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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 262, कुल 766 में से

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पृष्ठ 262

होइहैं, सो पीछेलिखि आये हैं । जबउद्धारकर्त्ता साहब प्रकटहोइ हैं तब जे
देखन वारे सुननवारे हंसरूप में स्थित हैं तेई वहीरूपते देखैहैं सुनै हैं सच्चिदा-
नन्दात्मको (भगवान् सच्चिदानन्दात्मिका अस्यव्यक्तिः ) यह श्रुति करिकै
एकरूपताकहि आये हैं । याहीते लोकहूको व्यापक कह्यो । औ नारायण जौं
रामावतारलै अशोकवाटिका में लीला कियो सो वर्णनकरि मन बचनके परे जे
साहबहैं तिनके लीलाको व्यंजित करै हैं । सो व्यंजित तो करै हैं परन्तु मनब-
चनके परे जेसाहब हैं तिनके नामरूप लीलाधाम मनबचनके परे साकल्य करि-
कैव्यंजितऊ नहीं करिसकै हैं । सो यह बातजो कोई साहब करिकै हंसरूपपाये
हैं, सोसाहबके मनकारिकै साहबको नामादिक जानै है। औ जपै है औ साहबके दिये
रूपकी आंखीते साहबको देखै है । तामें वेदसारोपनिषत् को प्रमाण ॥ ३७॥
( जनकोहवैदेहो याज्ञवल्क्यमुपसृत्यपप्रच्छकोहवैमहान्पुरुषोयंज्ञात्वेहविमुक्तो-
भवतीति ॥ १ ॥ सहोवाचकौशल्योरघुनाथएवमहापुरुषः तस्यनामरूपधाम-
लीला मनो वचनाद्यविषयाः सपुनरुवाचेदृशं कथमहं शक्नुयां विज्ञातुंज्ञापकाज्ञा-
नादितिसपुनः प्रतिवक्ति अथैते श्लोकाभवंति ॥ विरजायाः परे पारे लोको वैकुण्ठसं-
ज्ञितः ॥ तन्मध्येराजतेयोध्या सच्चिदानन्दरूपिणी ॥ ३ ॥ तत्रलोकेचतुर्बाहु
रामोनारायणः प्रभुः ॥ अयोध्यांयादचास्य अवतारोभवेदिह ॥ ४ ॥ तदा-
स्ति रामनामेदम्भव-रविधौविभोः ॥ तन्नाम्नोनामरहितस्यान्ना तं नाम तस्यहि
॥ ५ ॥ दशकण्ठवधाद्यादिलीलाविष्णोः प्रकीर्त्तिताः ॥ सकदाचिच्च कल्पेस्मिँ-
ल्लोकेसाकेतसंज्ञिते ॥ ६ ॥ पुष्पयुद्धंरघूत्तंसः करोति सखिभिः सह॥ ७॥ कस्मिन-
न्कल्पेतुरामोसौ बाणजन्यેચ્છया.विभुः ॥ तैरेवसखिभिः सार्द्धमाविर्भूय रघूद्वहः
॥ ८ ॥ रावणादिवधैलीला यथाविष्णुः करोतिसः ॥ तथायमपितत्रैवकरोति-
विविधाः क्रियाः ॥ ९ ॥ क्रियाश्च वर्णयित्वाथ विष्णुलीलाविधानतः ॥ लीला-
निर्वचनीयत्वंततोभवतिमूचितम् ॥ १० ॥ किंचायोध्यापुरोनामसाकेतइतिसो-
च्यते ॥ इमामयोध्यामाह्वाय सायोध्यावर्ण्यतेपुनः ॥ ११ ॥ अनिर्वाच्यत्व-
मेतस्याव्यक्तमेवानुभूयते ॥ रामावतारमाधत्तेविष्णुः साकेतसंज्ञिते ॥ १२ ॥
तद्रूपंवर्णयित्वानिर्वचनीयमभोः पुनः ॥ रूपमाख्यायतेविद्भिर्महतः पुरुषस्य हि
॥ १३ ॥ इत्यथर्वणवेदेवेदसारोपनिषदिप्रथमखण्डे ) श्रीकबीरजीका यहीमतहै
कि, साकेतछोड़िकहूं नहींजायहै नित्यबिहारी हैं ॥ ११ ॥
इति आठवां शब्द समाप्त ।