कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरमैनी । (११३)
भर्मै सबघट रह्योसमाई । भर्मछोड़ि कतहूं नहिं जाई ॥३॥
परैनपूरदिनौदिनछीना। जहां जाहु तहँ अंग विहीना ॥४॥
जोमतआदिअंतचलि आया। सोमतउनसबप्रकटलखाया ५
वही भर्म घट घटमें समाइ रह्यो है भर्म छोड़िकै अनत न जात भये वही
संशयमें रहिगये॥ ३॥पूर नहीं परैहै कहै निश्चय नहीं होइहै दिनौदिन क्षीण होत
जाइहै क्षीणकहां होइहै कि, यह जानैहै कि हमारो अज्ञान दूरिभयो पै जहां
जाईहै तहँ निराकार धोखई मिलैहै हाथ कछु नहीं लगैहै ॥४॥ वेदको अर्थ तौ
परोक्षहैकहै अमरहै तात्पर्य वृत्तिकरिकै साहबको लखावैहै तौन अनादिमत ताकों
न समुझतभये वहवेदको अर्थ गुरुवालोग प्रगट करिकै अर्थात् अपरोक्ष जौन
आदि अंतते चलो आयो है ताको बऊ परिगयो ॥ ५ ॥
साखी ॥ वहिसंदेश फुरमानिकै, लीन्हों शीशचढ़ाइ ॥
संतोहै संतोषसुख, रहहुतौहृदय जुड़ाइ ॥ ६ ॥
वही तत्त्वमसि उपनिषत्को संदेश शीश चढ़ाइ लेतेभये वेदनमें वाणीमें
तात्पर्य करिकै सांचपदार्थ कह्यो ताको न जानतभये संतपद संतोष सुखहै तौने
जो रहौ तौ हृदय जुड़ाइ औरेमें तो तापई होइगो काहेते सबतें परे है जाकों
साहब दूसरो नहींहै ऐसे जे चक्रवर्ती श्रीरामचन्द्रहैं तिनको जबपायो तब उनते कम
ब्रह्महोबेकी ईश्वरके मिलिबेकी और मायिक जेपदार्थ हैं तिनके मिलिबेकीचाहई
न होइगी काहेते कि वहचक्रवर्ती के मिलिवेकेसमसुख नहीं है ब्रह्मानंद विषया-
नंद आदिकनमें जबलगैगो तहहीं सबते संतोष है याको मन शांतहै जाइगो॥६॥
इति अड़तीसवीं रमैनी समाप्त ।
अथ उन्तालीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
जिन्हकालिमा कालिमाहँ पढ़ाया। कुदरतखोजि तिन्हौं नहिं पाया
करिसतकर्म करै करतूती । वेद किताबभयासवरीती ॥२॥
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