कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २०२ ) बीजक कबीरदास ।
अर्थात् जो साहबको जानै हैं औ अपने स्वरूपको जानै हैं कि, मैं साहबकोहौं
ताको माया स्वप्नवत्है । अथवा गुरुने सबते श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रहैं तेई जिनको
मोह निशामें सोवत जगाइदियो है अर्थात् हंसरूप दैके अपने पास बोलाइलियो है
तेई जन उबरै हैं कहे बचै हैं ॥ ४ ॥
इति पांचवांशब्द समाप्त ।
अथ छठाशब्द ॥ ६ ॥
संतो अचरज यक भारी । पुत्र धरल महतारी ॥ १ ॥
पिताके संग हि भई बावरी कन्या रहल कुमारी ।
खसमहिं छोड़ि ससुर सँग गवनी सो किन लेहु विचारी ॥२॥
भाई संग सासुरी गवनी सासु सौतिया दीन्हा ।
ननँद भौज परपंच रच्योहै मोर नाम कहिलीन्हा ॥ ३ ॥
समधीके सँग नाहीं आई सहज भई घरबारी ।
कहहि कबीर सुनो हो संतो पुरुष जन्म भो नारी ॥ ४ ॥
संतो अचरज यक भो भारी । पुत्र धरल महतारी ॥ १ ॥
पिताके संगहि भई बावरी कन्या रहल कुमारी ।
खसमाहिं छोड़िससुरसँग गवनी सो किन लेहु विचारी ॥२॥
हे सन्तो ! एक बड़ो आश्चर्य भयो पुत्र जो यह जीवहै ताकी महतारी जौं
मायाहै सो धरतभई ॥ १ ॥ अरु पिता जो ब्रह्म है ताके संग बावरी ह्वै जात-
भई, कहे जारपुरुष बनावतभई । अर्थात् माया सबलित ब्रह्म भयो औ कन्या
जो बुद्धि है सो पतिको निश्चय कहूं न करतभई । विचारै करत रहिगई ।
कुँवारिही रहतभई अर्थात् सब मतनमें खोजतभई परन्तु निश्चय न होतभई ॥
पहिले पिता जो ब्रह्महै ताको खसम बनायो, पुनि तौने खसमको छोड़िकै
ससुर जो है मन, कहे मैनैको अनुभव ब्रह्महै ताके सँग गवनत भई । सो हें