सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

( १३२ ) बीजक कबीरदास ।
के लोकजाय तिनके तिनके रूपधरिबो सो मिटिजायहै।संसारतो छूटि ही जायहै
सो वे बोलै हैं औ मन स्थिरह्वैगयो है कहेमनको संकल्प बिकल्प तो छूटैनहीं
है मनते भिन्न ह्वैवो कहा है कि संकल्प बिकल्पही मनको स्वरूपहै जब संकल्प
बिकल्प छूटिगयो तब मनते भिन्न ह्वै गयो सो कैसे मनते भिन्नहोइगो सो साध-
न आगे कहैहैं ॥४॥
साखी ॥ तनरहते मनजातहै, मन रहते तन जाय ॥
तन मन एक ह्वैरहो, हंस कबीर कहाय ॥ ५ ॥
तनजोहै वा शरीर स्थूल सूक्ष्मकारण महाकारण सोअर्थअनुसंधान करत
रामनाम जपत २ तनते जब रहित ह्वैगयो तब मन जातरहै है औ मन जाय
है तब चारिउशरीर जात रहैहैं । सो जब तनमन एकह्वैरहै कहे सिगरें
तन प्राणमें बंधे हैं सो प्राण औ मनको एकघर करिदैसोनाम जपिविधिजानि-
तवसंकल्प बिकल्प मनको छूटिजाय है। मनतो संकल्प बिकल्परूपहै सो जब-
संकल्प बिकल्पछूट्यो तब मननाश ह्वैगयो । तब चारिउशरीरको हेत जोहै ज्ञान
सोऊ जातरहैहै तब चारिउ शरीर भिन्नह्वैजायहैं एक शुद्धआत्मा में स्थिर ह्वैरहैं
हैं मुक्ति ह्वैजाय हैं जैसे पूर्वशुद्ध समष्टिरूप में रह्योहै तैसे सो ह्वैगयो। जैसे सम
ष्टिजीव जब रह्यो है तब जगत् को कारणरह्यो आयो है साहबको न जानिबो
रूप ताते संसारही ह्वैगयो है तैसे यह जो शरीरनमें साहबको भजन करिराख्यो
सो जब मनादिक याकेछूटि गये शुद्ध ह्वैगयो तब वाही भांति साहब को जानैं
को कारण रहिगयो। काहेते कि राम नामको अर्थ साहब मुख जानिराख्यो है
सो मङ्गल में साहब कहिआये हैं कि जो रामनाम जपिकै मोको जानै तो मैं
हंसरूपदै अपने पास बुलाइलेऊं।याहीते साहब हंस रूप देइ है तब वह काया-
को बीरजीव हंस कहावैहै। कैस हंस कहावैहै कि असारजेहैं चारिउ शरीर औ
मन माया रूप पानी ताको छोड़िदियो औ सारजोहै साहबको ज्ञानरूपदूधता-
कोग्रहणकियो औ अकह रामनाम जो मोती है ताको चुनन लग्यो कहे लेन-
लग्यो सोकबीरजी लिखबै कियो है शब्दमें (निर्मल नामचुनि चुनि बोले) अरु-
अकह रामनामहै अरु अकह निर्गुण सगुण के परैहै श्रीरामचन्द्रई हैं तामें

रमैनी । ( १३३ )
प्रमाण ॥ ( रामकेनामतेपिंडब्रह्मांडसब रामकोनाममुनिभर्ममानी । निर्गुण-
निरंकार के पार परब्रह्म है तासुको नामरङ्गारजानी । विष्णुपूजाकरै ध्यान-
शङ्करधरै भनहि सुविरंचि बहुबिबिध बानी । कहैकबीर कोइ पारपावैनहीं
राम को नामहै अकह कहानी ) ॥ ५ ॥
इति इक्यावनवीं रमैनी समाप्त ।
अथ बावनवीं रमैनी ।
चौपाई ।
ज्यहिकारणशिवअजहुंवियोगी।अङ्गविभूतिलायभेयोगी १
शेषसहसमुखपार न पावैं । सोअबखसमसहितसमुझावै२॥
ऐसीविधिजोमोकहँध्यावै । छठयें मास दर्श सो पावै॥ ३ ॥
कौनेहुं भांति दिखाई देऊ। गुप्तै रहि सुभाव सब लेऊ॥४॥
साखी ॥ कहहिं कबीर पुकारिकै, सबका उहै हवाल ॥
कहाहमार मानै नहीं, किमिछूटै भ्रमजाल॥ ५ ॥
ज्यहिकारणशिवअजहुंवियोगी।अंगविभूतिलायभेयोगी १॥
शेषसहसमुखपारनपावै।सोअबखसमसहितसमुझावै॥ २ ॥
जाकेकारण शिवअंगमें बिभूतिलगाइकै योगीभयेपरन्तुअजहूँलौं बासों बियो-
गी हैं काहेते कि जोबियोगी न हो ते तो तमोगुणाभिमानी काहे रहते॥ १॥औ
शेष सहस मुखते कहिकै पार न पायो तेई दुर्लभ खसम जे परमपुरुष श्रीराम-
चन्द्रहैं ते हिते सहित जीवनको समुझावैहैं काहेते जीवनको हित मानिकै समु-
झावै है कि मोको जानिकै मेरे पासआवै संसार दुःख न पावै ॥ २ ॥
ऐसीविधिजो मोकहँध्यावै । छठयें मास दर्शसोपावै ॥ ३ ॥
कौनेहुंभांति दिखाईदेऊ । गुप्तैरहि सुभाव सबलेऊ ॥ ४ ॥

