सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

२३२ हितोपदेशः [ संधिः ३३-
दूसरेके राज्यमें रहने वाला, बहुतसे शत्रुओंसे युक्त, वे अवसर लडाई ठानने
वाला, और सत्य धर्मसे रहित, ये बीस पुरुष हैं ॥ ३२ ॥
एतैः संधिं न कुर्वीत विगृह्णीयात्तु केवलम् ।
एते विगृह्यमाणा हि क्षिप्रं यान्ति रिपोर्वशम् ॥ ३३ ॥
इनके साथ सन्धि न करे, केवल ही संग्राम करे, क्योंकि ये लड़ कर अवश्य
शीघ्र ही शत्रुके वशमें आ जाते हैं ॥ ३३ ॥
बालस्याल्पप्रभावत्वान्न लोको योद्धुमिच्छति ।
युद्धायुद्धफलं यस्माज्ज्ञातुं शक्तो न बालिशः ॥ ३४ ॥
बालकके थोड़े प्रताप होनेसे पुरुष युद्ध (विरोध)करनेकी इच्छा नहीं करता है,
क्योंकि बालक लड़ने और नहीं लड़नेका फल ( भला या बुरा ) नहीं जान
सकता है ॥ ३४ ॥
उत्साहशक्तिहीनत्वाद्वृद्धो दीर्घामयस्तथा ।
स्वैरेव परिभूयेते द्वावप्येतावसंशयम् ॥ ३५ ॥
और वृद्ध तथा बहुत कालका रोगी ये दोनों, उत्साह और शक्तिसे हीन होनेके
कारण अवश्य आप ही पराजय पाते हैं ॥ ३५ ॥
सुखोच्छेद्यो हि भवति सर्वज्ञातिबहिष्कृतः ।
त एवैनं विनिघ्नन्ति ज्ञातयस्त्वात्मसात्कृताः ॥ ३६ ॥
सब जातिसे बाहर निकाला गया शत्रु सहजही मारा जा सकता है, क्योंकि
उसी जातिके ही मनुष्य इसके धनादिको अपने वशमें करके इसको मार डालते
हैं ॥ ३६ ॥
भीरुर्युद्धपरित्यागात् स्वयमेव प्रणश्यति ।
तथैव भीरुपुरुषः संग्रामे तैर्विमुच्यते ॥ ३७ ॥
और डरपोक मनुष्य युद्धमें पीठ दे कर भाग जानेसे अपने आप ही नष्ट हो
जाता है, और उस डरपोकको संग्राममें उसके साथी भी छोड़ देते हैं ॥ ३७ ॥
लुब्धस्यासंविभागित्वान्न युध्यन्तेऽनुयायिनः ।
लुब्धानुजीविकैरेष दानभिन्नैर्निहन्यते ॥ ३८ ॥
और यथा योग्य भाग नहीं देनेसे लोभीकी सेनाके लोग नहीं लड़ते हैं और
पारितोषिक नहीं पाने वाले लोभी सेवकोंसे वह मार डाला जाता है-अर्थात्
विपत्ति आने पर वे उसे छोड़ कर चले जाते हैं ॥ ३८ ॥

-४५ ] उन्नतिपथमें अनुचित कृत्यसे हानि २३३
संत्यज्यते प्रकृतिभिर्विरक्तप्रकृतिर्युधि ।
सुखाभियोज्यो भवति विषयेष्वतिसक्तिमान् ॥ ३९ ॥
बिगड़ी हुई प्रजा वाला ( राजा ) युद्धमें प्रजासे छोड़ दिया जाता है, और
जो विषयोंमें अधिक आसक्त होकर रहता है वह सहजहीमें हराया जा सकता
है ॥ ३९ ॥
अनेकचित्तमन्त्रस्तु भेद्यो भवति मन्त्रिणा ।
अनवस्थितचित्तत्वात् कार्यतः स उपेक्ष्यते ॥ ४० ॥
अनेक मनुष्योंसे गुप्त परामर्शको प्रकट करने वालेकी मंत्रीके साथ फूट हो जाती
है, और अनवस्थित(डामाडोल) चित्तके कारण कार्यमें मंत्री उसे छोड़ देता है ॥
सदा धर्मबलीयस्त्वाद्देवब्राह्मणनिन्दकः ।
विशीर्यते स्वयं ह्येष दैवोपहतकस्तथा ॥ ४१ ॥
धर्मके कारण बलवान् होनेसे भी, देवता और ब्राह्मणोंकी निंदा अथवा अवज्ञा
करने वाला और प्रारब्धहीन निस्सन्देह अपने आपही नाश हो जाता है ॥४१॥
संपत्तेश्च विपत्तेश्च दैवमेव हि कारणम् ।
इति दैवपरो ध्यायन् नात्मानमपि चेष्टते ॥ ४२ ॥
संपत्ति और विपत्तिका प्रारब्ध ही कारण है ऐसा सोच कर केवल प्रारब्धको
(ही प्रधान) मानने वाला अपने आपको काममें नहीं लगाता है ॥ ४२ ॥
दुर्भिक्षव्यसनी चैव स्वयमेव विषीदति ।
बलव्यसनयुक्तस्य योद्धुं शक्तिर्न जायते ॥ ४३ ॥
दुर्भिक्षकी पीड़ासे दुखी प्रजा वाला राजा आप ही दुर्बल होता है और पीड़ित
सेना वालेको लड़नेकी शक्ति नहीं होती है, अर्थात् नष्ट हो जाती है ॥ ४३ ॥
अदेशस्थो हि रिपुणा स्वल्पकेनापि हन्यते ।
ग्राहोऽल्पीयानपि जले गजेन्द्रमपि कर्षति ॥ ४४ ॥
पराये राज्यमें रहने वाला राजा थोड़े शत्रुओंसे भी मारा जाता है, क्योंकि
जलमें छोटेसे छोटाभी मकर बड़े हाथीको खींच लेता है ॥ ४४ ॥
बहुशत्रुस्तु संत्रस्तः श्येनमध्ये कपोतवत् ।
येनैव गच्छति पथा तेनैवाशु विपद्यते ॥ ४५ ॥
बहुतसे शत्रु वाला, डरा हुआ मनुष्य, बाज पक्षियोंके मध्यमें कबूतरके
समान जिस मार्गसे जाता है उसी मार्गसे दुखी होता है ॥ ४५ ॥

