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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

( ११२ ) बीजक कबीरदास ।
अथ अड़तीसवींरमैनी ।
चौपाई ।
यहिविधिकहौं कहानहिंमाना।मारगमाहिंपसारिनि ताना १
रातिदिवसमिलिजोरिनितागा।ओटतकाततभर्म न भागा २
भर्मै सबघट रह्यो समाई। भर्मछोड़ि कतहूं नहिं जाई॥३॥
परैनपूरि दिनोंदिन छीना।जहां जाहु तहँ अंगविहीना ॥४॥
जोमतआदिअंतचलिआया।सोमतिउनसवप्रगटसुनाया ५
साखी ॥ वहसंदेश फुरमानिकै, लीन्हो शीशचढ़ाय ॥
संतोहै संतोषसुख, रहहु तौ हृदय जुड़ाय ॥ ६ ॥
यहिविधिकहौंकहानहिंमाना।मारगमाहिंपसारिनिताना १॥
कबीरजी कहैहैं कि सत्ययुगमें सत्यसुकृत नामते, त्रेतामें मुनीन्द्र नामतें,
द्वापरमें करुणामय नामते, कलियुगमें कबीर नामते, मैं चारो युगमें जीवनको
रामनामको अर्थ साहबमुख समुझायो पै कोई जीव कहा न मान्यो वेदमार्गमें
ताना पसारतभये कहे अपने कहे अपने अपने मतमें अर्थ करिलेतेभये ॥ १ ॥
रातिदिवसामिलिजोरिनितागा।ओटतकाततभर्मनभागा २॥
औ रातिउ दिन तागा जोरतभये कहे वेदार्थको अपने अपने मतमें लगावत
भये अर्थात् जहां जहां अर्थ नहीं लगैहै तहांतहां अपने मतमें योजित
करतभये औ ओटत कातत कहै शंकासमाधान करत करत भर्म न भाग्यो यहां
ताना प्रथम कह्यो ओटब कातब पीछे कह्यो सो प्रथम शंका समाधान करिकै
काति ओटि कै ताना तनतभये अर्थ बनावत भये जब बन्यो तब फेरफेर शंका
समाधान करि ओटिकाति अर्थको ताना पसारत भये भर्म न भाग्यो एक
सिद्धांत न भयो ॥ २ ॥

रमैनी । (११३)
भर्मै सबघट रह्योसमाई । भर्मछोड़ि कतहूं नहिं जाई ॥३॥
परैनपूरदिनौदिनछीना। जहां जाहु तहँ अंग विहीना ॥४॥
जोमतआदिअंतचलि आया। सोमतउनसबप्रकटलखाया ५
वही भर्म घट घटमें समाइ रह्यो है भर्म छोड़िकै अनत न जात भये वही
संशयमें रहिगये॥ ३॥पूर नहीं परैहै कहै निश्चय नहीं होइहै दिनौदिन क्षीण होत
जाइहै क्षीणकहां होइहै कि, यह जानैहै कि हमारो अज्ञान दूरिभयो पै जहां
जाईहै तहँ निराकार धोखई मिलैहै हाथ कछु नहीं लगैहै ॥४॥ वेदको अर्थ तौ
परोक्षहैकहै अमरहै तात्पर्य वृत्तिकरिकै साहबको लखावैहै तौन अनादिमत ताकों
न समुझतभये वहवेदको अर्थ गुरुवालोग प्रगट करिकै अर्थात् अपरोक्ष जौन
आदि अंतते चलो आयो है ताको बऊ परिगयो ॥ ५ ॥
साखी ॥ वहिसंदेश फुरमानिकै, लीन्हों शीशचढ़ाइ ॥
संतोहै संतोषसुख, रहहुतौहृदय जुड़ाइ ॥ ६ ॥
वही तत्त्वमसि उपनिषत्को संदेश शीश चढ़ाइ लेतेभये वेदनमें वाणीमें
तात्पर्य करिकै सांचपदार्थ कह्यो ताको न जानतभये संतपद संतोष सुखहै तौने
जो रहौ तौ हृदय जुड़ाइ औरेमें तो तापई होइगो काहेते सबतें परे है जाकों
साहब दूसरो नहींहै ऐसे जे चक्रवर्ती श्रीरामचन्द्रहैं तिनको जबपायो तब उनते कम
ब्रह्महोबेकी ईश्वरके मिलिबेकी और मायिक जेपदार्थ हैं तिनके मिलिबेकीचाहई
न होइगी काहेते कि वहचक्रवर्ती के मिलिवेकेसमसुख नहीं है ब्रह्मानंद विषया-
नंद आदिकनमें जबलगैगो तहहीं सबते संतोष है याको मन शांतहै जाइगो॥६॥
इति अड़तीसवीं रमैनी समाप्त ।
अथ उन्तालीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
जिन्हकालिमा कालिमाहँ पढ़ाया। कुदरतखोजि तिन्हौं नहिं पाया
करिसतकर्म करै करतूती । वेद किताबभयासवरीती ॥२॥
८

( ११४ ) बीजक कबीरदास ।
करमतसो जो गर्भऔतरिया। करमत सोजोनामहिंधररिया ३
करमत सुन्नति और जनेऊ । हिंदू तुरुक न जानै भेऊ ॥४॥
साखी ॥ पानीपवन सँजोयकै, रचिया ई उतपात ॥
शून्यहिंसुरतिसमानिया, कासोकहियेजात ॥५॥
जिन्हकलिमाकलिमाहँ पढ़ाया। कुदरतखोजितिन्हौंनाहिंपाया
कारिसतकर्मकरैक रतूती । वेदकिताब भया सबरीती ॥ २ ॥
जिन्ह महम्मद सबको कलियुगमें कलिमा पढ़ायोहै तेऊकह्योहै कि हम
अल्लाहके कुदरतको खोजकहे अंतनहीं पायो ॥ १ ॥ आपन आपन मतकरिकै
करतूति कैकै कर्म करनलगे सो वेदकिताब सबरीति हैजातभये ॥ २ ॥
करमतसोजोगर्भऔतरिया । करमतसोजोनामहिंधररिया ३
करमत सुन्नति और जनेऊ । हिंदू तुरुक न जानैभेऊ ॥४॥
कर्महिंते गर्भमें आय अवतार लेतेभये अरु कर्महीते नामधरतभये ॥ ३ ॥
औ कर्मैते सुन्नति औ जनेऊ चलतभयो ताको भेद हिंदू तुरुक दूनो न
जानत भये ॥ ४ ॥
साखी ॥ पानी पवन संजोयकै, रचिया ई उतपात ॥
शून्यहिंसुरतिसमानिया, कासोकहियेजात ॥५॥
पानी कहैविंदु अरुपवन ये दूनौके संयोग ते गर्भभयो कहे शरीररूपी उतपात
खड़ाभयो सो कर्म में लगे जन्म मरणादिक येते उतपात भये पै कर्म न छोड़
तभये अरु जिन कर्म छोड़िबोऊकियो तिनकी सुरति शून्यैंमें समाइ जाती
भई सो वहांकी बात कासों कही जातहै अर्थात् काहूसों नहीं कहिजातहै नेति-
नेतिकहिदेइ हैं अर्थात् उहां तौ शून्यहै कुछहाथ न लग्यो ॥ ५ ॥
इति उन्तालीसवीं रमैनी समाप्त ।