( १३४ ) बीजक कबीरदास ।
साहब कहा समुझावैहै कि जैसो पूर्व कहिआये हैं ( नामार्थमें लिखि आये हैं
शरनकी विधि ) तैसो अनुसंधान करत रामनाम जपिकै निरंतर जो छठयें मास
या होइतौ जो या शरीरते करैहै छामहीनामें दर्शन सो पावैहै याही भांतिसों जौं
मोकोध्यावै तौ छठयेंमास मेरोदर्शन पावै कहे छठौ जो हंस स्वरूप तामें स्थिर
ह्वैजाय ॥ ३ ॥ तौ कौनेउभांतिसों मैं देखाइ देउहौं औ निशिदिन वाके साथ
गुप्तराह्निकै वाको सब सुभावलेउ औ जो दृढ़होइ तौ राम नाम कासाधक
ताको छठौ शरीर दैके वाको प्रत्यक्ष ह्वैजाउ पाछे २ रघुनाथजी नित्य बनेरहत-
हैं तामें प्रमाण॥ ( रामरामेतिरामेतिरामरामेतिवादिनम् । वत्सङ्गौरिवगौर्य्यर्व्या-
धावंतमनुधावति ) ॥ ४ ॥
साखी ॥ कहहिं कवीरपुकारिकै, सबका उहै हवाल ॥
कहा हमरमानै नहीं, किमिछूटै भ्रमजाल ॥ ५ ॥
श्री कबीरजी पुकारिकै कहैं हैं कि जिनको शेष शिवादिने पारनहीं पायो
यह भांतिके दुर्लभ जे परमपुरुष श्रीरामचन्द्र हैं ते आजुकाल्हि ऐसे सुलभह्वै
गयेहैं कि आपई उपाय बतावै हैं कि जो ऐसो उपायकरैं तो छठयें शरीर में
मोको पाइजाईं ते साहबको कह्यो मैं कतनो समुझावतहौं पै सब बेवकूफ हैं
जीवन को हवाल उहैहै कहे वही मायाके नानामतनमें लगेहैं वहीको बिचार
करैहैं जौन धोखाते संसार पायोहै हमारो कह्यो यतनेहूपै नहीं मानैहै सो ऐसे
दुष्ट जीवनको भ्रमजाल कैसेछूटै ॥ ५ ॥
इतिबावनवीं रमैनी समाप्त ।
अथ तिरपनवींरमैनी ।
चौपाई ।
महादेव मुनि अंत न पावा । उमासहित उन जन्म गँवावा १
उनते सिद्ध साधु नहिंकोई । मन निश्चल कहु कैसेहोई २॥
जौ लग तन में आहै सोई । तौलग चेत न देखौ कोई३॥

रमैनी । (१३६)
तबचेतिहौजबतजिहौप्राना । भयाअन्ततवमनपछिताना ४
यतनासुनतनिकटचलिआई।मनकोविकार न छूटैभाई ५॥
साखी ॥ तीनिलोकमें आयकै, छूटि न काहू कि आश॥
यकआंधर जग खाइया,सवजग भया निराश ॥६॥
उनते अधिक सिद्धिकौन साध्योहै जाको मन निश्चल होइ अर्थात् सिद्धिसा-
धे मन निश्चल नहीं होयहै ॥ २ ॥ जबलग शरीरमें मनहै तबलग चेतन करिकै
अथवा महादेव जे हैं औ बड़े बड़े मुनिजेहैं ते अंतनहीं पायो जो कोऊ
जान्योहै ते वोही साधन तेजान्योहै कहे ज्ञान करिकै वह परम पुरुषको कोईनहीं
देखै हैं ॥ ३ ॥ कबीरजी कहैहैं कि तुम तब चेतिहौ जब प्राण छोड़ोगे ? तब-
कहां चेतौगे यह याकु भाव है जब अनतही जाई शरीर पावोगे तब मनको पछि-
तावई रहिजायगो जो भया अयान पाठ होइ तौ यह अर्थहै कि तुम जो अया-
नेभये साहबको न जान्यो हमारकहा मानवई न कियो तौ अब पछिताना क्याहै
पछितातो काहेकोहै संसार पीर सहो ॥ ४ ॥ यह सब जगत् शास्त्रनम सुनाहै
कि मौत निकट चलीआवै है हमहूं मरिजावेंगे पै मरघट ज्ञान कथैहै मनकों
विकार नहीं छोड़ैहै ॥ ५ ॥ तीनि लोकमें आइकै सब मरिगयो परन्तु काहूकी
आशा न छूटतभई एक आंधरजोहै मन सोजगत्‌को खाइलयो सब जगत्
परमपुरुषके मिलिबेको निराश ह्वै गयो । इहां आंधर कह्यो सो मन परमपुरुषको
कबहूंनहीं देखैहै काहेतेकि साहबमनबचनकेपरै है आपही शक्तिदइहैजीवकों
तबहींदेखैहै ॥ ६ ॥
इति तिरपनवीं रमैनी समाप्ता ।
अथचौवनवीं रमैनी ।
चौपाई ।
मरिगयेब्रह्माकाशिकेबासी । शीव सहित मूये अविनासी १
मथुरा मरिगयेकृष्णगुवारा। मरि मारि गये दशौ अवतारा २
गरिमीरगयेभक्तिजिनठानी। सगुणमें जिन निर्गुण आनी ३

?
Wait, there are TWO vertical strokes?
Let's zoom in on "नार्रसिंहाद्यनेकधा":
न + ा = ना
Then: an upright glyph: it looks like 'र' with a repha: 'र्र'? Or is it 'सिं' with repha: 'र्fields'?
Wait, the letter after 'ना' has a circle/loop, like 'र' or 'सि'?
Wait! It has 'ि' matra!
Ah, the 'ि' matra of 'सिं' has a repha on it, or wait:
Letter 1: ना
Letter 2: र
Letter 3: सिं (with anusvara)
Wait, why is there a repha? It looks like "नारसिंह"! Wait, is there a repha on 'र'? Yes, it looks like "नार्रसिंहाद्यनेकधा" or "नारसिंहाद्यनेकधा"?
Look at the top: there is an anusvara dot, and a curved stroke?
Wait, the curved stroke is above the 'ि' matra of 'सिं'!
Ah, it's just the 'ि' matra of 'सिं'!
Wait, then what is the letter between 'ना' and 'सिं'?
It is 'र'!
So: 'ना' + 'र' + 'सिं' + 'हा' + 'द्य' + 'ने' + 'क' + 'धा' = "नारसिंहा