२३४ हितोपदेशः [ संधिः ४६-
अकालसैन्ययुक्तस्तु हन्यते कालयोधिना ।
कौशिकेन हतज्योतिर्निशीथ इव वायसः ॥ ४६ ॥
युद्धके अनुचित समयमें सेनासे युक्त भी मनुष्य उचित समय पर लड़ने वालेसे
आधी रातमें नहीं दीखनेके कारण उलूकसे मारे हुए कागके समान मारा जाता है ॥
सत्यधर्मव्यपेतेन संदध्यान्न कदाचन ।
स संधितोऽप्यसाधुत्वादचिराद्याति विक्रियाम् ॥ ४७ ॥
सत्य तथा धर्मरहितके साथ कभी मेल न करना चाहिये, क्योंकि वह संधिके
हो जाने पर भी असज्जनताके कारण तुरन्त पलट जाता है ॥ ४७ ॥
अपरमपि कथयामि । संधिविग्रहयानासनसंश्रयद्वैधीभावाः षाड्गु-
ण्यम् । कर्मणामारम्भोपायः पुरुषद्रव्यसंपद्देशकालविभागो विनि-
पातप्रतीकारः कार्यसिद्धिश्च पञ्चाङ्गो मन्त्रः । सामदानभेददण्डा-
श्चत्वार उपायाः । उत्साहशक्तिर्मन्त्रशक्तिः प्रभुशक्तिश्चेति शक्ति-
त्रयम् । एतत्सर्वमालोच्य नित्यं विजिगीषवो भवन्ति महान्तः ।
और भी कहता हूँ—संधि (मैत्रीभाव), विग्रह (युद्ध), यान (यात्रा), आसन
(समय देखना), संश्रय (आश्रय लेना), द्वैधीभाव (छल), ये छः गुण हैं और
कर्मोंके आरंभका यत्न, पुरुष और द्रव्यका संग्रह, देशकालका विभाग और
विनिपातप्रतीकार (आपत्तिका दूर करना), कार्यसिद्धि ये पाँच विचारके अंग
हैं । साम, दान, भेद, दंड ये चार उपाय हैं और उत्साहशक्ति, मन्त्रशक्ति और
प्रभुशक्ति ये तीन शक्तियाँ हैं । इन सबको विचार कर बड़े पुरुष जीतनेकी इच्छा
करने वाले होते हैं ॥
या हि प्राणपरित्यागमूल्येनापि न लभ्यते ।
सा श्रीर्नीतिविदं पश्य चञ्चलापि प्रधावति ॥ ४८ ॥
जो लक्ष्मी प्राणत्यागरूपी मोलसे भी नहीं मिलती है वह लक्ष्मी चंचला
होनेसे भी नीति जानने वालोंके घर दौड़ती है, अर्थात् उनके वहाँ निवास
करती है ॥ ४८ ॥
तथा चोक्तम् ,—
जैसा कहा है,—

-५० ] राजा का सन्धि करने में हठ २३५
वित्तं यदा यस्य समं विभक्तं
गूढश्चरः संनिभृतश्च मन्त्रः ।
न चाप्रियं प्राणिषु यो ब्रवीति
स सागरान्तां पृथिवीं प्रशास्ति ॥ ४९ ॥
जिसका धन बराबर बाँट दिया गया है, तथा दूत गुप्त है, और मंत्र प्रका-
शित नहीं है, और जो प्राणियोंसे अप्रिय (कटु) वचन नहीं बोलता है वह
समुद्रपर्यन्त पृथिवीका राज्य करता है अर्थात् चक्रवर्ती राजा हो जाता है ॥४९॥
किंतु यद्यपि महामन्त्रिणा गृध्रेण संधानमुपन्यस्तं तथापि तेन
राज्ञा संप्रति भूतजयदर्पान्न मन्तव्यम् । देव ! तदेवं क्रियताम् ।
सिंहलद्वीपस्य महाबलो नाम सारसो राजाऽस्मन्मित्रं जम्बुद्वीपे
कोपं जनयतु ।
परन्तु यद्यपि महामंत्री गिद्धने संधि करनेका आरंभ किया है तोभी वह
राजा विजय होनेके घमंडसे अब नहीं मानता है, इसलिये महाराज ! ऐसा
कीजिये कि सिंहलद्वीपका राजा महाबल नाम सारस हमारा मित्र जम्बूद्वीप पर
कोप करे ।
यतः,—
सुगुप्तिमाधाय सुसंहतेन
बलेन वीरो विचरन्नरातिम् ।
संतापयेद्येन समं सुतप्त-
स्तप्तेन संधानमुपैति तप्तः ॥ ५० ॥
क्योंकि—वीर, बड़े गुप्त प्रकारसे अनुरक्त सेनाके द्वारा शत्रुको घेर कर पीड़ा
दे कि जिस पीड़ासे वह समान तप्ता अर्थात् उग्र हो जाय, क्योंकि तप्ता
तत्तेके साथ मिल जाता है, अर्थात् तुल्य पराक्रम वाला सहजमें मिला लिया
जाता है ॥ ५० ॥
राज्ञा 'एवमस्तु' इति निगद्य विचित्रनामा बकः सुगुप्तलेखं दत्त्वा
सिंहलद्वीपं प्रहितः ।
राजाने 'बहुत अच्छा' ऐसा कह कर विचित्र नाम बगुलेको गुप्त चिट्ठी दे कर
सिंहलद्वीपको भेज दिया ।

२३६ हितोपदेशः [ संधिः ५१-
अथ प्रणिधिरागत्योवाच—'देव ! श्रूयतां तत्रत्यप्रस्तावः । एवं
तत्र गृध्रेणोक्तम्—'देव ! यन्मेघवर्णस्तत्र चिरमुषितः स वेत्ति
किं संधेयगुणयुक्तो हिरण्यगर्भो न वा ?' इति । ततोऽसौ राज्ञा
समाहूय पृष्टः—'वायस ! कीदृशोऽसौ हिरण्यगर्भः ? चक्रवाको
मन्त्री वा कीदृशः ?' वायस उवाच—'देव ! हिरण्यगर्भो राजा
युधिष्ठिरसमो महाशयः, चक्रवाकसमो मन्त्री न क्वाप्यवलो-
क्यते ।' राजाह—'यद्येवं तदा कथमसौ त्वया वञ्चितः ?' ।
फिर दूतने आ कर कहा-'महाराज ! वहाँका समाचार सुनिये । वहाँ गिद्धने
यों कहा है कि हे महाराज ! मेघवर्ण काक जो वहाँ बहुत दिनों तक रहा था वह
जानता है कि हिरण्यगर्भ मिलापके योग्य गुणोंसे युक्त है या नहीं।' फिर राजाने
उसे बुला कर पूछा-'हे कौए ! वह हिरण्यगर्भ कैसा है?' और चकवा मंत्री कैसा
है ?' कौएने उत्तर दिया-'महाराज ! राजा हिरण्यगर्भ युधिष्ठिरके समान सज्जन
है; चकवेके समान मंत्री कहीं भी नहीं दीखा है।' राजा बोला—'जो ऐसाही
है तो तूने उसे कैसे ठग लिया ?'
विहस्य मेघवर्णः प्राह—'देव !
मेघवर्णने हँस कर कहा-'महाराज !
विश्वासप्रतिपन्नानां वञ्चने का विदग्धता ? ।
अङ्कमारुह्य सुप्तं हि हत्वा किं नाम पौरुषम् ? ॥ ५१ ॥
विश्वास करने वाले मनुष्योंको ठगनेमें क्या चतुराई है ? जैसे गोदमें लेट कर
सोए हुएको मार देनेमें कौनसा पुरुषार्थ है ? अर्थात् कुछ भी नहीं है ॥ ५१ ॥
शृणु देव ! तेन मन्त्रिणाहं प्रथमदर्शन एव ज्ञातः । किंतु महाशयो-
ऽसौ राजा । तेन मया विप्रलब्धः ।
सुनिये महाराज ! उस मंत्रीने पहले देखते ही मुझे जान लिया था, परन्तु
वह राजा बड़ा सज्जन है इसलिये मेरी ठगाईमें आ गया;
तथा चोक्तम्,—
आत्मौपम्येन यो वेत्ति दुर्जनं सत्यवादिनम् ।
स तथा वञ्च्यते धूर्तैर्ब्राह्मणश्छागतो यथा' ॥ ५२ ॥

