कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द । ( १९५ )
न्यारो न्यारो भोजन चाहैं पांचौ अधिक सवादी ।
कोउ काहूको हटा न मानै आपुहि आपु मुरादी ॥ २ ॥
अपने अपने न्यारे न्यारे भोजन चाहै हैं पांचौं बड़े सवादी हैं । आकाश
श्रोत्रइन्द्रियप्रधानहै सोशब्द चाहै है । वायु त्वचा इन्द्रिय प्रधान सो स्पर्शको
चाहै हैं । तेज चक्षुइंद्रिय प्रधानहै सो रूपको चाहैहै । जल रसनेन्द्रिय प्रधानहै
सो रसको चाहै है धरती घ्राणेंद्रिय प्रधानहै सो गंधको चाहैहै औ माया
जीवहीको ग्रासन चहैहै । कोईकाहूको हटको नहीं मानैहै आपही आप मालिक
ह्वेरहेहैं । आपुही आपु अपनी मुरादिकहे वांछापूरकरैहैं ॥ २ ॥
दुर्मतिकेर दोहागिनिमेटै ढोटै चापचपेरै ।
कहकबीरसोई जनमेरा घरकीरारिनिवेरै ॥३॥
दुर्मति जेहैं गुरुवालोग ( जे परमपुरुष श्रीरामचन्द्रको छोड़ि आत्मही
को सत्य मानै हैं औ या कहैहैं कि, सबसुख करिलेउं वहां कछु नहीं है ऐसे
जेनास्तिकहैं ) तिनकी दोहागिनिकहे नहींग्रहणलायक वाणी तिनको मेटिकै
कहे छोड़िकै; ढोटाजेहैं पांचौ तत्त्व तिनको जोहै चाप कहे दबाव ताको आपै
चपेरै कहे दबाइलेइ । अर्थात् वे न दबावन पावैं । अपने अपने विषयनमें
मनको खैंच लैजाइहैं तहां मन न जानपावै । सो कबीरजी कहै हैं कि,जोपारि-
ख करिकै शरीर जो घर है तौनमें जो पांचों इन्द्रिनको झगड़ा है ताको
निबेरै कहे सब तत्त्व जे पृथ्वी आदिक हैं तिनमें लीन जे पांचों इंद्रिय हैं
तिनकी जे विषय हैं तिनको निबेराकरै कि, भगवतकी अचिद् विग्रहहै । पृथ्वी
आदिक तत्त्वरूप करिकै जो देखै है; इन्द्रियरूप करिकै जो देखै औ विषयरूप
करिकै जो देखैहै सो न देखै । औ यह मानै कि, मैं जोहौं जीवात्मा तौनेकी
एकौ नहींहैं; काहेते कि, मैं चिदचित् विग्रहहौं, ये जड़ विग्रहहैं, इनते भिन्नहौं
सो ये जेहैं जड़ ते आत्मैकी चैतन्यता पाइकै आपसमें लड़ैहैं । सो इनते जब
१ दुर्मत अर्थात् दुष्ट बुद्धिवाले पुरुषजिनको परमार्थका तो ज्ञान है ही नहीं परन्तु
देखादेखी वेष धारनकर अथवा कुलाभिमानसे गुरु बने बैठे हैं ऐसे जे झूठे गुरुलोग हैं
उनको गुरुवाकहते हैं उन्हींको दुर्मत कहते हैं ।