रमैनी। ( १३७ )
अथ पचपनवीं रमैनी।
चौपाई।
गये राम अरुगये लक्षमना। संग न गै सीताअसधना १
जातकौरवनलाग न बारा। गये भोज जिन साजल धारा२
गै पांडवकुन्तीसी रानी गैसहदेव जिन मति बुधि ठानी३
सर्व सोनेकै लंक उठाई। चलत बार कछु संग न लाई४
कुरियाजासु अंतरिक्ष छाइ। हरिचन्द्र देखिनहिं जाई ५
मूरुख मानुष अधिक सजोवै।अपना मुवल औरलगिरोवै६
इ न जानै अपनो मरि जैबै। टका दश विढ़ै और लै खैबै७
साखी॥ अपनी अपनी करि गये, लागिन काहूके साथ॥
अपनी करिगयो रावणा,अपनी दशरथ नाथ॥८॥
गयेराम अरुगये लक्षमना। संगनगै सीता असिधना ॥ १॥
देवतन मुनिनको कहिआये हैं अब राजनको कहै हैं काहेते कि, आगे दश-
अवतार कहिआये हैं इहां पुनि राम कहै हैं तहां इहां जे जीव राम राजा भये
ताको औ लक्ष्मणको महाभारतसभापर्वमें नारद युधिष्ठिरते कह्योहै राजनके
गिनतीमें यमकीसभामें। तिनको कहैं कि, रामगये लक्ष्मणगये औ संगमें सीता
असनारी न जातभई। जो यह अर्थ कोई न मानै तौयह कहै हैं कि, नारायणके
अवतार रामचन्द्रहैं तिनहीको जाइबो कबीरकहै हैं तौ कबीरजी तौ सांचके
कहवैया हैं झूठी कैसे कहेंगे सब रामायणम बर्णन है कि प्रथम जानकी शरीर
ते सहितगई हैं पुनि श्रीरामचन्द्र शरीरते सहित जातभये जिनके संग श्रीशक्ति
भूशक्ति लीलाशक्ति शरीरैं सहित चलीजातीहै सो जो कबीरजी व राजा
ने भये हैं तिनको जाइबेको न कहते तौ संगमें सिया असि धना न गई यह
कैसे लिखते ॥ १ ॥

( १३८ ) बीजक कबीरदास ।
जातकौरवनलागिनवारा गयेभोजजिनसाजलधारा ॥ २ ॥
गेपांडव कुंतीसी रानी । गेसहदेवजिनमति बुधिठानी ॥३॥
सर्वसोनेकी लंक बनाई । चलत बारकछुसंग न लाई ॥४॥
औ कौरवनको जातवार न लग्यो औराजाभोजगे जिनधारानगरीको बसायोहै
कहे साज्यो है भोजके कहेते कलियुगके राजा सब आयगये ॥ २ ॥
औ पांडवानैहैं औ कुन्ती ऐसी रानी जो है औ सहदेव जैहैं ते सब जातभये
जेपण्डितहैं तिनहूं में अपनीमति कहे बुद्धि अधिक ठानतभये कहे करतभये ॥३॥
औ सब लंका सोनेकै रावण बनायो पै चलतवार संगमें न गई ॥ ४ ॥
कुरियाजासुअंतरिक्षछाई । सोहरिचन्द्रदेखिनहिंजाई ॥ ५ ॥
औ जाकी कुरिया अंतरिक्षमें छाईहै कहे स्वर्गमें महलबनोहै इन्द्रते अधिक
सिंहासनमें बैठतेंहैं ऐसेजैनैहैं हरिश्चन्द्र राजा तेऊनहीं देखिपरे हैं अर्थात् तेऊ न
रहिगये मरिगये भावयह है कि महा प्रलय भये त्रैलोकमें कोई नहीं रँहिजाईहै॥५॥
मूरखमानुषअधिक सजोवै । अपनामुवलऔरलगिरोवै॥६॥
इ न जानै अपनो मरिजबै । टका दशबढ़े औरलैखैवै ॥७॥
मूरख जो मनुष्यहै सो संजोवै कहे अधिक सम्यक् प्रकारते जोवै है अर्थात्
और को मरिबो कहे आजा मरिगयो बाप मरिगयो इत्यादिक सबको मरिबो
देखतई जायहैं औ रोवै हैं अपने मरनकी चिन्तानहीं करैहैं॥६॥ या नहीं जानैहैं
कि जेतेदिन बीतिगये जेतेने मारिगये और मरिही जायँगेय है बिचारै हैं कि
और दशतका बढ़ैं जाते बहुतदिन बैठेखायँ ॥ ७ ॥
साखी ॥ अपनी२ करिगेये, लागिनकाहुकेसाथ ॥
अपनीकरिगयो रावणा, अपनीदशरथनाथ ॥ ८ ॥
जीतिजीति पृथ्वी सबै अपनी अपनी करिकै गये यशी दशरथराजा ते अधिक
कोई न भयो जाकी सब प्रशंसा करैहैं उनके सुकृतको यश जगतही में रहिगयों
उनके साथ न गयो औ अयशीरावणते अधिक कोई न भयो जाकी सब निन्दाकरै
हैं जाके दुष्कृतको अयश जगतहीमें रहिगयो ॥ ८ ॥
इत पचपनवीं रमैनी समाप्त ।

रमैनी । ( १३९ )
अथ छप्पनवीं रमैनी ।
चौपाई ।
दिनदिन जरै जरलकेपाऊ । गाड़े जाइ न उमगै काऊ ॥१॥
कंध न देइ मसखरी करई । कहुधौंकौनिभांतिनिस्तरई ॥२॥
अकरमकरै करमको धावै । पढिगुणि वेद जगतसमुझावै ॥३॥
छूछेपरे अकारथ जाई । कह कबीर चितचेतहु भाई ॥ ३ ॥
दिन दिन जरैजरलकेपाऊ । गाड़ेजाइ न उबरै काऊ ॥१॥
कबीरजी कहैहैं कि जे रोजरोज ज्ञानाग्नि करिकै कर्मकोजारै हैं अपने
जीवत्वको जारैहैं किं हम ब्रह्म हैजायँ सो जरल के पाउ कहे न काहूके कर्मही
जरे न कोई ब्रह्मही भयो । अथवा जरलके पाऊ कहे जारिगये हैं कर्म जाकों
अर्थात् कर्मही नहीं है ऐसो जोब्रह्म ताकोको पायो है? अर्थात् कोई नहीं पायो है ।
जो कहौ जड़भरतादिक पायो है तौ वेजो ब्रह्मही है जाते तौ दूसरो मानिकै
[L