रमैनी । ( ११५ )
अथ चालीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
आदम आदि सुद्धि नहिंपावा।मामाहौवा कहँ ते आवा॥ १ ॥
तबहोते न तुरुक औ हिन्दू।मायके रुधिर पिताकेविन्दू॥२॥
तवनहिंहोते गाय कसाई।कहुबिसमिल्लहकिनफुरमाई॥३॥
तवनरहोहै कुलऔजाती।दोजकभिस्तकहां उतपाती॥४॥
मनमसलेकीख़वरि न जानै।मतिभुलानदुइदीनवखानै॥५॥
साखी ॥ संयोगे का गुनरवै, विनयोगे गुणजाय ॥
जिह्वास्वादकेकारणे, कीन्हे वहुत उपाय ॥ ६ ॥
आदमआदिसुद्धिनहिंपावा । मामाहौवाकहँते आवा ॥१॥
तबहोते न तुरुक औ हिंदू । मायकेरुधिरपिताकेविंदू॥२॥
आदि आदम जे ब्रह्मा ते मामाकहे जगतपिता हौवा नामऐसी जो वाणी
ब्रह्माकी नारी सो ब्रह्माही सुधि ना पायो कि कहां ते आई है ॥ १ ॥ तब
आदिमें न हिंदू रहे न तुरुक रहे औ मायके रुधिरते पिताके बिंदुते गर्भ
होइहै सोऊ नहीं रह्यो ॥ २ ॥
तवनहिंहोतेगायकसाई । कहुबिसमिल्लहकिनफुरमाई ॥३॥
तवनरहोहैकुल औजाती । दोजकभिस्तकहांउतपाती॥४॥
मनमसलेकीखवरिनजानै।मतिभुलानदुइदीनवखानै ॥५॥
तब न गाइ रही न कसाई रहे सो जो बिसमिल्ला कहिकैहलाल करै है
सो किन फुरमांईहै ॥ ३ ॥ अरु तब न कुलरह्यो औ न जाति रही दोजक
भिस्त कहांरहोहै ॥ ४ ॥ मनके मसलेकी सुधि न जान्यो कि ई मेरेमनके
बनाये हैं दोनोंदीन । औ अपने आत्माको मत न जान्यो कि यह न
हिंदू हैं न मुसलमान है मतिहीन दुइदीन बखानत भये ॥ ५ ॥

(११६) बीजक कबीरदास ।
साखी । संयोगेका गुणरवै, विनयोगे गुणजाय ॥
जिह्वास्वादके कारणे, कीन्हे बहुत उपाय ॥६॥
जब मनको आत्माको संयोग होइहै तबहीं संकल्प होइहै औ तबहीं गुणहों-
यहै अरुजब मनको आत्माको संयोग नहीं होइ है तबगुण जाइहै कहेगुणी
नहीं रहैहै अरुसंकल्पौ नहीं रहैहै सोनर जेहैं ते जिह्वा सुखके कारण औ शिश्न
(इन्द्रिय) सुखकेकारण बहुत उपाय करतभये औ मन औ आत्माको संयोग
छोड़ावनको उपाय करतभये औ जे मन आत्माको संयोग छोड़यौहै ते आपनें
स्वस्वरूप को प्राप्त भये हैं ॥ ६ ॥
इति चालीसवीं रमैनी समाप्तौ ।
अथ इकतालीसवीं रमैनी।
चौपाई ।
अंबुकिराशिसमुद्रकिखाई।रवि शशिकोटि तैंतिसौभाई॥१॥
भँवरजालमें आसनमाड़ा।चाहतसुखदुखसंग न छाड़ा॥२॥
दुखकामर्म काहुनहिं पाया।बहुतभांतिकै जग बौराया॥३॥
आपुहिबाउर आपुसयाना।हृदयावसत रामनहिंजान॥४॥
साखी ॥ तेई हरि तेइ ठकुरा, तेई हरिके दास ॥
जामें भया न यामिनी,भामिनिचलीनिरास॥५॥
अम्बुकिराशिसमुद्रकीखाई । रविशशिकोटितैंतिसौ भाई १
भँवरजालमें आसनमाड़ा । चाहतसुखदुखसङ्गनछाड़ा॥२॥
अंबुकहै बिंदु ताकीराशि शरीरहै समुद्र जो है संसारसागर ताकीखाई है
अर्थात् संसारहीमें सबशरीरपरेहैं जैसे जलजीव समुद्रमें रहैहै तैसे ताना जीवनकें

