कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द । ( २०५ )
आपुहिं गुरू कृपा कछु कीन्हो, निर्गुण अलख लखाई ।
सहज समाधिं उनमुनी जागै,सहज मिलै रघुराई ॥ ३ ॥
सो गुरुनहैं सद्गुरुते जब आपही कृपाकरैहैं तब निर्गुण जो ब्रह्महै ताको
अलख लखावै हैं कि वे कछुवस्तुही नहीं हैं अर्थात् अलख हैं धोखाहै साहब
कब मिलै जब सहज समाधि उनमुनी मुद्रा करि जो सर्वत्र ब्रह्म देखैहै तौन
उनमुनी रूप निद्राते जागै अर्थात् सहजही समाधिकै चित् अचितरूप विग्रह या
जगत साहबको है यादेखै तौ सहजहीमें परम परपुरुष जे श्रीरामचन्द्र हैं
तें मिलैं ॥ ३ ॥
जहँजहँदेखौंतहँतहँसोई, मन माणिक वेध्यो हीरा ।
परम तत्त्व यह गुरुते पायो, कह उपदेश कबीरा ॥४॥
अधेधित अमौलिक आगे कहिआये ताको तो नेतिनेति कहै हैं वामें काहूको
मनहीं नहीं बेध्यो अर्थात् धोखही है अब साधुनको मन जो माणिक है अनु-
राग पूर्वक लागे सो साहब जे हीरा हैं तिनमें बेध्यो है । ऐसे जेसाहब चित्-
अचितरूप जहांजहां देखौहौ तहांतहां सोई है यह कबीरजी कहै हैं कि यह
परम तत्त्वको उपदेश मैं गुरुते पायोहै ॥ ४ ॥
इति सातवां शब्द समाप्त ।
अथ आठवां शब्द ॥ ८ ॥
अवतारविचार ।
संतौ आवै जायसो माया ।
है प्रतिपाल काल नहिं वाके ना कहुं गया न आया ॥१॥
क्या मकसूद मच्छ कच्छ होना शंखासुर न संहारा ।
अहै दयालु द्रोह नहिं वाके कहहु कौनको मारा ॥ २ ॥
वे कर्त्ता न वराह कहावैं धरणि धरै नहिं भारा ।