( १४० ) बीजक कबीरदास ।
न किये कि भलेलगेहैं तुम मसखरी किये कि जो तुमहूं अहंब्रह्मास्मि मानौ तौ
तुमको अनेक प्रकारकी ऋद्धिसिद्धि प्राप्त होइ है साहब को ज्ञान छोड़िदेहु या
भांति समुझाय नरक में डारिदिये ॥ २ ॥
अकरमकरैकरमकोधावै । पढिगुणवेद जगतसमुझावै ॥३॥
छूंछे परै अकारथ जाई । कह कबीर चितचेतहु भाई ॥४॥
कैसेहैं वे गुरुवा लोग करत तो अकरममतहैं किहमको करमत्यागहै हम संन्या-
सी हैं हम ज्ञानी हैं औ करम करिबेको धावै हैं औ वेदको पढ़ि गुनिकै जगतकों
समुझावै हैं कि, निष्कर्महोउ चाहैते सब विकारहै चाह छोड़िदेउ औ आप
भायाके लिये बजारमें झगरै हैं सो उनके कहे जीवनको कैसे समुझिपरै ॥ ३॥
उनको उपदेश अकारथई जायहै औ जो सुनै है सो छूंछई परैहै अर्थात् कछू-
वस्तु हाथ नहीं लगै है सो कबीरजी कहै हैं कि, हे भाई ! चित चेत करो
जेहिते कनककामिनी रूप मायाते औ धोखाब्रह्मते बचिजाउ ॥ ४ ॥
इति छप्पनवीं मैनी समाप्त ।
अथ सत्तावनवीं रमैनी ।
चोपाई ।
कृतियासूत्रलोक यकअहई।लाख पचासके आगे कहई॥१॥
विद्या वेद पढै पुनि सोई । वचन कहत परतक्षै होई ॥ २ ॥
पहुंचि बात विद्या के वेता।वाहु के भर्म भये संकेता ॥ ३ ॥
साखी ॥ खग खोजनको तुमपरे, पीछे अगम अपार ॥
विन परचै किमि जानिहौ, झूठाहै हंकार ॥ ४ ॥
कृतियासूत्रलोकयकअहई । लाखपचासकेआगेकहई ॥ १ ॥
कृतिया कहे यह कृत्रिम जो है कर्म अहंब्रह्म मानिबो सो यहलोक में
एक सूत्रके बरोबरहै कहेरस्सीकेबरोबरहै जीवनके बांधिबेको । मंगलमें कहि

शब्द प्रकरण: सम्पूर्ण ११५ पदों का आध्यात्मिक व पारमार्थिक रहस्य

आये हैं कि, ब्रह्ममें अणिमादिकसिद्धि होई हैं सो वह कृत्यकरिकै कहे ब्रह्ममा-
निकै पचास लाखवर्षके आगेकी कहै हैं सो पचास लाख यह उपलक्षण है
अर्थात् भूत भविष्य वर्तमान सब कहै हैं ॥ १ ॥
विद्या वेद पढ़े पुनि सोई । वचन कहत परतक्षै होई ॥ २ ॥
पहुंचे बात विद्या के वेता । वाहुके भ्रमभये सङ्केता ॥ ३ ॥
विद्या जो है वेद जो है सो संपूर्ण पढ़िलेई अर्थात् आइ जाइ तब जौनबात
कहै हैं तौन परतक्ष होईहै कहे बाक्यसिद्धि है जाइ है ॥ २ ॥ वेविद्याके वेत्ता
कहे जनय्या जे लोग हैं ते वह बातको पहुंचि कहे पहुंचतभये अणिमा-
दिक सिद्धि होत भई औ ब्रह्मको जानतभये परन्तु साहबको जो है साकेत लोक
ताके जानिबेको उनहूंको भ्रमभयो अर्थात् साहबको लोक न जानत भये ॥३॥
साखी ॥ खगखोजन को तुम परे, पीछे अगमअपार ॥
बिन परचै किमिजानिहौ, झूठा है हङ्कार ॥ ४ ॥
औ खग जो है हंसतिहारो स्वरूप ताके खोजिबेको तुमचल्यो कि, हम अपने
आत्माको स्वरूपजानैं सो साहब अगम अपार जो धोखा ब्रह्म सों लग्यो है
वाहीकौं अपनोस्वरूप मानिलियो है जब कुछ संसार तुमको छूट्यो तब अगम
अपार जो धोखा ब्रह्म है ताही को अहंब्रह्मास्मि मानिकै बैठ्यो सो वह अगम
है काहूकी गम्य नहीं है अपार है अर्थात् झूठा है । भाव यह है कि, जब
साकेत लोक को जानोगे तब साकेतनिवासी जेपरमपुरुष श्रीरामचन्द्र तिनको
जानोगे तब वे हंसस्वरूपदै अपने धामको लैजायेंगे तबहीं जन्म मरणते रहित
होउगे तब हंसस्वरूपपावोगे औरीभांति संसार ते न छूटोगे न सिद्धिप्राप्त भयें
न ब्रह्मभये तामें प्रमाण गोसाईं तुलसीदासजी को दोहा ॥ "बारिमथे घृतहोइ-
बरु सिकताते बरु तेल । बिनहरिभजन न भवतरे यह सिद्धांत अपेल )
१ औ कबीरहूजी को प्रमाण ॥ "रामबिनानार हैहोकैसा । बाटमाँझ गोबशौरा
जैसा" ॥ ४ ॥
इति सत्तावनैंवीं रमैनी समाप्तौ ।

