कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २०८ ) बीजक कबीरदास ।
मत्स्यादि अवतारनको मायिक कहिकै कबीरजी साहब को परतवदेखविहैं कि
साहब सबते भिन्नहैं ॥
संतौ आवै जाय सो माया ।
है प्रतिपाल काल नहिंवाकें नहिं कहुं गया न आया ॥१॥
हे संतौ! आवैजायहै सो तो मायाको धर्म है।जे साहब परम परपुरुष श्रीराम
चन्द्र हैं ते सबको मतिपालही भर करै हैं कहे उद्धार ई भर करैहैं औ काम
नहींकरै हैं । उनके कालनहीं है अर्थात् प्रलय आदिक नहीं होइहै । अथवा जो
कोई वे साहब को जानै है ताको कालको भय छूटिजायहै वे परमपुरुष श्रीरा-
मचन्द्र ना कहीं गये हैं न आये हैं ॥ १ ॥
क्या मकसूद मच्छ कच्छ होना शंखासुर न सँहारा ।
अहैदयालु द्रोह नहिं वाके कहौ कौनको मारा ॥ २ ॥
वे कर्त्ता न वराह कहावैं धरणि धरै नहिं भारा ।
ई सब काम साहबके नाहीं झूठ कहै संसारा ॥ ३ ॥
अरु वे उद्धारकर्त्ता परमपरपुरुष श्रीरामचन्द्रको क्या मकसूद कहे क्या
मक्सद है अर्थात् क्या प्रयोजनहै, मच्छ कच्छ होनेका । वे शंखासुरको नहीं
संहार्योहै शंखासुर उपलक्षण याते जिनको जिनको मार्यो है अवतारते सब
आइगये । अरु सो दयालु हैं सबकी रक्षाकरै हैं उनके द्रोह नहीं है कहौ कौनकों
मार्यो है ॥ २ ॥ अरु वे उद्धारकर्त्ता साहब वाराह नहीं भये औ न पृथ्वीको
भारा धर्यो सो जौन सबकोई कहै हैं कि, ई सब काम साहबहीके हैं सो यें
काम साहब के नहीं हैं यह संसार झूठई कहैहै सो साहबको बिना जाने
कहै हैं ॥ ३ ॥
खम्भ फारि जो बाहरहोई ताहि पतिज सब कोई ।
हिरणकशिपु नख उदर बिदारे सो नहिं कर्त्ता होई॥४॥