रमैनीं। (११७)
शरीर परे रहे हैं औ सूर्य चंद्रमा तेंतीस कोटि देवता ॥ १ ॥ यही संसारसाग-
रके भँवरजालमें परे कबहूं नरकको जायैंहैं कबहूं स्वर्गको जायैंहैं याहीभांति
सब जीव औ सब देवता चाहत तो सुखको हैं कि हमको सुखहोय पै दुःखरूप
जो संसारहै ताको संग नहीं छोड़ै हैं ॥ २ ॥
दुखकामर्मकाहुनहिंपाया । बहुतभांतिकेजगबौराया ॥ ३ ॥
आपुहिबाउरआपुसयाना।हृदयावसतरामनहिंजाना ॥ ४ ॥
वह दुःखरूप जो संसारहै ताको मर्मकोई न जानतभयो बहुत भांति करिकै
जगमेंसबजीव बौरायगये॥३॥सो जीवजेहैं ते आपुहीते बाउर होतभये अरु आप-
हीते सयान होतभये हृदयमें बसत जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनको न जानतभये अर्थात्
जे संसारमें परे हैं ते तौ बाउरई हैं जे आपनेको बहुत ज्ञानी मानै हैं औ सयान
मानेहैं तेऊ बाउरै हैं अर्थात् जे और२ ईश्वरनके दासभये औ जे आपहीको ब्रह्म
मानत भये कि हमहीं ब्रह्महैं औ आपने आत्मैको मानत भये तिनको साहब
को ज्ञान नहीं होयहै याहेतुते दुःखही को सुख मानैहै ॥ ४ ॥
साखी ॥ तेई हरितेई ठाकुरा, तेई हरिके दास ॥
जामें भया न यामिनी, भामिनिचली निरास॥५॥
तेई जे जीवहैं ते अपने को हरि मानत भये औ आपनेही को ठाकुर मानत
भये कि हमहीं जगतकर्ता हैं और आपनेही को हरिके दास मानतभये अर्थात्
सब आपहीको मानतभये औ यामिनी कहावै है लगनिया वह बस्तु कराइदेइ
है सो पूरागुरु कहावै है सो यह जीवको उद्धार कराइदेई है सो जो जो जीव
पूरागुरु रामोपासक ना पायो जो समुझाइदेइ कि यह धोखाहै तिन जीवनते
भामिनि जो मुक्ति सो निराश ह्वैगई कि ई न मुक्ति होयँगे ॥ ५ ॥
इति इकतालीसवीं रमैनी समाप्त ।

( ११८ ) बीजक कबीरदास ।
अथ बयालीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
जबहमरहल रहानहिंकोई । हमरेमाहँरहलसबकोई ॥ १ ॥
कहहुसोरामकवनतोरसेवा। सोसमुझायकहौ मोहिंदेवा ॥२॥
फुरफुरकहउँ मारुसबकोई । झूठे झूठा संगति होई ॥ ३ ॥
आंधर कहै सबै हमदेखा।तहँ दिठियारपैठिमुँहपेखा ॥ ४ ॥
यहिविधिकहौमानुजोकोई। जसमुखतसजोहृदयाहोई॥५॥
कहहिं कबीरहंसमुकुताई । हमरे कहले छुटिहौभाई ॥ ६ ॥
जबहम रहलरहानहिंकोई । हमरेमाहँरहलसबकोई ॥१॥
कहहुसोरामकौनतोरसेवा।सोसमुझायकहौ मोहिंदेवा ॥ २॥
श्रीकबीरजी कहैं हैं कि जबहम साहबके लोकमें रहे हैं तबतुम कोई नहीं
रहेहौ तुमसब हमरे साहबके लोकमकाशमें रहेहौ ॥ १॥ अपनेको रामतौ कहौहौ
तुम्हारीसेवाकौनहै कहां वेदपुराणमें लिखोहै कि इनकी सेवा किये मुक्तिहोइगी
सो तुमदेवता बने फिरौहौ परन्तु मोको समुझायके कहौतौ कौन मुनि
तुम्हारी सेवा कियो है काकी मुक्ति भई है ॥ २ ॥
फुरफुर कहउँमारुसब कोई । झूठेझूठासंगतिहोई ॥ ३ ॥
जों कोई फुरफुर कहैहै तौ सब मारनधावैहै अर्थात् जो कोई कहैहै कि तुम
साचहौ साहबकेहौ तौ मारन धावै है शास्त्रार्थ करि लैहै काहेते लोकमें
रीतिहै कि झूठेकी झूठेनसो संगतिहोयहै सो सांच जो जीव सो झूठामन उत्प-
त्तिकरिकै झूठा जो धोखाब्रह्म ताहीके संग होत भये ॥ ३ ॥
आंधरकहैसबैहमदेखा । तहँदिठियारपैठिमुँहपेखा ॥ ४ ॥
साहबके ज्ञानते बिहीन जे आंधर हैं ते याकहै हैं कि वेदशास्त्र पुराणमें
अर्थ सबहम ब्रह्मरूपई देखा है जाके देखेते सबको ज्ञान हमको ह्वैगयो तामें

रमैनी । (११९)
प्रमाण ॥ (येनाश्रुतंश्रुतंभवत्यमतंमतमविज्ञातं विज्ञातं भवति) ॥तहां दिठियार जे
साहबके देखनवारे ते वोई श्रुतिनमें साहबमुख अर्थ देखैहैं कैसे जैसे येनाश्रुतं
श्रुतं कहे जौने रामनामके सुने जो नहीं सुनाहै सोऊसुनै असहोइजाइहै काहेते
वेदशास्त्र पुराणादि रामनामहीते निकसे हैं औ जौने रामनामके जानेते यह जो
असत्य है सर्वत्र ब्रह्ममानिबो धोखा सो मत होइ जाइहै अर्थात् परमपुरुष
श्रीरामचन्द्रको चितअचित विग्रही सब को माने है औ मन बचनके परे जे
अविज्ञात साहब ते रामनाम साहबमुख अर्थ में व्यंजित होयहै अथवा रामना-
मको जानिकै साधन किहेते साहब हंसरूप दै तब जाने जाइहै ॥ ४ ॥
यहिविधिकहौँमानुजोकोई । जसमुखतसजोहृदयाहोई॥५॥
कहहिंकवीरहंसमुसकाई । हमरे कहले छुटिहौ भाई ॥ ६ ॥
सो याभांतिते मैं सब जीवनको समुझाऊं हौं पैकोई बिरला मानैहै कौन
मानैहै जौन जस मुखते कहैहै तैसे हृदयते होइहै ॥ ५ ॥ कबीरजी कहैहैं कि
मुसकाई मुसकैंबंधी जीवोहमारेही कहेते तुम छूटौगे औरि भांति न छूटौगे
मुकुताई पाठहोय तौ याअर्थ मुक्तिहोबेकीहैइच्छाजिनके ॥ ६ ॥
इति बयालीसवीं रमैनी समाप्त।
अथ तेंतालीसवीं रमैनी।
चौपाई ।
जिनाजिवकीन्हआपुविश्वासा।नरकगयेतेहिनरकहिवासा १
आवत जात न लागहि वारा।कालअहेरी सांझ सकारा॥२॥
चौदहिविद्यापढ़ि समुझावै।अपनेमरनकि खबरि न पावै३॥
जाने जिवको परा अंदेशा । झूठ आनिकै कहै संदेशा॥४॥
संगतिछोड़ि करै असरारा । उबहै मोट नरककी धारा॥५॥