( १४२ ) बीजक कबीरदास ।
अथ अठ्ठावनवीं रमनी ।
चौपाई ।
तैंसुत मानु हमारी सेवा । तो कहँ राज देहुं हो देवा ॥ १ ॥
गम दुर्गम गढ़देहु छुड़ाई । अवरो बात सुनो कछु आई ॥ २ ॥
उतपति परलै देउ देखाई । करहुराज्यसुखविलसहुजाई ३
एको वार न जैहै बाँको । बहुरिजन्मनहिंहोइहैताको॥ ४ ॥
जायपाप देहौ सुखधाना । निश्चयवचनकबीरको माना ५ ॥
साखी ॥ साधुसंत तेई जना, जिन माना वचन हमार ॥
आदिअंत उतपति प्रलय, सव देखा दृष्टिपसार ६
तैं सुत मानु हमारी सेवा । तोको राजिदेहुं हो देवा ॥ १ ॥
गम दुर्गम गढ़देहुँ छड़ाई । अवरो बात सुनोकछुआइ ॥ २ ॥
वही लोकके गये जन्म मरण छूटै है सो कबीरजी साहिबैकी उक्ति कहै हैं ।
साहब कहै हैं हेसुत! हे जीव! तू हमारिही सेवा मानु जिन देवतनको तैं चाहैहै
किं मैं इनको दासहौं तिन देवतनकी राज्यमैं तोको देहुँगो अर्थात् मेरो पार्षद
जब होयगो तब सबके ऊपर है जायगो ते देवता तुम्हारही सेवाकरेंगे ॥ १ ॥
औ गम जो है जगत् दुर्गम जोहै निर्गुण ब्रह्म ये दोनों धोखाजे गढ़हैं ते तोको
छोड़ाय देउँगो अर्थात् मायाते रहित तोको करिदेउँगो औ वह धोखा ब्रह्म में न
लगन देउँगो जो जीवनको संसारी करिदेइहैं तब सगुण निर्गुणके परे जो और
कछुबात है सो मेरेपार्षद कहै हैं सो तैंहूं मेरे नगीच आइकै सुनैगो ॥ २ ॥
उतपतिपरलैदेउँदेखाई । करहुराज्यसुखविलसहुजाई ॥ ३ ॥
अरु उत्पत्ति प्रलय जौनीभांति सो मेरे प्रकाशके भीतर समष्टिजीवते होइ है
सोमैं ऊंचेते तोको देखाइदेउँगो औजगतमेंआयकै जो मोको जानिकै मेरीभक्ति
करैहैं सोसुखहै सोतैंहूमेरीभक्तिकरिकै संसाररूपी राज्यमें जाइकै सुखसोंबिलसैगो

रमैनी । ( १४३ )
तोकोंसंसारबाधा न करिसकैगो । जगतरूपी राज्यके विषयानंद ब्रह्मानंद आदिक
जे सुखहैं ते सुखनहीं हैं जो कहा साहबके लोक जाइ फेरिकैसै आवैगो उहां
गये तो अपुनरावृत्ति कहिआये हैं तोकबीरजी बीरसिंह देवको साहबके लोक
लैगये लोक देखाइकै पुनि लैआइकै शिष्य करतभये औ श्रीकृष्णचन्द्र गोपनको
आपनो लोक देखाइ पुनि लैआये हैं उनको जगत् बाधानहीं करिसकैहै वे साहब
लोकही मैंहैं काहेते कि साहबको लोकप्रकाश सर्वत्र व्यापकहै साहबकी सकल
सामग्री साहबके रूपई वर्णन करि आये हैं साहब लोकप्रकाश सर्वत्रपूर्ण है
तौसाहबको लोक औ साहब सर्वत्रपूर्णई है । जे साहबको जानै हैं औ जगत्ऊमें
हैं तौसाहब के लोकई में बने हैं उनको संसार बाधा नहीं करिसकै ॥ ३ ॥
एकोवार न जैहैवांको । बहुरि जन्म नहिं होइहै ताको॥४॥
जायपायदेहौसुखधाना । निश्चयवचनकबीरकोमाना ॥५॥

( १४४ ) बीजक कबीरदास ।
साखी ॥ पाहन ह्वै ह्व सबचले, अनभितियन को चित्त ॥
जासा कियो मिताइया, सो धनभे अनहित्त॥४॥
चढ़तचढ़ावतभड़हरफोरी । मननहिंजानैंकोकरिचोरी॥१॥
चोर एकमूसलसंसारा । बिरला जनकोइजाननहारा ॥२॥
स्वर्ग पातालभूमिलैवारी । एकैराम सकल रखवारी॥ ३ ॥
गुरुवालोग आप प्राण चढ़ावै हैं अरु औरको सिखैसिखै प्राण चढ़वावै हैं
सोयही प्राण चढ़त चढ़त भड़हर जो ब्रह्म ताको फोरि कै वही धोखा ब्रह्ममें
लीनभये मनते । या नहीं जानै हैं कि साहब के ज्ञानकी चोरी को करैहै वही
धोखा ब्रह्मही तो करैहै यही नहीं जानै हैं वाहीमें लगे हैं॥१॥ सो चोर एक जो
धोखाब्रह्महै सोसंसारभरको मूसिलियो अर्थात् ब्रह्मही के ज्ञानको सबदौरे हैं
परमपुरुष को नहीं दौरे हैं तेहिते कोई बिरलाजन परमपुरुष जे श्रीरामचन्द्र हैं
तिनको जानैहै॥२॥ जे श्रीरामचन्द्र एक स्वर्ग पाताल भूमि को बारीकेसम रख-
वारी कहे रक्षा करै हैं इहां एकैराम रखवारहै यह जो कह्यो ताते बाँधनवारै
धोखा देनवारे बहुतहैं पै बंधनते छोड़ावन वारे एक श्रीरामचन्द्रई हैं दूसरों
नहीं है स्वर्गतेऊपरके भूमिते मध्यके पातालते नीचेके लोक सबआये ॥ ३ ॥
साखी ॥ पाहनह्वैह्वै सबचले, अनभितियन को चित्त ॥
जासों कियो मिताइया, सो धनभे अनहित्त॥४॥
अनभितियाको चित्तजो धोखाब्रह्महै तौनेमें लगिकै संपूर्ण जे जीवहैं ते
पाहन ह्वैगये कहेजड़वत् ह्वैगये वे धनते छोड़ावनवारे श्रीरामचन्द्रको न जानत-
भये जौन ब्रह्मते सबजीव मिताई कियो सो अनहितभये कहे संसार में डारन-
वारो धोखई ठहरयो ॥ ४ ॥
इति उनसठवीं रमैनी समाप्तं ।