राजा बोला—'यह कथा कैसी है ? मेघवर्ण कहने लगा ।—

-५३ ] ब्राह्मणका ठगोंसे ठगा जाना २३७
जैसा कहा है—जो मनुष्य अपने समान दुर्जनको सत्य बोलने वाला समझता
है वह मनुष्य वैसाही ठगा जाता है, जैसा बकरेके कारण धूर्त्तोंने ब्राह्मणको
ठगा लिया' ॥ ५२ ॥
राजोवाच—'कथमेतत् ?' । मेघवर्णः कथयति—
राजा बोला—'यह कथा कैसी है ? मेघवर्ण कहने लगा ।—
कथा १०
[ एक ब्राह्मण, बकरा और तीन ठगोंकी कहानी १० ]
'अस्ति गौतमस्यारण्ये प्रस्तुतयज्ञः कश्चिद्ब्राह्मणः। स च यज्ञार्थं
ग्रामान्तराच्छागमुपक्रीय स्कन्धे कृत्वा गच्छन् धूर्तत्रयेणावलो-
कितः । ततस्ते धूर्ता 'यद्येष च्छागः केनाप्युपायेन लभ्यते तदा
मतिप्रकर्षो भवति' इति समालोच्य वृक्षत्रयतले क्रोशान्तरेण तस्य
ब्राह्मणस्यागमनं प्रतीक्ष्य पथि स्थिताः । तत्रैकेन धूर्तेन गच्छन्स
ब्राह्मणोऽभिहितः—'भो ब्राह्मण ! किमिति कुक्कुरः स्कन्धेनोह्यते ?'।
विप्रेणोक्तम्—'नायं श्वा; किंतु यज्ञच्छागः।' अथानन्तरस्थितेना-
न्येन धूर्तेन तथैवोक्तम् । तदाकर्ण्य ब्राह्मणश्छागं भूमौ निधाय
मुहुर्निरीक्ष्य पुनः स्कन्धे कृत्वा दोलायमानमतिश्चलितः ।
'गौतमके वनमें किसी ब्राह्मणने यज्ञ करना आरंभ किया था। और उसको
यज्ञके लिये दूसरे गाँवसे बकरा मोल ले कर कंधे पर रख कर ले जाते हुए तीन
ठगोंने देखा । फिर उन ठगोंने "यह बकरा किसी उपायसे मिल जाय तो बुद्धिकी
चालाकी बढ़ जाय" यह विचार कर तीनों तीन वृक्षोंके नीचे, एक एक कोसके
अन्तरसे, उस ब्राह्मणके आनेकी बाट देख कर मार्गमें बैठ गये । वहाँ एक धूर्त्तने
जा कर उस ब्राह्मणसे कहा—'हे ब्राह्मण ! यह क्या बात है कि कुत्ता कंधे पर
लिये जाते हो ?' ब्राह्मणने कहा,-'यह कुत्ता नहीं है, यज्ञका बकरा है।' फिर
इससे आगे बैठे हुए दूसरे धूर्तने वैसे ही कहा। यह सुन कर ब्राह्मण बकरेको
धरनी पर रख कर बार बार देख फिर कंधे पर रख कर चलायमान चित्त-सा हो
कर चलने लगा ।
यतः,—
मतिर्दोलायते सत्यं सतामपि खलोक्तिभिः ।
ताभिर्विश्वासितश्चासौ म्रियते चित्रकर्णवत्' ॥ ५३ ॥

राजा बोला—'यह कथा कैसी है ?' वह कहने लगा ।—

क्योंकि—सज्जनोंकी भी बुद्धि दुष्टोंके वचनोंसे सचमुच चलायमान हो जाती
है—जैसे दुष्टोंकी बातोंसे विश्वासमें आ कर यह ब्राह्मण चित्रकर्णनामक ऊँटके
समान मरता है' ॥ ५३ ॥
राजाह—'कथमेतत् ?' । स कथयति—
राजा बोला—'यह कथा कैसी है ?' वह कहने लगा ।—
कथा ११
[ मदोत्कट नामक सिंह और सेवकोंकी कहानी ११ ]
‘अस्ति कस्मिंश्चिद्वनोद्देशे मदोत्कटो नाम सिंहः । तस्य सेव-
कास्त्रयः काको व्याघ्रो जम्बुकश्च । अथ तैर्भ्रमद्भिः कश्चिदुष्ट्रो
दृष्टः पृष्टश्च—'कुतो भवानागतः सार्थाद्भ्रष्टः ?' । स चात्मवृत्तान्त-
मकथयत् । ततस्तैर्नीत्वा सिंहेऽसौ समर्पितः । तेनाभयवाचं दत्त्वा
चित्रकर्ण इति नाम कृत्वा स्थापितः । अथ कदाचित्सिंहस्य शरीर-
वैकल्याद्भूरिवृष्टिकारणाच्चाहारमलभमानास्ते व्यग्रा बभूवुः । तत-
स्तैरालोचितम्—'चित्रकर्णमेव यथा स्वामी व्यापादयति तथाऽनु-
ष्ठीयताम् । किमनेन कण्टकभुजा ?' व्याघ्र उवाच—'स्वामिनाऽभ-
यवाचं दत्त्वाऽनुगृहीतस्तत्कथमेवं संभवति ?' । काको ब्रूते—'इह
समये परिक्षीणः स्वामी पापमपि करिष्यति ।
‘किसी वनमें मदोत्कट नाम सिंह रहता था । उसके काग, बाघ और सियार
तीन सेवक थे । पीछे उन्होंने घूमते घूमते किसी ऊँटको देखा और पूछा—'तुम
साथियोंसे बिछड कर कहाँसे आये हो ?' फिर उसने अपना वृत्तान्त कह सुनाया ।
तब उन्होंने उसे ले जा कर सिंहको सौंप दिया । उसने अभय-वचन दे कर उसका
चित्रवर्ण नाम रख कर रख लिया । बाद एक दिन वे सिंहके शरीरमें खेद तथा
वर्षाके कारण भोजनको न पा कर दुखी होने लगे । फिर उन्होंने विचारा जिसमें
चित्रकर्णको ही स्वामी मारे सो उपाय करो । इस काँटे चरने वालेसे क्या है ?'
बाघ बोला—'स्वामीने उसे अभय-वचन दे कर रक्खा है इसलिये ऐसा कैसे हो
सकता है ?' काग बोला—'इस समय भूखसे घबराया हुआ स्वामी (सिंह)
पाप भी करेगा ।

