कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरमैनीं। (११७)
शरीर परे रहे हैं औ सूर्य चंद्रमा तेंतीस कोटि देवता ॥ १ ॥ यही संसारसाग-
रके भँवरजालमें परे कबहूं नरकको जायैंहैं कबहूं स्वर्गको जायैंहैं याहीभांति
सब जीव औ सब देवता चाहत तो सुखको हैं कि हमको सुखहोय पै दुःखरूप
जो संसारहै ताको संग नहीं छोड़ै हैं ॥ २ ॥
दुखकामर्मकाहुनहिंपाया । बहुतभांतिकेजगबौराया ॥ ३ ॥
आपुहिबाउरआपुसयाना।हृदयावसतरामनहिंजाना ॥ ४ ॥
वह दुःखरूप जो संसारहै ताको मर्मकोई न जानतभयो बहुत भांति करिकै
जगमेंसबजीव बौरायगये॥३॥सो जीवजेहैं ते आपुहीते बाउर होतभये अरु आप-
हीते सयान होतभये हृदयमें बसत जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनको न जानतभये अर्थात्
जे संसारमें परे हैं ते तौ बाउरई हैं जे आपनेको बहुत ज्ञानी मानै हैं औ सयान
मानेहैं तेऊ बाउरै हैं अर्थात् जे और२ ईश्वरनके दासभये औ जे आपहीको ब्रह्म
मानत भये कि हमहीं ब्रह्महैं औ आपने आत्मैको मानत भये तिनको साहब
को ज्ञान नहीं होयहै याहेतुते दुःखही को सुख मानैहै ॥ ४ ॥
साखी ॥ तेई हरितेई ठाकुरा, तेई हरिके दास ॥
जामें भया न यामिनी, भामिनिचली निरास॥५॥
तेई जे जीवहैं ते अपने को हरि मानत भये औ आपनेही को ठाकुर मानत
भये कि हमहीं जगतकर्ता हैं और आपनेही को हरिके दास मानतभये अर्थात्
सब आपहीको मानतभये औ यामिनी कहावै है लगनिया वह बस्तु कराइदेइ
है सो पूरागुरु कहावै है सो यह जीवको उद्धार कराइदेई है सो जो जो जीव
पूरागुरु रामोपासक ना पायो जो समुझाइदेइ कि यह धोखाहै तिन जीवनते
भामिनि जो मुक्ति सो निराश ह्वैगई कि ई न मुक्ति होयँगे ॥ ५ ॥
इति इकतालीसवीं रमैनी समाप्त ।