( १२० ) बीजक कबीरदास ।
साखी ॥ गुरुद्रोही औ मनमुखी, नारी पुरुष विचार ॥
तेनरचौरासीभ्रमाहिं, जवलगि शशिदिनकार ॥६॥
जिनजिवकीन्ह आपुविश्वासा। नरकगयेतेहिनरकहिवासा १
जे नर अपने में विश्वास कियो कि हमारो जीवात्माहै सोई मालिकहै दूसर
नहीं है । एकैहै ते नरकी मुक्तिकी बातैं कौनकहै वे स्वर्गहू नहीं जायँहैं नरकमें
जायकै नरकहीमें वास किये रहे हैं काहेते नरकही जायँहैं कि इहांतौ तीर्थ
व्रत संयम जो स्वर्गजावे को उपायहै तेतौमिथ्यामानिछांड़िदियो जीवात्मैको-
मालिकमान्यो दूसरा मालिक न मान्यो जो यमतें रक्षाकरै औ वेद पुराण को
मिथ्या मान्यो छूटनको उपाय एकौ न कियो जब यमदूत मोगरालैकै मारन-
लगे बांधिकै कांटामें कढ़िलावनलगे तबमूढ़पुकारनलाग्यो गुरुवा लोगनको तें
रक्षा न किये औगुरुवालोगनहूकी वही हवाल देखनलग्यो सो साहबको नाम
तो सबछोड़िकै लियोनहीं जो यमते रक्षाकरि वहांको लैजाय इहांस्वर्गजाबेवारो-
सुकर्म कियो नहीं ये अहमक ऊंटके से पाद जन्म गँवाइ दिये न इतके भये ना
उतके भये तामें प्रमाण ॥ “रामनाम जान्योनहीं कहाकियो तुमआय ॥
इतकेभये न उतके रहियाजनमगँवाय” ॥ १ ॥
आवतजात नलागहिवारा । कालअहेरीसांझसकारा ॥ २ ॥
चौदहविद्यापढ़िसमुझावै । अपने मरणकिखबरिनपावै॥३॥
आवत जात बारनहीं लगैहै कहे पुनिपुनि जन्म लेइ है काल जो अहेरीहै
सोसांझ सकार उनहींको खायहै वही बासना उनकी बनीरहैहै फेरि वाही मनमें
आरूढ़है फेरि वही नरकही को जायहै॥२॥औ चौदहौ विद्या पढ़िकै गुरुवालोग
जेहैं ते औरैकोतौ समुझातैं हैं परंतु अपने मरणकी खबरि नहीं पावैहैं ॥३॥
जानोजियकोपराअंदेशा । झूठ आनिकै कहै संदेसा॥ ४ ॥
संगति छोड़ि करै असरारा । उवहै नर्कमोटको भारा ॥५॥

रमैनी । ( १२१ )
जे जीवात्महींको जानै हैं साहबको नहीं जानै हैं तिनहीं को अंदेशपरै है
काहेते कि सब झूठहीहै वही सँदेश कहैहैं जबयमदूत मारनलगै तब वा मारु-
देखि उनको अंदेश परैहै कि हमारी रक्षा कौनकरै है सो या पापिनकी दशा
गरुड़ पुराणमेंप्रसिद्धहै ४ साहबके जाननवारे जैसाधुहैं तिनकी संगति छोड़िकै
जेअसरारकहे कफरई करैहैं अपने जीवात्मैको मालिक मानैहैं साहबको नहीं
जानैहैं उकहे वे जेदुष्टहैं ते बहै मोटनरकको भारा कहे नरकको है भार जामें
ऐसी जोमायाकी मोटरी ताहीको बहै कहे ढोवैहैं ॥ ५ ॥
साखी ॥ गुरुद्रोही औ मनमुखी, नारीपुरुषविचार ॥
तेनरचौरासीभ्रमाहिं, जब लगिशशिदिनकार॥६॥
कबीरजी कहैहैं कि शुकादिक मुनि वेद पुराण साधु औ जे जे साहबके
बतावन वारेहैं सो येई गुरुहैं जो कोई इनकी बाणी को मिथ्या मानै है सोई
गुरुद्रोही है सो गुरुद्रोही औ मनमुखी कहे अपने मनैते नारिनर विचारिकै जे
एक जीवात्महींको मालिकमानै हैं ते चौरासी लक्ष योनिही में जबलगि सूर्यचन्द्र-
मा रहै हैं तबलगि वाहीमें परे रहैहैं ॥ ६ ॥
इति तैंतालीसवीं रमैनी समाप्त ।
अथ चौवालीसवीं रमैनी ।
चौपाई
कवहूं न भये संग औ साथा । ऐसो जन्म गँवाये हाथा ॥ १॥
बहुरि न ऐसो पैहौ थाना । साधुसंगतुमनहिं पहिंचाना ॥२॥
अवतौ होइ नरकमें वासा। निशिदिनपरेलवारके पासा॥ ३॥
साखी ॥ जात सवन कहँ देखिया, कहै कबीर पुकार॥ ॥
चेतना होहु तौ चेति ले, दिवस परत हैं धार ॥ ४ ॥

