कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ११२ ) बीजक कबीरदास ।
अथ अड़तीसवींरमैनी ।
चौपाई ।
यहिविधिकहौं कहानहिंमाना।मारगमाहिंपसारिनि ताना १
रातिदिवसमिलिजोरिनितागा।ओटतकाततभर्म न भागा २
भर्मै सबघट रह्यो समाई। भर्मछोड़ि कतहूं नहिं जाई॥३॥
परैनपूरि दिनोंदिन छीना।जहां जाहु तहँ अंगविहीना ॥४॥
जोमतआदिअंतचलिआया।सोमतिउनसवप्रगटसुनाया ५
साखी ॥ वहसंदेश फुरमानिकै, लीन्हो शीशचढ़ाय ॥
संतोहै संतोषसुख, रहहु तौ हृदय जुड़ाय ॥ ६ ॥
यहिविधिकहौंकहानहिंमाना।मारगमाहिंपसारिनिताना १॥
कबीरजी कहैहैं कि सत्ययुगमें सत्यसुकृत नामते, त्रेतामें मुनीन्द्र नामतें,
द्वापरमें करुणामय नामते, कलियुगमें कबीर नामते, मैं चारो युगमें जीवनको
रामनामको अर्थ साहबमुख समुझायो पै कोई जीव कहा न मान्यो वेदमार्गमें
ताना पसारतभये कहे अपने कहे अपने अपने मतमें अर्थ करिलेतेभये ॥ १ ॥
रातिदिवसामिलिजोरिनितागा।ओटतकाततभर्मनभागा २॥
औ रातिउ दिन तागा जोरतभये कहे वेदार्थको अपने अपने मतमें लगावत
भये अर्थात् जहां जहां अर्थ नहीं लगैहै तहांतहां अपने मतमें योजित
करतभये औ ओटत कातत कहै शंकासमाधान करत करत भर्म न भाग्यो यहां
ताना प्रथम कह्यो ओटब कातब पीछे कह्यो सो प्रथम शंका समाधान करिकै
काति ओटि कै ताना तनतभये अर्थ बनावत भये जब बन्यो तब फेरफेर शंका
समाधान करि ओटिकाति अर्थको ताना पसारत भये भर्म न भाग्यो एक
सिद्धांत न भयो ॥ २ ॥