-५५] अभयदानका भंग करनेमें कौवेकी युक्ति २३९
यतः,-
त्यजेत् क्षुधार्ता महिला स्वपुत्रं,
खादेत् क्षुधार्ता भुजगी स्वमण्डम् ।
बुभुक्षितः किं न करोति पापं ?
क्षीणा नरा निष्करुणा भवन्ति ॥ ५४ ॥
क्योंकि-भूखी स्त्री अपने पुत्रको छोड़ देती है, भूखी नागन अपने अंडेको
खा लेती है, और भूखा क्या क्या पाप नहीं करता है ? क्योंकि क्षीण मनुष्य
करुणाहीन होते हैं, अर्थात् भूख और बुढ़ापेसे क्षीण यह सिंह दयारहित बन
जायगा ॥ ५४ ॥
अन्यच्च,-
मत्तः प्रमत्तश्चोन्मत्तः श्रान्तः क्रुद्धो बुभुक्षितः ।
लुब्धो भीरुस्त्वरायुक्तः कामुकश्च न धर्मवित्' ॥ ५५ ॥
और दूसरे-मतवाला, असमर्थ, उन्मत्त, थका हुआ, क्रोधित, भूखा, लोभी,
डरपोक, बिना विचारे करने वाला, और कामी ये धर्मके जानने वाले नहीं होते
हैं ॥ ५५ ॥
इति संचिन्त्य सर्वे सिंहान्तिकं जग्मुः । सिंहेनोक्तम्-'आहारार्थं
किंचित्प्राप्तम् ?'। तैरुक्तम्-'यत्नादपि न प्राप्तं किंचित् ।' सिंहेनो-
क्तम्-'कोऽधुना जीवनोपायः ?' । काको वदति-'देव ! स्वाधी-
नाहारपरित्यागात् सर्वनाशोऽयमुपस्थितः ।' सिंहेनोक्तम्-
'अत्राहारः कः स्वाधीनः ?' । काकः कर्णे कथयति-'चित्रकर्णः'
इति । सिंहो भूमिं स्पृष्ट्वा कर्णौ स्पृशति । अभयवाचं दत्त्वा
धृतोऽयमस्माभिः । तत्कथमेवं संभवति ?
यह विचार कर सब सिंहके पास गये । सिंहने कहा-'आहारके लिये कुछ
मिला?' उन्होंने कहा-'यत्न करनेसे भी कुछ नहीं मिला ।' सिंहने कहा-'अब
जीनेका क्या उपाय है ? कागने कहा-महाराज ! आपने आधीन आहारको
त्यागनेसे यह सब नाश आ पहुँचा है'। सिंहने कहा-'यहाँ पर कौनसा आहार
अपने आधीन है ?' कागने कानमें कहा-'चित्रकर्ण ।' सिंहने भूमिको छू कर
कान छुए । अभय वाचा दे कर इसको हमने रक्खा है, इसलिये ये कैसे हो
सकता है ?'

२४० हितोपदेशः [ संधिः ५६-
तथा च,-
न भूप्रदानं न सुवर्णदानं
न गोप्रदानं न तथाऽन्नदानम्।
यथा वदन्तीह महाप्रदानं
सर्वेषु दानेष्वभयप्रदानम् ॥ ५६ ॥
जैसा कहा है-इस संसारमें जैसा सब दानोंमें श्रेष्ठ दान अभयदान कहा है,
वैसा न तो भूमिदान, न सुवर्णदान, न गोदान और न अन्नदान कहा है ॥५६॥
अन्यच्च,-
सर्वकामसमृद्धस्य अश्वमेधस्य यत्फलम् ।
तत्फलं लभते सम्यग्रक्षिते शरणागते' ॥ ५७ ॥
और दूसरे सब-मनोरथोंको देने वाले अश्वमेध यज्ञका जो फल है वही फल
शरणागतकी अच्छी तरह रक्षा करनेसे मिलता है' ॥ ५७ ॥
काको ब्रूते-'नासौ स्वामिना व्यापादयितव्यः। किंत्वस्माभिरेव
तथा कर्तव्यं यथाऽसौ स्वदेहदानमङ्गीकरोति ।' सिंहस्तच्छ्रुत्वा
तूष्णीं स्थितः । ततोऽसौ लब्धावकाशः कूटं कृत्वा सर्वानादाय
सिंहान्तिकं गतः । अथ काकेनोक्तम्-'देव ! यत्नादप्याहारो न
प्राप्तः । अनेकोपवासखिन्नः स्वामी । तदिदानीं मदीयमांसमुप-
भुज्यताम् ।
काग बोला-'स्वामीको इसे नहीं मारना चाहिये, परन्तु हमही ऐसा करेंगे कि
जिसमें वह अपनी देहका दान देना अंगीकार कर लें । यह सुन कर सिंह चुप
हो गया । फिर यह मौका पा कर छल करके सबको साथ ले सिंहके पास गया;
फिर कागने कहा-'महाराज ! बड़े यत्नसे भी भोजन नहीं मिला, कई दिनोंसे
नहीं खानेके कारण स्वामी दुखी हो रहे हैं, इससे अब मेरे मांसको भोजन करें,
यतः,-
स्वामिमूला भवन्त्येव सर्वाः प्रकृतयः खलु ।
समूलेष्वपि वृक्षेषु प्रयत्नः सफलो नृणाम्' ॥ ५८ ॥
क्योंकि-स्वामी ही सब प्रजाका सचमुच मूल कारण है, और मनुष्योंका
मूल अर्थात् जड़युक्त वृक्षोंके होनेसे उपाय सफल होता है अर्थात् फल मिलता
है; अर्थात् जीवें तो ही हमारा जीवन सफल है' ॥ ५८ ॥

