कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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जीवो ! अपनेते काहे नहीं बिचारिलेउ है कि माया हमारे मन में पैठिकै
और औरमें बुद्धि निश्चय करावै है ॥ २ ॥
भाई के संग सासुर आई सासु सौतिया दीन्हा ।
ननँद भौज परपंच रच्योहै मोरनाम कहि लीन्हा ॥ ३ ॥
प्रथम याको भयभई तब या बिचार कियो कि "द्वितीयाद्वै भयं
भवति" ॥ तबहीं माया लगी याते भाई भयो । मायाको भय सोई भाई के साथ
नाना मतवारे जे गुरुवालोग तिनको जो मन है सोई सासुर है तहां आई
औ तिन गुरुवनकी बाणी जोहै सोई सासुहै काहेते ब्रह्मकी उत्पत्ति
बाणीहीसे होतीहै सो गुरुवनकी वाणी रूप जो मायाकी सासु ताकी सवति जो
दीक्षारूप सो मायाको देतभई। सो मायाते दैवयोग छूटि उजाय परन्तु दीक्षास-
वतिते नहीं छूटै है । सो मायाकी सवतिदीक्षा काहेतेभई,माया तो ब्रह्मकी स्त्री
है सो ताही ब्रह्म को दीक्षाहू लगावै है सो ज्ञान विद्यारूप है सो ब्रह्मके
साथही भई, ब्रह्मकी बहिनिभई, मायाकी ननँद कहाई तौन अविद्या ब्रह्मको पति
बनायो सो भौजी आप भई सो ये दोऊ भौजी नँनद मिलिकै परपंच रच्योहै
अरु जीव कहै है मेरो नाम कह दियो है कि, जीवही सब करै है ॥ ३ ॥
समधीके सँग नहीं आई सहज भई घरवारी ।
कहै कबीर सुनो हो सन्तो पुरुष जन्मभोनारी ॥ ४ ॥
मायाकी कन्या बुद्धि कहि आये सो बुद्धि कुँवारहीमें नानाजीवनको जारप-
ति बनायो सब जीव साहबके अंशहैं ताते सब जीवनके बाप साहब ठहरे सो
मायाके समधी भये । तिनके घरवारी कहे आपही सब जीवनके बिवाहलेत
भई अर्थात् बशकर लेत भई । सो कबीरजी कहै हैं कि, हे संतो जीव ! जो
पुरुष है सो माया के साथनारी ह्वैगयो ॥ ४ ॥
इति छठाशब्द समाप्त ।