कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १२२ ) बीजक कबीरदास ।
कबहुंन भये संग औ साथा । ऐसो जन्म गँवाये हाथा ॥ १॥
साहबके जाननवारे जे साधु तिनको सत्संगकबहूं न कियो औ उनके बताये
साहबको साथ कबहूं न कियो जेहिते आवागमन रहित होय मनुष्य ऐसोजन्म
अपने हाथते गमायदियो ॥ १ ॥
बहुरि न ऐसो पैहौथाना । साधुसंगतुम नहिंपहिचाना॥२॥
अबतोरहोइनरकमेंवासा । निशिदिनपरैलवारकेपासा ॥३॥
ऐसोस्थानकहे मनुष्यदेह तुम फेरि न पावोगे साधुसंग तुम नहीं पहिचान्योहैं
साधुसंगकरो जो पूरागुरु पाइजाउगे तौ उबार ह्वै जाइगो॥२॥धोखाजो है ब्रह्म
औ माया ताके उपदेश करनवारे जे हैं गुरुवालोग लवरा तिनके पास में निशि-
दिन परचो है सो बिना पारिख तेरो नरकही मो बासहोइगो ॥ ३ ॥
साखी ॥ जातसवनकहँदेखिया, कहैंकबीरपुकार ॥
चेतवाहौतौचेतिले, दिवसपरतहै धार ॥ ४ ॥
दूनौं ब्रह्ममायाके धोखा में सब को नरक जातदेखिकै कबीर जी पुकारिकै
कहैंहैं कि चेतिबे को होइ तो चेतौ नहींतौ दिनैकै तिहारे ऊपर धारपरैहै कहे
गुरुवालोगनको डाकापरैहै भाव यह है जो गुरुवा लोगन को डाका तुम्हारे
ऊपर परैगो औ वह ब्रह्म को उपदेश करेगो औ तुम्हारे वह धोखा दृढ़परिजा-
इगो तौ तुम मारेपरोगे कहे जैसे मरा काहूको फेरो नहीं फिरै है तैसे तुमहूं
वह धोखाते काहूके फेरे न फिरोगे अर्थात्काहूको कहा न मानोगे तौ संसार-
हीमें परेरहोगे बहुत बड़ेबड़े वही धोखाते ब्रह्ममेंपरिकै मरिगये साहबको न
जानत भये सो आगेकहैंहैं ॥ ४ ॥
इति चौवालीसवीं रमैनी समाप्त ।