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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 177

रमैनी । ( १२७ )
अथ अड़तालीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
मानिक पुरहिकबीर बसेरी । मदति सुनोशेष तकिकेरी १
ऊजो सुनी जमनपुर धामा । झूसी सुनी पिरनके नामा२
इकइसपीर लिखेतेहिठामा । खतमा पढ़ें पैगमर नामा ३
सुनिवोलमोहिरहा न जाई । देखि मकरवा रहे लोभाई ४
हवीव और नवीके कामा । जहँलों अमल सो सबेहरामा ५
साखी ॥ शेखअकरदी शेख सकरदी, मानहु बचन हमार॥
आदि अंत उत्पति प्रलय, देखो दृष्टि पसार॥६॥
प्रकट कबीरजी तो यह कहैहैं कि मानिकपुरमे रह्यो तहासे खतकी मदत
सुन्यो कि, जिन पीरनके स्थान ॥ १ ॥ जमनपुरमें सुन्यो ते झूसीपारमें आये
तहां मैंहूंगयों ॥ २ ॥ इकइसौ जे पीरहैं तिनकेनामलिखे हैं कि ये सब पैगंब-
रैकेर फांतियां देइहैं औ कलमा पढ़ैहैं ॥ ३ ॥ सो उनके बोलसुनि २
मोपै नहीं रहाजाय है मकरवा देखि २ ये सब भुलायरहे हैं यह जानिकै तहां
मैं जाइकै कह्योकि ॥ ४ ॥ हवीकहे देवतनको खाना अथवा हवीब कहे
फारसीमें दोस्तकोकहैं हैं औजहां भर नामहै नबीके जे तुम लेतेहौ औनबीके
जहांभर कामहै जे पीरलोग तुमको उपदेश करतेहैं सो सब हरामहै काहेते
अल्लाह तो मनवचनके परेहै ॥ ५ ॥ हे शेख अकरदी हे शेखसकरदी
हमारा कहो जो बचनहै सो सब सांच मानो आदि अंतमें जो दृष्टि
पसारिकै देखो तो जहांभर मनबचनमें पदार्थ आवै हैं सो सबमाया को
पसारहै अल्लाह नहीं है सो कबीरजी के चौबिसपरचैसे. खत केलिखे पीछे
शिष्य भये सो सब कथा निर्भय ज्ञानमें बिस्तारते हैं ॥ ६ ॥
इति अड़तालीसवीं रमैनी समाप्ता ।