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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 176

( १२६ ) बीजक कबीरदास ।
जेभर ब्रह्माण्डके भीतरहैं ते सब नाशमानहैं संसार समुद्रमें ऐसो माया
लपेट्यो कि यह मत्स्य( जीव )माया है गई अर्थात् मिलिगई है कहै जीवनको
शरीरमें डारिदियो है शरीरही देखपरैहै जीवको खोजनहीं मिलै है भीतर
बाहरमनमास आदिक वह जड़ मायहीदेखिपरैहै यमरा जो ढीमर कालहै सो
शिकार खेलैहै तातें कोईनहींउबरैहै कोईहालहीमरैहै कोईमहाप्रलयमें
मरैहै ॥ १ ॥ ५ ॥
इति छियालीसवीं रमैनी समाप्त ।
अथ सैंतालीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
जरासिंध शिशुपालसँहारा । सहस अर्जुनै छल सों मारा १
बड़छल रावणसो गये वीती । लंकारह कंचनकी भीती २
दुर्योधनअभिमानहिंगयऊ । पंडवकेर मरम नहिंपयऊ॥३॥
मायाके डिभगे सबराजा । उत्तम मध्यम बाजनवाजा ४
छांचकवैवितधरणिसमाना । यकौजीवपरतीति न आना ५
कँहलौं कहौं अचेते गयऊ । चेतअचेत झगर यकभयऊ ६
साखी ॥ ईमाया जग मोहिनी, मोहिसि सब जगधाइ ॥
हरिचन्द्र सतिके कारने, घर २ गये बिकाइ॥७॥
ये जे राजा बड़े २ गनाय आये तेसब मारेपरे कोई उत्तम कोई मध्यम
कोई निकृष्ट कर्मकारिकै गये सो कहांलौं मैं कहौं चित अचितके झगरा ते कहै
चिंत जीव अचित माया ई दूनौके संयोग ते सब जीव पृथ्वीमें मिलिगये
अपेन शुद्ध आत्माको न जानत भये यह माया जोहै जगमोहनी सोसब जगको
धायकै मोहिलेटभई हरिश्चन्द्र जेराजा हैं तेसत्यके कारणे विद्यामाया में बँधिकै
घर २ बिकाय जातभये पुत्र बिकानो स्त्री बिकानी ॥ १ ॥ ७ ॥
इति सैंतालीसवीरमैनी समाप्त ।