कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २०४ ) बीजक कबीरदास ।
अथ सातवां शब्द ॥ ७ ॥
संतो कहौ तो को पतिआई । झूठा कहत सांच बनिआई १
लौकै रतन अवेध अमौलिक नहिं गाहक नहिं सांई ।
चिमिकि चिमिकि चमकै दृग दुहुं दिशि अरव रहा छरिआई
आपहि गुरु कृपा कछु कीन्हो निर्गुण अलख लखाई ।
सहज समाधि उनमुनी जागै सहज मिलै रघुराई ॥ ३ ॥
जहँ जहँ देखौ तहँ तहँ सोई मन माणिक वेध्यो हीरा ।
परम तत्त्व यह गुरुते पायो कह उपदेश कबीरा ॥ ४ ॥
सन्तो कहौ तो को पतिआई।झूठा कहत सांच बनि आई १
हे संतो ! झूठा जो ब्रह्महै ताको कहत कहत जीवन सांचबनि आई वही
ब्रह्मको सांच मान लियोहै अब जो मैं सांच साहबको बताउंहौं तो को पतिआय
अर्थात् कोई नहीं पतिआय है ब्रह्महींमें लगे हैं ॥ १ ॥
लौकै रतन अवेध अमौलिक नहिं गाहक नहिं साँई ।
चिमिकि चिमिकि चमकै दृग दुहुं दिशि अरव रहा छरिआई
लौ लगनको कहैं हैं सो वा ब्रह्म माही हौं या जो लौ कहेलगन ताही ज्ञानको
रतनकै अबेधित अमोलिक मानि जामें गाहक औ सांई नहीं है ( अर्थात् दूसरा
तो हंई नहीं है गाहक सांई कहांते होय ) सो वही ज्ञानको ब्रह्म मानि लियो
है । तौने ब्रह्म उनके दृगन में चमकि चमकि चमकैहै, सर्वत्र देखो परै है ।
जोकहो लोक प्रकाश ब्रह्मही देखो परै है सोनहीं अरु जो या हठ है कि, सर्वत्र
ब्रह्मही है सोईजो बरहा है सो छरिआई रह्योहै सर्वत्र ब्रह्मही देखायहै जैसे
बरहामें जलबढ़े सर्वत्र फैलिजाय है ऐसे अहंब्रह्मास्मि जो या ज्ञान सो जब
बढ्यो तब याको हठहीरूप ब्रह्मदेख्यो परैहै ॥ २ ॥