( १२२ ) बीजक कबीरदास ।
कबहुंन भये संग औ साथा । ऐसो जन्म गँवाये हाथा ॥ १॥
साहबके जाननवारे जे साधु तिनको सत्संगकबहूं न कियो औ उनके बताये
साहबको साथ कबहूं न कियो जेहिते आवागमन रहित होय मनुष्य ऐसोजन्म
अपने हाथते गमायदियो ॥ १ ॥
बहुरि न ऐसो पैहौथाना । साधुसंगतुम नहिंपहिचाना॥२॥
अबतोरहोइनरकमेंवासा । निशिदिनपरैलवारकेपासा ॥३॥
ऐसोस्थानकहे मनुष्यदेह तुम फेरि न पावोगे साधुसंग तुम नहीं पहिचान्योहैं
साधुसंगकरो जो पूरागुरु पाइजाउगे तौ उबार ह्वै जाइगो॥२॥धोखाजो है ब्रह्म
औ माया ताके उपदेश करनवारे जे हैं गुरुवालोग लवरा तिनके पास में निशि-
दिन परचो है सो बिना पारिख तेरो नरकही मो बासहोइगो ॥ ३ ॥
साखी ॥ जातसवनकहँदेखिया, कहैंकबीरपुकार ॥
चेतवाहौतौचेतिले, दिवसपरतहै धार ॥ ४ ॥
दूनौं ब्रह्ममायाके धोखा में सब को नरक जातदेखिकै कबीर जी पुकारिकै
कहैंहैं कि चेतिबे को होइ तो चेतौ नहींतौ दिनैकै तिहारे ऊपर धारपरैहै कहे
गुरुवालोगनको डाकापरैहै भाव यह है जो गुरुवा लोगन को डाका तुम्हारे
ऊपर परैगो औ वह ब्रह्म को उपदेश करेगो औ तुम्हारे वह धोखा दृढ़परिजा-
इगो तौ तुम मारेपरोगे कहे जैसे मरा काहूको फेरो नहीं फिरै है तैसे तुमहूं
वह धोखाते काहूके फेरे न फिरोगे अर्थात्काहूको कहा न मानोगे तौ संसार-
हीमें परेरहोगे बहुत बड़ेबड़े वही धोखाते ब्रह्ममेंपरिकै मरिगये साहबको न
जानत भये सो आगेकहैंहैं ॥ ४ ॥
इति चौवालीसवीं रमैनी समाप्त ।

रमैनी । ( १२३ )
अथ पैंतालीसवीं रमैनी ।
चौपाई
हिरणाकुश रावण गये कंसा। कृष्णगयेसुरनर मुनिवंसा॥ १॥
ब्रह्मा गये मर्म नहिं जाना । बड़ सबगयो जो रहेसयाना ॥२॥
समुझिनपरीरामकीकहानी।निरवकदूधकिसरवकपानी ३॥
रहिगोपंथ थकितभो पवना।दर्शौदिशाउजारिभोगवना॥४॥
मीनजाल भो ई संसारा।लोह कि नाव पषाणको भारा॥५॥
खेवै सबै मरम नहिंजाना । तहिवो कहै रहै उतराना॥ ६ ॥
साखी ॥ मछरी मुखजस केचुवा, मुसवन मुहँ गिरदान ॥
सर्पनमाहँ गहेजुवा, जाति सवनकी जान ॥ ७ ॥
हिरणाकुशरावणगयेकंसा । कृष्णगयेसुरनरमुनिवंसा॥ १ ॥
ब्रह्मागयेमरमनहिं जाना । बड़सबगये जो रहेसयाना ॥ २ ॥
श्रीकबीरजी कहै हैं कि हिरणाकुश रावण कंस मरिजात भये औ इनती-
नोंके मरवैया कालस्वरूप जे कृष्ण तेऊ मरजातभये दशौ अवतार निरंजन
नारायणै ते होइ हैं या हेतुते मरिजानवारे तीनिकह्यो मारनवारो एकहीकह्यो
औ सुर नर मुनि इनके बंशवारे तेऊ मरिगये औ ब्रह्मा आदिक जे बड़ेबड़े
सयानरहें वेऊ वेदको तात्पर्य न जान्यो मरिगये ॥ १ ॥ २ ॥
समुझिनपरीरामकीकहानी।निरवकदूधकिसरवकपानी ३॥
रहिगोपंथथकितभोपवना । दशौदिशाउजारिभोगवना॥४॥
रामकी कहानी कहे रामनामकी कहानि जो चारो बेदकहैंहैं सो काहूको न
समुझिपरी धौं निरबक दूधहीहै धौं पानिहीपानी है अर्थात् जिनको परमपुरुष
श्रीरामचन्द्र को ज्ञानभयो वेदको तात्पर्यबूझ्यो साहबमुख अर्थलगायो सोदूधही

( १२४ ) बीजक कबीरदास ।
पियतभयो औजो जगद्मुख अर्थमें लग्यो सोपानिहीपानी पियतभयो साहब मुख
अर्थ न जान्यो एते सबमरिगये ॥ ३॥ अपने अपने पन्थ चलावतभये जब पवन
थकितभयो कहे श्वासारहितभई तब दशौदिशा कहे दशौ इन्द्रिनद्वारके जे
देवता ते जातरहे तब दश द्वारको जो शरीरगाउँ सो उजारि ह्वैगयो कहै-मरिगये
याते या आयो कि जे नानामत चलावै हैं मतयहै रहिजायहै जा शरीरमें मरिकै
गये ताहीकी सुधि रहैहै ॥ ४ ॥
मीनजालभोई संसारा । लोहकिनावपषानकोभारा ॥ ५॥
याही रीतिते मरत जियत जे मीनरूप जीवहैं तिनको यहि संसारसमुँद्र में
बाणी जालफंदनको भयो सो जे जालमें फँदे ते तो अविद्याके जालमें फँदेही हैं
जे उबरे चाहैं हैं तेजड़वत् जोमन पाषाण तांहीको है भार जामें ऐसी जोअविद्या-
रूपी लोहेकी नाव तामें चढ़े सोवह बूड़िही जायगी फिरवही संसारमें
परे रहैहैं ॥ ५ ॥
खेवै सबै मर्म नहिं जाना । तहिबो कहै रहै उतराना ॥६॥
सब गुरुवाजन खेवै हैं कहे वही धोखाब्रह्ममें लगावै हैं औ या कहैहैं कि
हम मर्मजान्योहै तुम यामें लगौ पारह्वैजाउगे सोवह जो संसारसमुद्र में अविद्या-
रूपी नाव मन पाषाण ते भरी बूड़िही जायगी तामें गुरुचेला दोउ बूड़िही
जायँगे पार न पावैंगे अर्थात् वेदान्त आदि नाना शास्त्रनमें नाना तर्क उठाय
उठाय बिचार करतऊ जायहैं संकल्प बिकल्प नहींछूटै तात्पर्य तो जानै नहीं औ
जन्मभरि चेलापूंछतई जाय है परंतु तबहूं यही कहै हैं कि तुम संसार समुद्रमें
उतराने हौ कहे उबरेहौ यह नहीं विचारैहैं कि संकल्प बिकल्प छूटबइ नहीं
कियो संसारते कैसेउबरेंगे ॥ ६ ॥
साखी ॥ मछरीमुखजसकेचुवा, मुसवनमुंहगिरदान ॥
सर्पन माहँ गेहेजुवा, जाति सवनकी जान ॥ ७ ॥
जैसे मछरीके मुखमें केंचुआ मुसवानके मुहँमें गिर्दान अर्थात् जब मूस
गिर्दानको रंगदेख्यो तबलालमास अथवा लाल फल जानि धरनधायो जब फूंक

