कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १९८ ) बीजक कबीरदास ।
औ वह अथ पांचवां शब्द ॥ ५ ॥
मुरीद के संतो अचरज यक भो भाई ।
आपै यह कहौं तोको पतिआई ॥ १ ॥
एकै पुरुष एक है नारी ताकर करहु बिचारा ।
एकै अंड सकल चौरासी भर्म भुला संसारा ॥ २ ॥
एकै नारी जाल पसारा जग में भया अंदेसा ।
खोजत काहू अंत न पाया ब्रह्मा विष्णु महेशा ॥ ३ ॥
नागफांस लीन्हे घट भीतर मूसि सकल जगखाई ।
ज्ञान खङ्ग बिन सब जगजूझै पकरि काहु नहिं पाई ॥ ४ ॥
आपुहि मूल फूल फुलवारी आपुहि चुनिचुनि खाई ।
कहैं कबीर तेई जन उबरेजेहिं गुरु लियो जगाई ॥ ५ ॥
संतो अचरज यक भो भाई। यह कहौं तो को¹ पतिआई १
एकै पुरुष एकहै नारी ताकर करहु बिचारा ।
एकै अण्ड सकल चौरासी भर्म भुला संसारा ॥ २ ॥
एकै नारी जाल पसारा जगमें भया अंदेसा ।
खोजत काहू अंत न पाया ब्रह्मा विष्णु महेशा ॥ ३ ॥
हे संतो ! शुद्धजीवो ! भाई एक बड़ो आश्चर्य भयो जो मैं वाको कहौं
तौ को पतियाय ॥ १ ॥ एकै पुरुषहै एकै नारीहै कहे वही जीवात्मा पुरुषौ है
नारिउ है ताको विचारकरो वा कौनहै ? एकै अंडमा कहे एक ही प्रणवमें उत्पन्न
चौरासीलाख योनि तामें परिकै यह जीव संसारके भर्ममें भुलायरह्यो है अथवा
एकही अंड कहे ब्रह्मांडहिमें ॥ २ ॥
१ कौन !