-५९ ] कार्यसाधनमें युक्ति की प्रशंसा २४१
सिंहेनोक्तम्-‘वरं प्राणपरित्यागः । न पुनरीदृशि कर्मणि
प्रवृत्तिः ।’ जम्बुकेनापि तथोक्तम् । ततः सिंहेनोक्तम्-‘मैवम् ।’
अथ व्याघ्रेणोक्तम्-‘मद्देहेन जीवतु स्वामी’ । सिंहेनोक्तम्-‘न
कदाचिदेवमुचितम् ।’ अथ चित्रकर्णोऽपि जातविश्वासस्तथैवा-
त्मानमाह । ततस्तद्वचनात्तेन व्याघ्रेणासौ कुक्षिं विदार्य व्यापा-
दितः सर्वैर्भक्षितः । अतोऽहं ब्रवीमि-“मतिर्दोलायते सत्यम्”
इत्यादि । ततस्तृतीयधूर्तवचनं श्रुत्वा स्वमतिभ्रमं निश्चित्य छागं
त्यक्त्वा ब्राह्मणः स्नात्वा गृहं ययौ । स छागस्तैर्धूर्तैर्नीत्वा भक्षितः ।
अतोऽहं ब्रवीमि-“आत्मौपम्येन यो वेत्ति” इत्यादि ॥’ राजाह-
‘मेघवर्ण ! कथं शत्रुमध्ये त्वया चिरमुषितम् ? कथं वा तेषामनुनयः
कृतः ?’ मेघवर्ण उवाच-‘देव ! स्वामिकार्यार्थिना स्वप्रयोजन-
वशाद्वा किं न क्रियते ? ।
सिंहने कहा-‘मरना अच्छा है, पर ऐसे काममें मन चलाना अच्छा नहीं ।’
सियारने भी यही कहा। फिर सिंहने कहा-‘ऐसा कभी नहीं ।’ फिर बाघने कहा-
‘मेरे शरीरसे स्वामी प्राण-रक्षण करें।’ सिंहने कहा कि-‘यह भी कभी
उचित नहीं है ।’ पीछे चित्रकर्णने भी विश्वासके मारे वैसे ही अपनेको दान देनेके
लिये कहा । फिर उसके कहने पर उस बाघने कोखको फाड़कर उसे मार डाला
और सबने खा लिया । इसलिये मैं कहता हूँ कि “बुद्धि सचमुच चलायमान हो
जाती है” इत्यादि । फिर तीसरे धूर्तकी बात सुन कर अपनी बुद्धिकाही भ्रम
समझ कर बकरेको छोड़ कर ब्राह्मण नहा कर घर चला गया । उन धूर्तोंने उस
बकरेको ले जा कर खा लिया । इसलिये मैं कहता हूं-“जो अपने समान
( दूसरोंको ) जानता है” इत्यादि ।’ राजा बोला-‘हे मेघवर्ण ! शत्रुओंके बीचमें
इतने दिन तक तू कैसे रहा ? अथवा कैसे उन्होंकी विनती की ?’ मेघवर्णने
कहा-‘महाराज ! स्वामीके काम चाहने वालेको, अथवा अपने प्रयोजनके लिये
क्या नहीं करना पड़ता है ?
पश्य,—
लोको वहति किं राजन् ! न मूर्ध्ना दग्धुमिन्धनम् ? ।
क्षालयन्नपि वृक्षाङ्घ्रिं नदीवेगो निकृन्तति ॥ ५९ ॥
देखो—मनुष्य, जलानेके लिये ईंधनको क्या सिर पर नहीं उठाते हैं ? और
नदीका वेग वृक्षके चरण अर्थात् जड़को धोता हुआ भी उखाड़ देता है ॥५९॥
हि० १६

राजा बोला—'यह कथा कैसी है ?' मेघवर्ण कहने लगा।—

२४२ हितोपदेशः [ संधिः ६०-
तथा चोक्तम्,—
स्कन्धेनापि वहेच्छत्रून् कार्यमासाद्य बुद्धिमान् ।
यथा वृद्धेन सर्पेण मण्डूका विनिपातिताः' ॥ ६० ॥
जैसा कहा भी है-चतुर मनुष्यकों अपना काम निकालनेके लिये शत्रुओंको
कंधे पर बैठा लेना चाहिये। जैसे वृद्ध सर्पने मेंडूकोंको मार डाला' ॥ ६० ॥
राजाह—'कथमेतत् ?' । मेघवर्णः कथयति—
राजा बोला—'यह कथा कैसी है ?' मेघवर्ण कहने लगा।—
कथा १२
[ भूखा साँप और मेंडकों की कहानी १२ ]
'अस्ति जीर्णोद्याने मन्दविषो नाम सर्पः। सोऽतिजीर्णतया-
ऽऽहारमप्यन्वेष्टुमक्षमः सरस्तीरे पतित्वा स्थितः। ततो दूरादेव
केनचिन्मण्डूकेन दृष्टः, पृष्टश्च—'किमिति त्वमाहारं नान्वि-
ष्यसि ?' । सर्पोऽवदत्—'गच्छ भद्र ! मम मन्दभाग्यस्य प्रश्नेन
किम् ?' । ततः संजातकौतुकः स च भेकः सर्वथा कथ्यताम्'
इत्याह । सर्पोऽप्याह—'भद्र ! ब्रह्मपुरवासिनः श्रोत्रियस्य कौण्डि-
न्यस्य पुत्रो विंशतिवर्षीयः सर्वगुणसंपन्नो दुर्दैवान्मम नृशंस-
स्वभावाद्दष्टः । तं पुत्रं सुशीलनामानं मृतमालोक्य मूर्च्छितः
कौण्डिन्यः पृथिव्यां लुलोठ । अनन्तरं ब्रह्मपुरवासिनः सर्वे
बान्धवास्तत्रागत्योपविष्टाः ।
एक पुराने उपवनमें मंदविष नाम सर्प रहता था। वह अधिक बूढ़ा होनेसे
आहार भी ढूँढ़नेके लिये असमर्थ हुआ सरोवरके किनारे पर लटक कर बैठा था।
फिर दूसरे किसी मेंढ़कने देखा, और पूछा—'क्या बात है जो तुम भोजनको नहीं
ढूँढ़ते हो ?' सर्पने कहा—'मित्र ! जाओ, मुझ भाग्यहीनका क्या पूछना है ?'
फिर आश्चर्ययुक्त हो कर उस मेंढ़कने यह कहा कि 'अवश्य ही कहो।' सर्पने कहा-
'मित्र ! ब्रह्मपुरके निवासी कौंडिन्य नामक वेदपाठीके सब गुणोंसे युक्त बीस
[L27: बरसके पुत्रको दुर्भाग्य और दुष्ट स्वभावसे मैंने डस लिया। तब उस सुशील
नाम पुत्रको मरा हुआ देख कर कौंडिन्य पछाड़ खा कर धरतीपर गिर पड़ा !
पीछे सब ब्रह्मपुरवासी बान्धव वहाँ आ कर बैठे ।

-६५] स्नातकका कौण्डिन्यको उपदेश २४३
तथा चोक्तम्, —
उत्सवे व्यसने युद्धे दुर्भिक्षे राष्ट्रविप्लवे ।
राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः' ॥ ६१ ॥
जैसा कहा है—विवाह आदि उत्सवमें, दुःखमें, संग्राममें, अकालमें, राज्यके
पालटेमें, राजद्वारमें और श्मशानमें जो साथ रहता है वह सच्चा बान्धव है' ॥
तत्र कपिलो नाम स्नातकोऽवदत्—'अरे कौण्डिन्य ! मूढोऽसि,
तेनैव विलपसि ।
वहाँ एक कपिल नाम भिक्षुने कहा-'अरे कौंडिन्य ! तुम मूर्ख हो, इसीसे
विलाप करते हो ।
शृणु,—
क्रोडीकरोति प्रथमं यथा जातमनित्यता ।
धात्रीव जननी पश्चात्तथा शोकस्य कः क्रमः ? ॥ ६२ ॥
सुनो—जैसे पहले प्राणीके उत्पन्न होते ही, अनित्यता (नश्वरता) ग्रहण
करती है, वैसे ही पीछे धायके समान माता गोदमें खिलाती है, इसलिये इसमें
शोककी कौनसी बात है ? ॥ ६२ ॥
क्व गताः पृथिवीपालाः ससैन्यबलवाहनाः ? ।
वियोगसाक्षिणी येषां भूमिरद्यापि तिष्ठति ॥ ६३ ॥
सेनाके चतुरंग बल तथा हाथी, घोड़े इत्यादिसे युक्त राजा कहाँ गये ?
जिन्होंनेके वियोगकी साक्षी देने वाली पृथ्वी आज तक वर्तमान है ॥ ६३ ॥
अपरं च,—
कायः संनिहितापायः संपदः पदमापदाम् ।
समागमाः सापगमाः सर्वमुत्पादि भङ्गुरम् ॥ ६४ ॥
और दूसरे-शरीरके संग नाश है, संपत्तियाँ विपत्तियोंका स्थान हैं, समागमके
साथ वियोग है, और सब उत्पन्न होने वाली वस्तु नाश होने वाली हैं ॥ ६४ ॥
प्रतिक्षणमयं कायः क्षीयमाणो न लक्ष्यते ।
आमकुम्भ इवाम्भःस्थो विशीर्णः सन् विभाव्यते ॥ ६५ ॥
यह शरीर क्षणक्षणमें घटता हुआ भी नहीं दीखता है, जैसा जलके भीतर
धरा हुआ कच्चा घड़ा जलसे खाली हो जाता है तब जाना जाता है ॥ ६५ ॥