रमैनी । ( १२५ )
मारचो तब आँधरहैगयो गिर्दानहीं मूसकोखायलियो औ सर्प जैसे गहेजुवा कहैं
छुछूंदरको धरहै जो उगिलै तो आँधर हैजायहै खायतो मरि जाय ऐसे सब
जीवनकी जातिहै जे कर्मकांडीहैं ते जैसे मछरी केचुवाको जब खायहै तब
मुहँमें बंसी चुभिजायहै वाहीमें फँसिजायहै तैसे स्वर्गादिकफल की चाहकरि
कर्मकरैहै जनन मरण नहीं छूटैहै काल खायलेइ है औ जे ज्ञानकांडीहैं ते
साहबको ज्ञान तो काचोहै अपने शाखबल या कहैंहैं कि हम समुझायकै पाखं-
डमतवारे जे हैं तिनको अपने मतमें लै आवेंगे या बिचारि तिनके यहां गये सो
बे धोखा ब्रह्मरूप उपदेश फूंक ऐसा मारचो कि आंधरे है गये साहब को जौन
ज्ञानरहै सो भूलिगये तो उनके खाबेको पै वोई उलटिकै खायगे औ उपासना
कांडी जे हैं ते अपने अपने इष्टकी उपासना धरचो सोतौ छोड़तहीनहीं बनैहै
डरैहै कि देवता खफा न होइ आंधर न करिदेइ जो न छोड़ै तो वाही देवताके
लोकगये औ फेरिआये जन्ममरण नहीं छूटैहै जैसेसांप छुछूंदरको धरचो परन्तु
न उगलत बनै न लीलतबनै ताते कबीरजी कहैंहैं कि साहबको जानो जनन
मरण उनहीं के छुड़ाये छूटैगो ॥ ७ ॥
इति पैंतालीसवींरमैनी समाप्त ।
अथ छियालीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
बिनसै नाग गरुड़ गलिजाई । विनसै कपटी औ सतभाई १
विनसैपापपुण्यजिनकीन्हा।विनसैगुणनिर्गुणजिनचीन्हा२
बिनसैअग्निपवनअरुपानी । विनसै सृष्टिजहांलों गानी३
विष्णुलोक विनसै छनमाहीं । हो देखा परलयकी छाहीं ४
साखी ॥ मच्छरूप माया भई, यमरा खेलहि अहेर ॥
हरिहर ब्रह्म न ऊबरे, सुरनर मुनि केहिकेर ॥ ५ ॥

( १२६ ) बीजक कबीरदास ।
जेभर ब्रह्माण्डके भीतरहैं ते सब नाशमानहैं संसार समुद्रमें ऐसो माया
लपेट्यो कि यह मत्स्य( जीव )माया है गई अर्थात् मिलिगई है कहै जीवनको
शरीरमें डारिदियो है शरीरही देखपरैहै जीवको खोजनहीं मिलै है भीतर
बाहरमनमास आदिक वह जड़ मायहीदेखिपरैहै यमरा जो ढीमर कालहै सो
शिकार खेलैहै तातें कोईनहींउबरैहै कोईहालहीमरैहै कोईमहाप्रलयमें
मरैहै ॥ १ ॥ ५ ॥
इति छियालीसवीं रमैनी समाप्त ।
अथ सैंतालीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
जरासिंध शिशुपालसँहारा । सहस अर्जुनै छल सों मारा १
बड़छल रावणसो गये वीती । लंकारह कंचनकी भीती २
दुर्योधनअभिमानहिंगयऊ । पंडवकेर मरम नहिंपयऊ॥३॥
मायाके डिभगे सबराजा । उत्तम मध्यम बाजनवाजा ४
छांचकवैवितधरणिसमाना । यकौजीवपरतीति न आना ५
कँहलौं कहौं अचेते गयऊ । चेतअचेत झगर यकभयऊ ६
साखी ॥ ईमाया जग मोहिनी, मोहिसि सब जगधाइ ॥
हरिचन्द्र सतिके कारने, घर २ गये बिकाइ॥७॥
ये जे राजा बड़े २ गनाय आये तेसब मारेपरे कोई उत्तम कोई मध्यम
कोई निकृष्ट कर्मकारिकै गये सो कहांलौं मैं कहौं चित अचितके झगरा ते कहै
चिंत जीव अचित माया ई दूनौके संयोग ते सब जीव पृथ्वीमें मिलिगये
अपेन शुद्ध आत्माको न जानत भये यह माया जोहै जगमोहनी सोसब जगको
धायकै मोहिलेटभई हरिश्चन्द्र जेराजा हैं तेसत्यके कारणे विद्यामाया में बँधिकै
घर २ बिकाय जातभये पुत्र बिकानो स्त्री बिकानी ॥ १ ॥ ७ ॥
इति सैंतालीसवीरमैनी समाप्त ।

