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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

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पृष्ठ 166

(११६) बीजक कबीरदास ।
साखी । संयोगेका गुणरवै, विनयोगे गुणजाय ॥
जिह्वास्वादके कारणे, कीन्हे बहुत उपाय ॥६॥
जब मनको आत्माको संयोग होइहै तबहीं संकल्प होइहै औ तबहीं गुणहों-
यहै अरुजब मनको आत्माको संयोग नहीं होइ है तबगुण जाइहै कहेगुणी
नहीं रहैहै अरुसंकल्पौ नहीं रहैहै सोनर जेहैं ते जिह्वा सुखके कारण औ शिश्न
(इन्द्रिय) सुखकेकारण बहुत उपाय करतभये औ मन औ आत्माको संयोग
छोड़ावनको उपाय करतभये औ जे मन आत्माको संयोग छोड़यौहै ते आपनें
स्वस्वरूप को प्राप्त भये हैं ॥ ६ ॥
इति चालीसवीं रमैनी समाप्तौ ।
अथ इकतालीसवीं रमैनी।
चौपाई ।
अंबुकिराशिसमुद्रकिखाई।रवि शशिकोटि तैंतिसौभाई॥१॥
भँवरजालमें आसनमाड़ा।चाहतसुखदुखसंग न छाड़ा॥२॥
दुखकामर्म काहुनहिं पाया।बहुतभांतिकै जग बौराया॥३॥
आपुहिबाउर आपुसयाना।हृदयावसत रामनहिंजान॥४॥
साखी ॥ तेई हरि तेइ ठकुरा, तेई हरिके दास ॥
जामें भया न यामिनी,भामिनिचलीनिरास॥५॥
अम्बुकिराशिसमुद्रकीखाई । रविशशिकोटितैंतिसौ भाई १
भँवरजालमें आसनमाड़ा । चाहतसुखदुखसङ्गनछाड़ा॥२॥
अंबुकहै बिंदु ताकीराशि शरीरहै समुद्र जो है संसारसागर ताकीखाई है
अर्थात् संसारहीमें सबशरीरपरेहैं जैसे जलजीव समुद्रमें रहैहै तैसे ताना जीवनकें