कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरमैनी । ( १२१ )
अथ पचासवीं रमैनी ।
चौपाई ।
कहतेमोहिंभयलयुगचारी।समुझतनाहिंमोहसुतनारी ॥ १ ॥
वंशआगिलागि वंशैजरिया।भ्रमभुलाय नरधंधेपरिया ॥२॥
हस्तीके फंदे हस्ती रहई । मृगी के फंदे मिरगा परई ॥ ३ ॥
लोहै लोह काटजसआना।तियकैटत्त्व तियापहिंचाना॥४॥
साखी ॥ नारि रचंते पुरुष है, पुरुष रचंते नार ॥
पुरुषहिपूरुष जो रचै, तेहि विरलेसंसार ॥ ५ ॥
चारिउ युग मोको समुझावत भयो पै सुत नारीके मोहतेकोई समुझत नहीं
है ॥१॥ जैसे बांसकी आगी बांसैको जारिदेईहै तैसे सुतनारीके मोहरूप भ्रममें
भुलायकै नरधंधेमें परे जाइ हैं कोई नाना ज्ञान उपासनामें परिकै जरैहै कोई
सुतनारीके धंधेमे परिकै जरैहै ॥२॥ जैसे हथिनीके फंदेहाथी रहैहै मृगीके फंदे
मृगा परै है कहे फँदिजायहै ऐसे जीवके फंदमें जीवपरैहै । जैसे लोहते लोह
कटिजाय है तैसे जीवहीते जीव यहमारो परैहै। तियकी तत्त्व स्त्री पहिचानैं स्त्री
जो ऊंटिनी ताकी तत्त्व वही जानैहै । अर्थात् जीवही ते जीव भ्रमिजायहै । काहेतें
साहबको तो जानैनहीं जीव जीवही मों विश्वास मानै मायामें मिलिकै या जीव
मायाही में रह्यो है ताते मायाकेही पदार्थमें बिश्वास मानैहै ॥३॥४॥ नारीतें
पुरुष रचिजाईहै कहे मायाते सब पुरुष भये हैं औ पुरुष जोहै शुद्धसमष्टि जीव
ताहीते मायाभई है । औ पुरुष जो हैं शुद्धजीव सोपरमपुरुष जे श्रीरामचन्द्रहैं
सबके बादशाह तिनमें रचै कहे प्रीतिकरै ऐसो कोई विरलाहै ॥ ५ ॥
इति पचासवीं रमैनी समाप्त ।
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