रमैनी । ( १२७ )
अथ अड़तालीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
मानिक पुरहिकबीर बसेरी । मदति सुनोशेष तकिकेरी १
ऊजो सुनी जमनपुर धामा । झूसी सुनी पिरनके नामा२
इकइसपीर लिखेतेहिठामा । खतमा पढ़ें पैगमर नामा ३
सुनिवोलमोहिरहा न जाई । देखि मकरवा रहे लोभाई ४
हवीव और नवीके कामा । जहँलों अमल सो सबेहरामा ५
साखी ॥ शेखअकरदी शेख सकरदी, मानहु बचन हमार॥
आदि अंत उत्पति प्रलय, देखो दृष्टि पसार॥६॥
प्रकट कबीरजी तो यह कहैहैं कि मानिकपुरमे रह्यो तहासे खतकी मदत
सुन्यो कि, जिन पीरनके स्थान ॥ १ ॥ जमनपुरमें सुन्यो ते झूसीपारमें आये
तहां मैंहूंगयों ॥ २ ॥ इकइसौ जे पीरहैं तिनकेनामलिखे हैं कि ये सब पैगंब-
रैकेर फांतियां देइहैं औ कलमा पढ़ैहैं ॥ ३ ॥ सो उनके बोलसुनि २
मोपै नहीं रहाजाय है मकरवा देखि २ ये सब भुलायरहे हैं यह जानिकै तहां
मैं जाइकै कह्योकि ॥ ४ ॥ हवीकहे देवतनको खाना अथवा हवीब कहे
फारसीमें दोस्तकोकहैं हैं औजहां भर नामहै नबीके जे तुम लेतेहौ औनबीके
जहांभर कामहै जे पीरलोग तुमको उपदेश करतेहैं सो सब हरामहै काहेते
अल्लाह तो मनवचनके परेहै ॥ ५ ॥ हे शेख अकरदी हे शेखसकरदी
हमारा कहो जो बचनहै सो सब सांच मानो आदि अंतमें जो दृष्टि
पसारिकै देखो तो जहांभर मनबचनमें पदार्थ आवै हैं सो सबमाया को
पसारहै अल्लाह नहीं है सो कबीरजी के चौबिसपरचैसे. खत केलिखे पीछे
शिष्य भये सो सब कथा निर्भय ज्ञानमें बिस्तारते हैं ॥ ६ ॥
इति अड़तालीसवीं रमैनी समाप्ता ।

( १२८ ) बीजक कबीरदास ।
अथ उनचासवीं रमैनी ।
चौपाई ।
दरकीवात कहौ दुर्वेशा । वादशाह है कौने भेशा ॥ १ ॥
कहां कूच कहँकरै मुकामा।कौनसुरतिकोकरौंसलामा ॥२॥
मैंतोहिं पूंछौं मुसलमाना । लाल जर्दकी नाना बाना ॥३॥
काजीकाज करौ तुमकैसा। घर २ जबै करावो वैसा ॥ ४ ॥
बकरीमुर्गीकिनफुरमाया।किसकेहुकुमततुमछुरीचलाया५॥
दर्द न जानै पीर कहावै । वैता पढ़ि २ जग समुझावै ॥६॥
कहकवीरयकसय्यदकहावै।आपुसरीका जगकबुलवै ॥७॥
साखी ॥ दिन भर रोजा धरतहौ, राति हततहौ गाय ॥
यहतौखून वहबंदगी, क्योंकर खुशीखोदाय ॥८॥
और पदको स्पष्टही है ॥ १ ॥ २ ॥ ३ ॥ ४ ॥ ५ ॥ दर्दतो तिहोरें
दिलमें आती नहीं है गला कटावतमें अल्लाहको बागीचा खराब करतेहौ अरु
बैतें पढ़ि २ के पीरकहावतेहौ औजगत् को समुझावतेहौ अर्थात् हौ बेपीर पीर-
भर कहवावतेहो॥६॥सोकबीरजी कहैं कि एक सय्यदजोहै वह पीर गुरुवा सों
जैसा आप खुआरहै औ तैसे सबको खुआरकरै है ॥७॥ दिनको तो रोजा धरते
हौ औ बंदगी करतेहौ औ रातिको गाईहततेहौ कहे मारतेहौ सो यह तौं
खूनकरतेहौ बहुतभारी औ वहबन्दगी बहुतथोरी करतेहौ दिनको न खायो राति-
हीको खायो क्योंकर तिहारेऊपर खोदाय खुशी होय ताते यह कि वह तौ
साहबको है सो जिनको गला तुम काटतेहौ तिनहीं के हाथ तुम्हारऊ गला
वह साहब कटावेंगे ॥ ८ ॥
इति उनचासवीं रमैनी समाप्त ।

रमैनी । ( १२१ )
अथ पचासवीं रमैनी ।
चौपाई ।
कहतेमोहिंभयलयुगचारी।समुझतनाहिंमोहसुतनारी ॥ १ ॥
वंशआगिलागि वंशैजरिया।भ्रमभुलाय नरधंधेपरिया ॥२॥
हस्तीके फंदे हस्ती रहई । मृगी के फंदे मिरगा परई ॥ ३ ॥
लोहै लोह काटजसआना।तियकैटत्त्व तियापहिंचाना॥४॥
साखी ॥ नारि रचंते पुरुष है, पुरुष रचंते नार ॥
पुरुषहिपूरुष जो रचै, तेहि विरलेसंसार ॥ ५ ॥
चारिउ युग मोको समुझावत भयो पै सुत नारीके मोहतेकोई समुझत नहीं
है ॥१॥ जैसे बांसकी आगी बांसैको जारिदेईहै तैसे सुतनारीके मोहरूप भ्रममें
भुलायकै नरधंधेमें परे जाइ हैं कोई नाना ज्ञान उपासनामें परिकै जरैहै कोई
सुतनारीके धंधेमे परिकै जरैहै ॥२॥ जैसे हथिनीके फंदेहाथी रहैहै मृगीके फंदे
मृगा परै है कहे फँदिजायहै ऐसे जीवके फंदमें जीवपरैहै । जैसे लोहते लोह
कटिजाय है तैसे जीवहीते जीव यहमारो परैहै। तियकी तत्त्व स्त्री पहिचानैं स्त्री
जो ऊंटिनी ताकी तत्त्व वही जानैहै । अर्थात् जीवही ते जीव भ्रमिजायहै । काहेतें
साहबको तो जानैनहीं जीव जीवही मों विश्वास मानै मायामें मिलिकै या जीव
मायाही में रह्यो है ताते मायाकेही पदार्थमें बिश्वास मानैहै ॥३॥४॥ नारीतें
पुरुष रचिजाईहै कहे मायाते सब पुरुष भये हैं औ पुरुष जोहै शुद्धसमष्टि जीव
ताहीते मायाभई है । औ पुरुष जो हैं शुद्धजीव सोपरमपुरुष जे श्रीरामचन्द्रहैं
सबके बादशाह तिनमें रचै कहे प्रीतिकरै ऐसो कोई विरलाहै ॥ ५ ॥
इति पचासवीं रमैनी समाप्त ।
९