. Let's transcribe प्रश्नकरेorप्रशन्नकरे? Wait, if someone typesets "प्रसन्न", sometimes in old Hindi they wrote "प्रश्न" by error for "प्रसन्न", or it's प्रशन्नकरेwhere theनhas a dot or line. Wait, let's look atप्रश्नकरे: प्रश्नकरे जायहैं`.
Wait, let's look at the prompt: "Transcribe all text ... line by line into pure, clean Markdown in original Unicode Devanagari ... full Hindi commentary/footnotes. Prefix each line with line marker like , ."

Let's continue checking the rest of Line 18 (टीका line 7):
मांगि खायहैं औ फिरि २ बिरवारूप देवतनको पलुहावैकहे प्रश्नकरे जायहैं पुनि

Line 19 (टीका line 8):
उनहीं सों सम्पति कहे नाना ऐश्वर्य होय सिद्धि होइ औ पति कहे राजाहोय
Notice:

  • उनहीं सों सम्पति कहे नाना ऐश्वर्य होय सिद्धि होइ औ पति कहे राजाहोय
  • होइ has इ, not ई or य.
  • राजाहोय has no space between राजा and होय.

Line 20 (टीका line 9

( १४६ ) बीजक कबीरदास ।
पूर्व कहिआयेहैं कि एकै रामरखवारी करै हैं सो मैंहींहौं तिहारो पति तुम मोमें
लगौ जात्तेतुम्हारो उवार ह्वैजाइ तिनको तुमपति मानिराख्योहै ते तुम्हारे पति-
नहीं हैं वे बांधने वारे हैं ॥ ४ ॥
इति साठवीं रमैनी समाप्त ।
अथ इकसठवीं रमैनी ।
चौपाई ।
धर्मकथा जो कहतै रहई । लवरी नित उठि प्रातै कहई ॥ १॥
लवरिबिहानेलवरीसाँझा । यकलावरिसतहृदयामाँझा॥२॥
रामहुंकेरमर्मनहिं जाना । लै मति ठानी वेद पुराना ॥३॥
वेदहुकेर कहानहिंकरई । जरतै रहै सुस्त नहिं परई ॥ ४ ॥
साखी ॥ गुणातीतके गांवते, आपुहिं गये गमाय ॥
माटीतन माटीमिल्यो, पवनहि पवन समाय ॥ ५ ॥
धर्मकथाजो कहतैरहई । लवरीनितउठि प्रातैकहई ॥ १ ॥
धर्म की कथा जो कहतई रहैं कि स्त्री आपने पतिही को जानै और
दूसरेंको पतिकारि न जानै परन्तु धर्म कछूजानै नहीं हैं धर्म कहां है कि जीव यह
साहबकी शक्तिहै याके पति साहब हैं तामें प्रमाण॥ “अपरेयमितस्त्वन्यांप्रकृतिं-
विद्धिमेंपराम् । जीवभूतांमहाबाहो ययेदंधार्य्यतेजगत्”॥इतिगीतायाम्॥ “वासुदे-
वःप्रमाणैकःक्ष्मायमिदंजगत”॥दूसर कबीरजीका प्रमाण॥ “दुलहिनगावौमंगल-
चार । हमरेघरआयेरामभतार ॥ तनरतिकारि मैं मनरतिकरिहौं पांचौतत्वबराती ।
रामदेवमोहिंव्याहनऐहैं मैयौवनमदमाती ॥ सरिरसरोवरवेदीकरिहौं ब्रह्मावेदउचा-
रा । रामदेवसँगभांवरिलेहौं धनिधनिभागहमारा ॥ सुरतेंतीसौकौतुकआयेमुनिवर-
सहसअठाशी । कहैकबीरहमब्याहिचलेहैं पुरुषएकअबिनाशी” ॥ तेसाहबको या
जीव नहीं जानै हैं औरऔरमें लगे है बड़े प्रातःकाल उठिकै लवरी कहै है कि
हमहीं राम हैं दूसरो नहीं है अथवा जीव जन्म लेइहै सो प्रातःकाल है नव

रमैनी। (१४७)
गर्भ में रह्यो तब साहब ते कह्योहै कि तुम मोको गर्भते छुड़ायो मैं तिहारोभ-
जन करौंगो औ जब गर्भते निकस्यो जन्मलियो तब वहबात लवरी कै डार्यो मैं
कहा कह्यो है साहब को भजन न कियो कहा करन लग्यो ॥ १ ॥
लवरिविहानेलवरीसाँझा । यकलावरिविसहदयामाँझा ॥२॥
रामहुंकर मर्मनाहिं जाना । लै मतिठानी वेद पुराना ॥३॥
सो यहितरह ते लवरी बिहाने कहैहै औ साँझके लवरीकहैहै कहे आपन औ
गुरुके औ देवताके ऐक्यता मानै है काहेते तीनि कहैं हैं कि, एक लवरी जो है
मायासो हृदयमें बसैहै सोई सब लवरी कहावै है॥२॥ सो भला ब्रह्म को मर्म न
जानै तौ न जानै काहेते कि वहतो धोखा है सो कछू वस्तु होइ तौ जानै परन्तु
सांच औ सर्वत्र पूर्ण औ सबते श्रेष्ठ ऐसे जे श्रीरामचन्द्र हैं तिनको जो या मर्म
है कि, जो कोई मेरे सन्मुख होइ ताको मैं छुड़ाइ लेउँ या जीव न जानतभये
साहब छुड़ाइ लेइहै तामें प्रमाण ॥ “अबही लेउँ छुड़ाय कालते जो घट सुरति
सम्हारो”॥ याहीहेतु सुरति दियो है मतिलैकै कहेग्रहण करिकै वेदपुराणके अर्थ
ठानै है कहे अपने सिद्धांतमें लगायदेइ है ॥ ३ ॥
वेदहु केर कहानाहिं करई । जरतैरहै सुस्त नहिं परई ॥४॥
सिद्धांततौ एकैहोइहै साहबकोसिद्धांत जो तात्पर्यवृत्तिकरिकै यह कहैहै सो
भला न जानै मुक्ति न होइ परन्तु वेदमें जो सुकर्म लिखे हैं सो करिकै नरकतें
तौ बचै सो वेदहू की कही जो विधि निषेधहै सोऊ नहीं करैहै ऐसो मूढ़ यह
जीव शोकरूपी अग्निमें जरतै रहैहै सुस्त नहीं परै है सुचित्त नहीं होय है अर्थात्
इहां कुछ छोड़्यो उहां धोखाजोब्रह्महै तहांकुछ न समझ्यो औईश्वर जे हैं तिनहूं
को काहू न मान्यो औ सबके रखवार दयालु जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनहूं छोड़्यो
तेहिते मूर्ख उंटके पाद है गयो न जमीनको न आसमान को वाको कौन
बचावै। जो कहो आत्माको चीन्हिकै बचिजाय तौ जो आत्मामें एती शक्तिहोती
तौ बंधनमें न परतो आपही बचिजातो ताते सबके रखवार जे साहबहैं तिनहींके
बचाये बचैहै ॥ ४ ॥