२४४ हितोपदेशः [ संधिः ६६-
आसन्नततरतामेति मृत्युर्जन्तोर्दिने दिने ।
आघातं नीयमानस्य वध्यस्येव पदे पदे ॥ ६६ ॥
मारनेके लिये वधस्थानमें ले गये हुए वध्य पुरुषके समान मृत्यु प्राणियोंके
दिन पर दिन पास चली जाती है ॥ ६६ ॥
अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं द्रव्यसंचयः ।
ऐश्वर्यं प्रियसंवासो मुह्येत्तत्र न पण्डितः ॥ ६७ ॥
यौवन, रूप, जीवन, द्रव्यका संचय, ऐश्वर्य तथा स्त्रीपुत्रादि प्यारोंसे बोल-
चाल, रहना सहना, ये सब अनित्य हैं; इस लिए बुद्धिमानको चाहिये कि वह
इनसे मोह न करें ॥ ६७ ॥
यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयातां महोदधौ ।
समेत्य च व्यपेयातां तद्वद्भूतसमागमः ॥ ६८ ॥
जैसे समुद्रमें दो काष्ठके लट्ठे अपने आप बहते हुए चले जाते हैं और मिल कर
फिर अलग हो जाते हैं इसी तरह (संसारमें) प्राणियोंका स्त्री, पुत्र, मित्रादि
परिवारके साथ मिलना या जुदा होना होता है ॥ ६८ ॥
यथा हि पथिकः कश्चिच्छायामाश्रित्य तिष्ठति ।
विश्रम्य च पुनर्गच्छेत्तद्वद्भूतसमागमः ॥ ६९ ॥
जैसे कोई मुसाफिर मार्गमें छायाका आसरा ले कर बैठ जाता है और आराम
ले कर फिर चला जाता है वैसा ही (इस दुनियामें स्त्री, पुत्र और मित्र वगैरह)
प्राणियोंका समागम है ॥ ६९ ॥
अन्यच्च,—
पञ्चभिर्निर्मिते देहे पञ्चत्वं च पुनर्गते ।
स्वां स्वां योनिमनुप्राप्ते तत्र का परिदेवना ? ॥ ७० ॥
और दूसरे-पृथ्वी, जल, तेज, वायु, और आकाश इन पाँच तत्त्वोंसे देह बनी
है, फिर अपनी अपनी योनिमें अर्थात् पाँच तत्त्व पाँच तत्त्वोंमें मिल जाने पर
उसमें क्या पछतावा है ? ॥ ७० ॥
यावन्तः कुरुते जन्तुः संबन्धान्मनसः प्रियान् ।
तावन्तोऽपि निखन्यन्ते हृदये शोकशाङ्कवः ॥ ७१ ॥
प्राणी जितना मनको अच्छे लगने वाले संबन्धोंको अर्थात् स्नेहकी गाँठोंको
मजबूत करता है, उतनी ही हृदयमें शोककी कुठारें लगती हैं ॥ ७१ ॥

-७७] संबंध और संबंधियोंकी समस्या २४५
नायमत्यन्तसंवासो लभ्यते येन केनचित् ।
अपि स्वेन शरीरेण किमुतान्येन केनचित् ॥ ७२ ॥
किसी प्राणीको अपने शरीरका भी ऐसा बहुत काल तक साथ नहीं मिलता
है, फिर दूसरों ( पुत्रादिकों ) से क्या आशा है ? ॥ ७२ ॥
अपि च,—
संयोगो हि वियोगस्य संसूचयति संभवम् ।
अनतिक्रमणीयस्य जन्ममृत्योरिवागमम् ॥ ७३ ॥
और भी—जैसे जन्म अवश्य होने वाली मृत्युके आगमनको सूचना करता है
वैसे ही संयोग अवश्य होने वाले वियोगको सूचना करता है ॥ ७३ ॥
आपातरमणीयानां संयोगानां प्रियैः सह ।
अपथ्यानामिवान्नानां परिणामोऽतिदारुणः ॥ ७४ ॥
और अपथ्य अर्थात् हित नहीं करने वाली भक्ष्य वस्तुओंके समान क्षण-
भर सुन्दर लगने वाले स्त्री-पुत्रादि प्रिय-जनोंके साथ मिलनेका अन्त बड़ा
कष्टदायक होता है ॥ ७४ ॥
अपरं च,—
व्रजन्ति न निवर्तन्ते स्रोतांसि सरितां यथा ।
आयुरादाय मर्त्यानां तथा रात्र्यहनी सदा ॥ ७५ ॥
और भी, जैसे नदीके जलप्रवाह जाते हैं और फिर नहीं लौटते हैं, वैसे ही
रात और दिन प्राणियोंकी आयुको ले कर प्रतिक्षणको चले जाते हैं और
लौटते नहीं हैं ॥ ७५ ॥
सुखास्वादपरो यस्तु संसारे सत्समागमः ।
स वियोगावसानत्वादुःखानां धुरि युज्यते ॥ ७६ ॥
संसारमें सज्जनोंका संग अत्यन्त सुख देने वाला है, परन्तु उस संयोगके
अंतमें वियोग होनेसे वह सुख-दुःखोंके आगे जोड़ा बन जाता है, अर्थात्
अन्तमें दुःख देने वाला होता है ॥ ७६ ॥
अत एव हि नेच्छन्ति साधवः सत्समागमम् ।
यद्वियोगासिलूनस्य मनसो नास्ति भेषजम् ॥ ७७ ॥
इसीसे विवेकी जन अच्छे लोगोंके समागमको नहीं चाहते हैं कि जिसके
वियोगरूपी तलवारसे कटे हुए मनकी औषध नहीं है ॥ ७७ ॥

