कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरमैनी । ( १२१ )
जे जीवात्महींको जानै हैं साहबको नहीं जानै हैं तिनहीं को अंदेशपरै है
काहेते कि सब झूठहीहै वही सँदेश कहैहैं जबयमदूत मारनलगै तब वा मारु-
देखि उनको अंदेश परैहै कि हमारी रक्षा कौनकरै है सो या पापिनकी दशा
गरुड़ पुराणमेंप्रसिद्धहै ४ साहबके जाननवारे जैसाधुहैं तिनकी संगति छोड़िकै
जेअसरारकहे कफरई करैहैं अपने जीवात्मैको मालिक मानैहैं साहबको नहीं
जानैहैं उकहे वे जेदुष्टहैं ते बहै मोटनरकको भारा कहे नरकको है भार जामें
ऐसी जोमायाकी मोटरी ताहीको बहै कहे ढोवैहैं ॥ ५ ॥
साखी ॥ गुरुद्रोही औ मनमुखी, नारीपुरुषविचार ॥
तेनरचौरासीभ्रमाहिं, जब लगिशशिदिनकार॥६॥
कबीरजी कहैहैं कि शुकादिक मुनि वेद पुराण साधु औ जे जे साहबके
बतावन वारेहैं सो येई गुरुहैं जो कोई इनकी बाणी को मिथ्या मानै है सोई
गुरुद्रोही है सो गुरुद्रोही औ मनमुखी कहे अपने मनैते नारिनर विचारिकै जे
एक जीवात्महींको मालिकमानै हैं ते चौरासी लक्ष योनिही में जबलगि सूर्यचन्द्र-
मा रहै हैं तबलगि वाहीमें परे रहैहैं ॥ ६ ॥
इति तैंतालीसवीं रमैनी समाप्त ।
अथ चौवालीसवीं रमैनी ।
चौपाई
कवहूं न भये संग औ साथा । ऐसो जन्म गँवाये हाथा ॥ १॥
बहुरि न ऐसो पैहौ थाना । साधुसंगतुमनहिं पहिंचाना ॥२॥
अवतौ होइ नरकमें वासा। निशिदिनपरेलवारके पासा॥ ३॥
साखी ॥ जात सवन कहँ देखिया, कहै कबीर पुकार॥ ॥
चेतना होहु तौ चेति ले, दिवस परत हैं धार ॥ ४ ॥