( १३० ) बीजक कबीरदास ।
अथ इक्यावनवीं रमैनी ।
चौपाई
जाकरनाम अकहुवाभाई । ताकर कही रमैनी गाई ॥ १ ॥
कहैको तात्पर्य है ऐसा । जस पन्थी वोहित चढ़िवैसा ॥ २ ॥
हैकछुरहनिगहनिकीबाता । बैठारहत चला पुनिजाता ॥ ३ ॥
रहैबदननहिंस्वागसुभाऊ। मनस्थिर नहिं बोलैकाऊ ॥ ४ ॥
साखी ॥ तनरहते मन जातहै, मनरहते तनजाय ॥
तनमन एकै ह्वैरह्यो, हंस कबीर कहाय ॥ ५ ॥
जाकरनाम अकहुवाभाई । ताकर कहीरमैनी गाई ॥ १ ॥
जाको नाम अकह है ताको तौ हिन्दू मन बचनकेपरे कहते हैं औ मुसल-
मान बेचिगून बेनिमून कहतेहैं । सो हम पूछते हैं "हिन्दूकहै कि,
वह तो निराकार होतो तौकहैंहैं कि, वेद मेरी श्वासहै शरीर न होतो तौ वेद-
श्वास कैसेहोतौ । जोकहोवेद तो मायकहें 'साकार है तौ' मिथ्याके बताये तुम्हीं
सांच पदार्थ कैसे जानिहौ । जो कहे साकार तौ मध्यम परमान ठहरा य तौ
अनित्य होइहै अकहुवा न होइगो । अरु जो मुसलमान निराकार कहैहैं कि उसके
आकार नहीं है तो मूसा पैगंबरको कोहनूरकें पहाड़ में हुँगुनी दिखायो सो वह
पहाड़ छार द्वैगयो जो शरीर न होतोतौ छुगुनी कैसे देखावतो । कुरानमें लिखैहै
कि जिंसतरफ़ अपनामुंह फेरै तिसी तरफ़ साहबका मुँहहै, औ सबके हाथके
ऊपर अल्लाहको हाथहै, औ अल्लाह महम्मदसों कहतेहैं कि, "जिसका हाथप-
करातूने तिसका हाथपकरा मैंतब सों इनडौलौंतै यहआवताहै" कि, उसके शक-
लहै । पै जिस तरहकीशकल सोकोईनहीं कहिसकैहै काहेते कि जो उसके मिसाल
दूसरा कोई होय तौ उसकी उपमादैके समुझाय सक्के सो उसकी शकल तो
कोईनहीं समुझाय सक्ता है । लेकिन जो कोई उसकी शकल देखा है सोई जानताहै ।

रमैनी। ( १३१ )
नैसी उसकी शकलैहै लेकिन बयान नहीं कर सक्ताहै। औ कुरान खोदाको कलाम
कहैवात है जो बदन न होता तौ कलाम कैसे कहते। सो निराकार साकार के परे अकह
जो साहब है ताकी रमैनी कहे तिसके रूपादि बर्णनकी कथा जबानमें किस तरहसे
कहौ, बचनमें तौ आवै नहीं है । अथवा जाकर नामैंअकहुवाहै ताकोरूप अकहुवा-
बनैहै तिसकी कथाकहांहै । जोवाहूअकहुवा होयगी जो ऐसाभया तौ जानि न
परैगो किसूको मिथ्या होयजाइगो । तौनैको कबीरजी कहै हैं कि सबको हमको
अकहुवा है कछू उसको साहबको कोई बात अकहुवा नहीं है हमताहीकी कही
रमैनीगाइतहै सोजोकछुरमैनीमेंलिख्योहै सो सांचीहै ॥ १ ॥
कहै को तात्पर्यहै ऐसा । जस पंथीवोहित चढ़िवैसा ॥ २ ॥
हैकछुरहनिगहनिकी बाता । बैठारहाचलापुनिजाता ॥ ३ ॥
जौनकहि आये तौनेको तात्पर्य ऐसाहै कि पांचशरीरते साहब नहीं मिलैहै
काहेते मनबचनके परैहैसाहब है औ जोहमसों साहब कहा कि जीवनको रमैनी
उपदेश करौ ताको हेतुयह है साहब बिचारयो कि मनवचकेपरे जो मैंहौं सों
बिनामेरे बताये जीव मोको न जानेंगे जोकहै। साहबको कापरी है न जानेंगे
नहींतौ साहबके दयालुताकी हानिहोइहै याते उपदेशकरै कहै हैं सो जौने अकह
रामनाम के जपेते साहब प्रसन्नहै हंसरूपदेइहै तौने रामनाम रमैनी ते जानिहै
काहेते कि ॥ (इच्छाकरभवसागर वोहितरामअधार । कहहिं कविरहरि शरणगहु
गोबच्छखुर बिस्तार) ॥ ऐसी साखीरमैनी में लिखी है तेहिते या अर्थ आया कि
संसारसागर पारहोवैको एक रामनामही जहाजमानि नामार्थ में जोशरणकीबि-
धिहै ताको अनुसंधानकरत रामनामजपै ॥२॥ यहरहनि गहनिकैकै जैसे वछवा
को खुरलोग उतरिजायहै ऐसो संसारसागरमें रामनामको अभ्यासकै तरिजाय हैं
कैसे जैसे नावकोचढ़ैया नावमेंबैठाहै पै पारहोत जायहै ऐसे रामनामको जपैया
संसारसागरमें बैठा देखो परैहै परन्तु पारको चलो जायहै ॥ ३ ॥
रहैवदननहिंस्वागसुभाऊ । मनंस्थिरनहिंबोलैकाऊ ॥ ४ ॥
इसतरहके जेहैं जिनकेबदनकहे संभाषण करिबे ते जीवनको स्वागकोसुभाऊ
कहे ब्रह्मह्वैजावो चतुर्भुजादिकनके लोकमें जाइचतुर्भुज हैजावौ और नानादेवतन्