२४६ हितोपदेशः [संधिः ७८-

सुकृतान्यपि कर्माणि राजभिः सगरादिभिः ।
अथ तान्येव कर्माणि ते चाऽपि प्रलयं गताः ॥ ७८ ॥
सगर आदि राजाओंने अच्छे अच्छे कर्म यज्ञ वगैरह किये, फिर वे कर्म
और वे राजा भी नाश हो गये ॥ ७८ ॥
संचिन्त्य संचिन्त्य तमुग्रदण्डं
मृत्युं मनुष्यस्य विचक्षणस्य ।
वर्षाम्बुसिक्ता इव चर्मबन्धाः
सर्वे प्रयत्नः शिथिलीभवन्ति ॥ ७९ ॥
बड़े दंड करने वाली मृत्युको बार बार सोच कर बुद्धिमान् मनुष्यके भी सब
उपाय, बरसातमें भीगे हुए चमड़ेकी गाँठोंके समान ढीले पड़ जाते हैं ॥ ७९ ॥
यामेव रात्रिं प्रथमामुपैति
गर्भे निवासी नरवीरलोकः ।
ततः प्रभृत्यस्खलितप्रयाणः
स प्रत्यहं मृत्युसमीपमेति ॥ ८० ॥
वीर पुरुष जिस पहली रातको गर्भमें आता है उसी दिनसे निरंतर गतिसे
वह नित्य मृत्युके पास सरकता जाता है ॥ ८० ॥
अतः संसारं विचारय । शोकोऽयमज्ञानस्य प्रपञ्चः ।
इसलिये संसारको विचारो । यह शोक अज्ञानका पाखंड है ।
पश्य,—
अज्ञानं कारणं न स्याद्वियोगो यदि कारणम् ।
शोको दिनेषु गच्छत्सु वर्धतामपयाति किम् ? ॥ ८१ ॥
देखो,-जो वियोगही दुःखका कारण होता और अज्ञान कारण नहीं होता,
तो प्रतिदिन शोक बढ़ना चाहिये था, फिर भला घटता क्यों जाता है ?
इसलिये अज्ञान ही शोकका मूल कारण है ॥ ८१ ॥
तदत्रात्मानमनुसंधेहि । शोकचर्चां परिहर ।
इसलिये इसमें आत्माको स्थिर करो, शोककी चर्चाको दूर करो;
यतः,—
अकाण्डपातजातानां गात्राणां मर्मभेदिनाम् ।
गाढशोकप्रहाराणामचिन्तैव महौषधिः' ॥ ८२ ॥

-८५ ] संयम और सदाचरणकी प्रशंसा २४७
क्योंकि-कुसमयमें गिरनेसे उत्पन्न हुए, शरीरके मर्मस्थानको विदारण
करने वाले कठोर शोकके प्रहारोंकी चिंता नहीं करना ही बड़ी औषधि है ॥८२॥
ततस्तद्वचनं निशम्य प्रबुद्ध इव कौण्डिन्य उत्थायाब्रवीत्—'तद-
लमिदानीं गृहनरकवासेन । वनमेव गच्छामि ।'
फिर उसका वचन सुन कर जागे हुएके समान उठके कौंडिन्य बोला-'अब
नरकके समान घरका रहना ठीक नहीं है, वनकोही जाता हूँ ।
कपिलः पुनराह—
'वनेऽपि दोषाः प्रभवन्ति रागिणां
गृहेऽपि पञ्चेन्द्रियनिग्रहस्तपः ।
अकुत्सिते कर्मणि यः प्रवर्तते
निवृत्तरागस्य गृहं तपोवनम् ॥ ८३ ॥
कपिल फिर बोला-'प्रेमियोंको अर्थात् संसारके झगड़ोंमें फँसे हुओंको वनमें
भी दोष अर्थात् काम, क्रोध, लोभ, और मोहादिक होते हैं; घरमें भी पाँचों
इन्द्रियोंका रोकना तपके समान है । और जो अच्छे काममें प्रवृत्त होता है और
विषयादि रागोंको छोड़ देता है उसका घर ही तपोवन है ॥ ८३ ॥
यतः,—
दुःखितोऽपि चरेद्धर्मं यत्र कुत्राश्रमे रतः ।
समः सर्वेषु भूतेषु न लिङ्गं धर्मकारणम् ॥ ८४ ॥
क्योंकि-किसी आश्रममें अनुरक्त हो, दुःखी हो कर भी धर्मका आचरण
करे और सब प्राणियोंमें समान स्नेह रक्खे; केवल सिर मुंडा कर गेरुए कपड़े
आदि धारण वगैरह चिन्हही धर्मका कारण नहीं है ॥ ८४ ॥
उक्तं च,—
वृत्त्यर्थं भोजनं येषां संतानार्थं च मैथुनम् ।
वाक् सत्यवचनार्थाय दुर्गाण्यपि तरन्ति ते ॥ ८५ ॥
औरभी कहा है-जिन मनुष्योंका केवल 'आजीविकाके लियेही भोजन
है, संतान उत्पन्न करनेके लियेही मैथुन है और सत्य वचन बोलनेके लियेही
बाणी है वे कठिन स्थानोंसेभी पार हो जाते हैं ॥ ८५ ॥

२४८ हितोपदेशः [ संधिः ८६-
तथा हि,—
आत्मा नदी संयमपुण्यतीर्था
सत्योदका शीलतटा दयोर्मिः ।
तत्राभिषेकं कुरु पाण्डुपुत्र !
न वारिणा शुध्यति चान्तरात्मा ॥ ८६ ॥
जैसा कहा है कि-हे युधिष्ठिर ! इन्द्रियोंका संयमन (रोकना) ही जिसका
पुण्यतीर्थ है, सत्यही जिसका जल है, शील जिसका किनारा है और दयाही जिसमें
लहरियोंकी माला है, ऐसी आत्मारूपी नदीमें स्नान कर, क्योंकि केवल पानीसे
( स्नान करनेसे ) ही अंदरकी आत्मा शुद्ध नहीं हो सकती है ॥ ८६ ॥
विशेषतश्च,—
जन्ममृत्युजराव्याधिवेदनाभिरुपद्रुतम् ।
संसारमिममुत्पन्नमसारं त्यजतः सुखम् ॥ ८७ ॥
और विशेष करके—जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा, रोग और शोक इनसे भरे हुए
अत्यन्त असार इस संसारको छोड़ देने वाले मनुष्यको सुख है ॥ ८७ ॥
यतः,—
दुःखमेवास्ति न सुखं यस्माद्यदुपलक्ष्यते ।
दुःखार्तस्य प्रतीकारे सुखसंज्ञा विधीयते' ॥ ८८ ॥
क्योंकि-इस संसारमें दुःखही दुःख है सुख नहीं है कि जिस दुःखसे जो
कुछ सुखकाभी अनुभव होता है, पर दुःखसे पीड़ित मनुष्यके दुःख दूर होने
परसे वह दुःखही सुख कहाता है' ॥ ८८ ॥
कौण्डिन्यो ब्रूते—‘एवमेव ।' ततोऽहं तेन शोकाकुलेन ब्राह्मणेन
शप्तः—'यदद्यारभ्य मण्डूकानां वाहनं भविष्यसि' इति । कपिलो
ब्रूते—‘संप्रत्युपदेशासहिष्णुर्भवान् । शोकाविष्टं ते हृदयम् ।
‘कौंडिन्य बोला कि-'ऐसेही है ॥' तब उस शोकसे व्याकुल ब्राह्मणने मुझे
शाप दिया--'आजसे लेकर तू मेंडकोंका वाहन होगा । 'कपिल बोला-‘तुम अभी
उपदेशको नहीं सुन सकते हो । तुम्हारा चित्त शोकमें डूबा हुआ है।
तथापि कार्यं शृणु,—
तोभी जो करना चाहिये सो सुनो ॥

