कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १२० ) बीजक कबीरदास ।
साखी ॥ गुरुद्रोही औ मनमुखी, नारी पुरुष विचार ॥
तेनरचौरासीभ्रमाहिं, जवलगि शशिदिनकार ॥६॥
जिनजिवकीन्ह आपुविश्वासा। नरकगयेतेहिनरकहिवासा १
जे नर अपने में विश्वास कियो कि हमारो जीवात्माहै सोई मालिकहै दूसर
नहीं है । एकैहै ते नरकी मुक्तिकी बातैं कौनकहै वे स्वर्गहू नहीं जायँहैं नरकमें
जायकै नरकहीमें वास किये रहे हैं काहेते नरकही जायँहैं कि इहांतौ तीर्थ
व्रत संयम जो स्वर्गजावे को उपायहै तेतौमिथ्यामानिछांड़िदियो जीवात्मैको-
मालिकमान्यो दूसरा मालिक न मान्यो जो यमतें रक्षाकरै औ वेद पुराण को
मिथ्या मान्यो छूटनको उपाय एकौ न कियो जब यमदूत मोगरालैकै मारन-
लगे बांधिकै कांटामें कढ़िलावनलगे तबमूढ़पुकारनलाग्यो गुरुवा लोगनको तें
रक्षा न किये औगुरुवालोगनहूकी वही हवाल देखनलग्यो सो साहबको नाम
तो सबछोड़िकै लियोनहीं जो यमते रक्षाकरि वहांको लैजाय इहांस्वर्गजाबेवारो-
सुकर्म कियो नहीं ये अहमक ऊंटके से पाद जन्म गँवाइ दिये न इतके भये ना
उतके भये तामें प्रमाण ॥ “रामनाम जान्योनहीं कहाकियो तुमआय ॥
इतकेभये न उतके रहियाजनमगँवाय” ॥ १ ॥
आवतजात नलागहिवारा । कालअहेरीसांझसकारा ॥ २ ॥
चौदहविद्यापढ़िसमुझावै । अपने मरणकिखबरिनपावै॥३॥
आवत जात बारनहीं लगैहै कहे पुनिपुनि जन्म लेइ है काल जो अहेरीहै
सोसांझ सकार उनहींको खायहै वही बासना उनकी बनीरहैहै फेरि वाही मनमें
आरूढ़है फेरि वही नरकही को जायहै॥२॥औ चौदहौ विद्या पढ़िकै गुरुवालोग
जेहैं ते औरैकोतौ समुझातैं हैं परंतु अपने मरणकी खबरि नहीं पावैहैं ॥३॥
जानोजियकोपराअंदेशा । झूठ आनिकै कहै संदेसा॥ ४ ॥
संगति छोड़ि करै असरारा । उवहै नर्कमोटको भारा ॥५॥