( १४८ ) बीजक कबीरदास ।
साखी ॥ गुणातीतके गावते, आपुहि गये गमाय ॥
माटीतन माटीमिल्यो, पवनहि पवन समाय ॥ ५ ॥
गुणातीत जो साहबको लोक ताकेगावते कहे प्रकाशतेजहांसमष्टि जीवरहै है
तहां आपुही रामनाम को साहबमुख अर्थ गमाय कै संसारमुख अर्थ
करि संसारी द्वैगयो शरीर धारणकियो पुनि माटीमें माटी मिलिगयो औ
पंवनमें पवनं मिलिगयो अर्थात् ते पुनि जैसेके तैसे ह्र गये औ जो गुणा-
तीतके गावते यह पाठ होइ तौ यह अर्थ है गुणातीत जो है धोखा ब्रह्म
ताको गावत गावत साहब को गंवाइ जातभये ॥ ५ ॥
इति ईकसठवीं रमैनी समाप्त ।
अथ बासठवीं रमैनी ।
चौपाई ।
जोतोहिं कर्त्तावर्णविचारा । जन्मत तीनिदण्ड अनुसारा १
जन्मत शूद्रभये पुनि शूद्रा । कृत्रिमजनेउ घालिजगधुंद्रा२
जोतुमब्राह्मणब्राह्मणीजाये । और राह तुम काहेन आये ३
जो तू तुरुक तुरुकनी जाया । पेटैकाहेन सुनतिकराया ४
कारी पीरी दूहाँ गाई । ताकर दूध देहु बिलगाई ५
छाडुकपटनलअधिकसयानी। कहकबीर भजुशारँगपानी ६
जोतोहिंकर्त्तावर्णबिचारा । जन्मततीनिदंडअनुसारा ॥१॥
जेतोको ब्रह्मा वर्णको बिचारकियो कि ये ब्राह्मणहैं क्षत्रीहैं बैश्य हैं शूद्रहैं
मुसल्मानहैं सो एतो शरीर के धर्महैं तीनिदण्ड जे हैं संचित क्रियमान प्रारब्ध
तिनके कर्मके अनुसारते जन्मनकहे जन्मलेइ हैं ॥ १ ॥

रमैनी। ( १४९ )
जन्मतशूद्रभयेपुनिशूद्रा। कृत्रिमजनेउघालिजगधुंद्रा ॥२॥
जोतुमब्राह्मणब्राह्मणीजाये। औरराहतुमकाहेनआये ॥३॥
जब प्रथम तेरो जन्म होइहै तबतैं शूद्रई रहै है काहेतें कि संस्कार कुल-
नहीं रहैहै औ जब मरैहै तब अशुद्धई रहैहै शिखा जनेऊ दूनो आगीमें
जरिजाइहैं तबहूं शूद्रै ह्वैजाइहै सो कृत्रिम जनेऊ पहिरिकै तैं जगतमें दन्द
मचाइ दियेहै कि हम ब्राह्मण हैं ये क्षत्री हैं ये वैश्यहैं ये शूद्रहैं ॥ २ ॥
जोकहौ हम जन्म करिकै ब्राह्मण हैं ब्राह्मणीते उत्पन्न हैं और राह ह्वै काहे
आये ब्रह्मांड फोरिकै आवते आंखी के राहह्वै आवते अशुद्ध राहह्वै काहे आये
अर्थात् न ब्राह्मणी अपनी शक्तिते उत्पन्न करिसकै औ न तैं अपनी शक्ति ते
आइसकै कर्महीते ब्राह्मणी उत्पन्न करै है कर्मही ते तैं आवै है तेहिते जन्म ते
तौ शूद्रहै संस्कारते द्विजभये वेद अभ्यास कियो तब विप्रभये औ जब ब्रह्मकों
जानैगो तब ब्राह्मण कहावैगो ताते कर्महीते ब्राह्मणत्व तोमें आवै है अहं-
ब्रह्म तो धोखही है परब्रह्म जे श्रीरामचन्द्र हैं तिनहूं को तैं न जान्यो सो तैं
ब्राह्मणकैसे होइगो जबतैं साहबको जानैगो तबहीं ब्राह्मणहोइगो ॥ ३ ॥
जोतूतुरुकतुरुकिनीजाया। पेटैकाहेनसुनतिकराया ॥४॥
कारी पीरी दूहौ गाई। ताकर दूध देहु बिलगाई ॥५॥
औ जो तू कहैहै कि हम तुरुकिनी ते उत्पन्नहैं तौ पेटै काहे न सुनति
करायो तेहिते तुरुकिनी के पेटते भयेते मुसल्मान नहीं है ॥ ४ ॥ कारीपीरी
गाइको दूध मिलाइकै कोई बिलगावै तौ काबिलग होइहै ऐसे आत्मा तौ एक-
ही जातिहै हिन्दू तुरुक नहीं ह्वै सकै है ॥ ५ ॥
छांडुकपटनरअधिकसयानी।कहकबीरभजुशारँगपानी६॥
अपनी सयानी अधिककरिकैजोकपट करिराख्यो है सोछोड़ि दे विचारिकै
देखु तैंतो आत्मा न हिंदू है न तुरुकहै तैं जाको अंश है ऐसे शारँगपाणि जे
साहबहैं ताको भजु ताकी सेवा करु शारँगपाणी जो कह्यो ताको यह हेतुहै कि
धनुषबाण लिये तेरी रक्षा करिबेको तैयार हैं और तू और औरैमें लगाहै। जो

