कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरमैनी । ( १२५ )
मारचो तब आँधरहैगयो गिर्दानहीं मूसकोखायलियो औ सर्प जैसे गहेजुवा कहैं
छुछूंदरको धरहै जो उगिलै तो आँधर हैजायहै खायतो मरि जाय ऐसे सब
जीवनकी जातिहै जे कर्मकांडीहैं ते जैसे मछरी केचुवाको जब खायहै तब
मुहँमें बंसी चुभिजायहै वाहीमें फँसिजायहै तैसे स्वर्गादिकफल की चाहकरि
कर्मकरैहै जनन मरण नहीं छूटैहै काल खायलेइ है औ जे ज्ञानकांडीहैं ते
साहबको ज्ञान तो काचोहै अपने शाखबल या कहैंहैं कि हम समुझायकै पाखं-
डमतवारे जे हैं तिनको अपने मतमें लै आवेंगे या बिचारि तिनके यहां गये सो
बे धोखा ब्रह्मरूप उपदेश फूंक ऐसा मारचो कि आंधरे है गये साहब को जौन
ज्ञानरहै सो भूलिगये तो उनके खाबेको पै वोई उलटिकै खायगे औ उपासना
कांडी जे हैं ते अपने अपने इष्टकी उपासना धरचो सोतौ छोड़तहीनहीं बनैहै
डरैहै कि देवता खफा न होइ आंधर न करिदेइ जो न छोड़ै तो वाही देवताके
लोकगये औ फेरिआये जन्ममरण नहीं छूटैहै जैसेसांप छुछूंदरको धरचो परन्तु
न उगलत बनै न लीलतबनै ताते कबीरजी कहैंहैं कि साहबको जानो जनन
मरण उनहीं के छुड़ाये छूटैगो ॥ ७ ॥
इति पैंतालीसवींरमैनी समाप्त ।
अथ छियालीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
बिनसै नाग गरुड़ गलिजाई । विनसै कपटी औ सतभाई १
विनसैपापपुण्यजिनकीन्हा।विनसैगुणनिर्गुणजिनचीन्हा२
बिनसैअग्निपवनअरुपानी । विनसै सृष्टिजहांलों गानी३
विष्णुलोक विनसै छनमाहीं । हो देखा परलयकी छाहीं ४
साखी ॥ मच्छरूप माया भई, यमरा खेलहि अहेर ॥
हरिहर ब्रह्म न ऊबरे, सुरनर मुनि केहिकेर ॥ ५ ॥