अहंकार
पृथ्वी अपू तेज वायु आकाश दशौ इन्द्रिय तिनको बिचारिके कि, कौन काके-
आधीनहै ज्ञानरूपी द्रव्य तहसील करैहै । वा पटवारीकैकै द्रव्य राजाके इहां
लेजाइहै । या ज्ञानरूपी द्रव्य आत्मा में राख्यो आइ अर्थात् काया नगरीकें
बसैया सब जीवात्मैते चैतन्यहैं याते आत्मै मालिकहै । यह निश्चयकियो ।
सो कबीरजी कहैं हैं हे संतो ! तुम सुनो वहां भैंसा जो है सोई न्याउ निबा-
रैहै, इहां भैंसाकहे गुरुवालोग जो हैं सोआपचहलामें परैहैं औ चहलामें परोजो