( १५० ) बीजक कबीरदास ।
साहबमें लगेहै सोई सबते श्रेष्ठ होयहैं तामें प्रमाण॥(विप्राद्विषड्गुणयुतादरविंद
नाभादारविंदविमुखाच्छ्वपचंवरिष्ठम् । मन्येतदार्पितमनोवचनेहितार्थम्प्राणं पु-
नातिसुकुलंनतुभूरिमानः ) ॥ १ इतिभागवते ॥ ६ ॥
इति बासठवीं रमैनी समाप्त ।
अथ तिरसठवीं रमैनी ।
चौपाई ।
नाना रूप वर्ण यककीन्हा । चारि वर्ण उनकाहु न चीन्हा ॥१॥
नष्टगये करता नहिं चीन्हा। नष्टगये औरहि मन दीन्हा॥२॥
नष्टगये जिन वेद वखाना । वेद पढ़ा पै भेद न जाना ॥ ३ ॥
विमलषकैरैनर नहिंसूझा।भो अयानतवकछुवनबूझा॥४॥
साखी ॥ नाना नाच नचाइकैक, नाचै नटके वेष ॥
घट घट अविनाशी वसै, सुनहु तकी तुम शेष ॥५॥
वर्ण धर्मखंडन करि आये अब सब वर्णको एक मानि जे साहबको भूलैहैं तिनको
खंडनकरैं हैं ! नानारूप जे जीवहैं तिनको एक वर्ण कहे एक रंग करि देत भयो
अहं ब्रह्मास्मि करिकै सब मानत भयो कि हमहीं सब हैं दूसरे नहीं है चारिउवर्ण
वहीको वर्णन करतभये यह न जानतभये कि यह धोखा ब्रह्मको खाई लेइहै॥ १॥
फिरिफिरि सब जीव नष्ट ह्वैगये कहे मरि गये उद्धारकर्त्ता जो साहबहै ताको न
चीन्हतभये औ औरहि जो धोखा ब्रह्महै तौनेमें मन दैके नष्टह्वैगये अर्थात् लीन
ह्वैगये साहबकोतो जाने नहीं फिर संसारी भये॥२॥जै वेदको बखानिकै पढ़िप-
ढ़िकै औरनको अर्थ सुनावै हैं तेवेदपढ़्यो परंतु भेद न जान्यो कहे वेद को
तात्पर्य जे साहब हैं तिनको न जान्यो तेहिते नष्ट ह्वैगये सब वेदको भेद साह-
बहै तामें प्रमाण ॥ (सर्वेवेदायत्पदमामनन्ति) ॥ ३ ॥ बिमलष जो साहब मन
बचनके परे ताको खंकहे आकाशवत् शून्य ज्ञान करै है कि, वह नहीं हैं
आकाशवत् ब्रह्मही पूर्ण है सो उनके ज्ञान नेत्र तौ हई नहीं हैं साहब कैसे सूझि

रमैनी । ( १५१ )
परै जब न सूझि पर्यो तब अज्ञान द्वैगये नेतिनेति कहनलगे कि, अकथ है
कबीरजीका प्रमाण ॥ "वेदविचारि भेद जो जानै। सतगुरु मर्मशब्द पहिचानै"
॥ ४ ॥ गुरुवा लोग कहैं कि, वही जोहै अविनाशी सो सबके घटघट में
सबको नाच नचावै है औनटके वेष आपो नाचै है । सो कबीरजी शेखतकीसों
कहैं हैं कि, हे शेखतकी ! जो सबको नाचनचावैगो आपनटके वेष नाचैगो सो
अविनाशीकैसेहोइगो काहेते कि नटएक वेषलैआयोपुनि वह वेष छोड़िके और
वेष लैआयो याही भांति नानावेष नट धारणकरै हैं ते सब अनित्यहैं नाना वेष
धरिबो तौ मायाके गुणहैं वह मायाके परे कैसे होइगो औ जब मायाते परै
न होइगो तौ अविनाशी कैसे होइगो सो हे शेखतकी तुम सुनो वाहूबिचार करत
करत जो शेष रहिजायहै सो तुमहौ बातो तुम्हारहो अनुभवहै अथवा तुम शेषहौ
सो कार निराकार के परे जो साहब है ताको तुम शेष हौ कहै अंशहौ ॥ ५ ॥
इति तिरसठवीं रमैनी समाप्त ।
अथ चौंसठवीं रमैनी ।
चौपाई ।
काया कंचन यतन कराया।बहुत भांतिकै मन पलटाया॥१॥
जो सौवार कहौ समुझाई । तहिबो धराछोड़ि नहिंजाई ॥२॥
जनकेकहे जो जन रहिजाई।नवो निधि सिद्धी तिनपाई॥३॥
सदाधर्म तेहि हृदयाबसई । राम कसौटी कसते रहई ॥४॥
जोरि कसावै अंतै जाई । तौ बाउर आपुहि बौराई ॥ ५ ॥
साखी ॥ ताते परी कालकी फांसी, करहु आपनो शोच ॥
जहां संत तहँ संत सिधावै,मिलि रहे पोचै पोच ॥६॥
कबीरजी कहैहैं कि ईजीवनके कायाको हम बहुत यतनकरवाया औ बहुत भांति
ते मन पलटाया कि तू धोखा कों त्यागि कंचन आपने स्वरूपको जानै॥ १ ?