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी में लिप्यंतरण है:

-९० ] भूखे सांपके मीठे शब्दोंसे सब मेंढ़कोंका नाश २४९
सङ्गः सर्वात्मना त्याज्यः स चेत्त्यक्तुं न शक्यते ।
स सद्भिः सह कर्तव्यः सतां सङ्गो हि भेषजम्' ॥ ८९ ॥
संग तो सर्वथा त्यागनाही चाहिये और जो वह नहीं छोड़ा जाय तो सज्जनोंके
साथ संग करना चाहिये, क्योंकि साधुओंका संग सचमुचही औषधि है ॥ ८९ ॥
अन्यच्च,—
कामः सर्वात्मना हेयः स चेद्धाातुं न शक्यते ।
स्वभार्यां प्रति कर्तव्यः सैव तस्य हि भेषजम्' ॥ ९० ॥
और दूसरे-रतिकी इच्छाभी सर्वथा छोड़ देनी चाहिये, और जो वह नहीं
छूट सके तो अपनी स्त्रीके साथही करनी चाहिये, क्योंकि वही सचमुच उसकी
औषधि है' ॥ ९० ॥
एतच्छ्रुत्वा स कौण्डिन्यः कपिलोपदेशामृतप्रशान्तशोकानलो
यथाविधि दण्डग्रहणं कृतवान् । अतो ब्राह्मणशापान्मण्डूकान्
वोढुमत्र तिष्ठामि; अनन्तरं तेन मण्डूकेन गत्वा मण्डूकनाथस्य
जालपादनाम्नोऽग्रे तत्कथितम् । ततोऽसावागत्य मण्डूकनाथस्त-
स्य सर्पस्य पृष्ठमारूढवान् । स च सर्पस्तं पृष्ठे कृत्वा चित्र क्रमं
बभ्राम । परेद्युश्चलितुमसमर्थं तं मण्डूकनाथोऽवदत्—'किमद्य
भवान्मन्दगतिः ?' । सर्पो ब्रूते—'देव ! आहारविरहादसमर्थो-
ऽस्मि ।' मण्डूकनाथोऽवदत्—'अस्मदाज्ञया मण्डूकान् भक्षय ।'
ततः 'गृहीतोऽयं महाप्रसादः' इत्युक्त्वा क्रमश्रो मण्डूकान्
खादितवान् । अतो निर्मण्डूकं सरो विलोक्य मण्डूकनाथोऽपि
तेन खादितः । अतोऽहं ब्रवीमि—"स्कन्धेनापि वहेच्छत्रून्"
इत्यादि ॥ देव ! यात्विदानीं पुरावृत्ताख्यानकथनम् । सर्वथा
संधेयोऽयं हिरण्यगर्भो राजा संधीयतामिति मे मतिः ।' राजो-
वाच—'कोऽयं भवतो विचारः ? यतो जितस्तावदयमस्माभिस्ततो
यद्यस्मत्सेवया वसति तदास्ताम्; नो चेन्निगृह्यताम् ।'
यह सुन कर उस कौण्डिन्यने कपिलके उपदेशरूपी अमृतसे शोकरूपी अग्निको
शांत कर विधिपूर्वक दंड ग्रहण कर लिया । इसलिये ब्राह्मणके शापसे मेंढ़कोंको
चढ़ा कर ले जानेके लिये यहां बैठा हूं । पीछे उस मेंढ़कने जा कर जालपाद नाम
मेंढ़कोंके राजाके सामने वह वृत्तान्त कहा, फिर वह मेंढ़कोंका राजाभी आ कर

[Page Header: २५० हितोपदेशः [ संधिः ९१-]

उस साँपकी पीठ पर चढ़ लिया । और वह सर्प उसे अपने पीठ पर बैठा कर
विचित्र विचित्र चालोंसे फिरने लगा । दूसरे दिन चलनेके लिये असमर्थ सर्पसे
मेंढकोंके राजाने कहा-‘आज तुम धीरे धीरे क्यों रेंगते हो ? सर्पने कहा-‘महा-
राज ! खानेको नहीं मिलनेसे असमर्थ हूं.’ मेंढकोंके स्वामीने कहा-‘हमारी आज्ञासे
मेंढकोंको खा लो ।’ फिर “यह महाप्रसाद मैंने ग्रहण किया” यह कह कर वह
क्रम क्रमसे मेंढकोंको खाने लगा । फिर मेंढकोंसे खाली सरोवरको देख कर मेंढ़-
कोंके राजाकोभी खा लिया. इसलिये मैं कहता हूं, “शत्रुओंको भी कंधे पर चढ़ावे”
इत्यादि. हे महाराज ! अब पहले वृत्तान्तके कहनेको रहने दीजिए. सब प्रकारसे
यह हिरण्यगर्भ राजा सन्धि करने योग्य है, इसलिए मेरी समझमें तो सन्धि
कर लीजिये.’ राजाने कहा-‘यह तुम्हारा कैसा विचार है ? क्योंकि इसको तो
हम जीत चुके हैं, फिर जो वह हमारी सेवाके लिये रहे तो भलेही रहे, नहीं
तो युद्ध किया जाय.
अत्रान्तरे जम्बूद्वीपादागत्य शुकेनोक्तम्—‘देव ! सिंहलद्वीपस्य
सारसो राजा संप्रति जम्बूद्वीपमाक्रम्यावतिष्ठते ।’ राजा ससं-
भ्रमं ब्रूते—‘किं किम् ?’ । शुकः पूर्वोक्तं कथयति । गृध्रः स्वगतमु-
वाच—‘साधु रे चक्रवाक मन्त्रिन् सर्वज्ञ ! साधु ।’ राजा सको-
पमाह—‘आस्तां तावदयम् । गत्वा तमेव समूलमुन्मूलयामि ।’
इसी अवसर बीच जम्बूद्वीपसे आ कर तोतेने कहा—‘महाराज ! सिंहल-
द्वीपका सारस राजा अब जम्बूद्वीपको घेरे हुये डटा हुआ है।’ राजा घबरा कर
बोला-‘क्या क्या ?’ तोतेने पहिली बात दोहरा कर कही । गिद्धने अपने मनमें
सोचा कि ‘धन्य है ! अरे चकवे मंत्री सर्वज्ञ ! तुझे धन्य है, धन्य है !’ राजा
झुंझला कर बोला-‘इसे तो रहने दो । मैं जा कर उसीको जड़से नाश करूंगा.’
दूरदर्शी विहस्याह—
‘न शरन्मेघवत् कार्यं वृथैव घनगर्जितम् ।
परस्यार्थमनर्थं वा प्रकाशयति नो महान् ॥ ९१ ॥
दूरदर्शी हँस कर बोला-‘शरदृतुके मेघके समान वृथा गंभीर गर्जना नहीं
चाहिये, बड़े पुरुष शत्रुके अर्थको अथवा अनर्थको प्रकट नहीं करते हैं ॥ ९१ ॥

  • ९३ ] अविचारी कृत्यसे अनुताप होना २५१
    अपरं च,—
    एकदा न विगृह्णीयाद्बहून् राजाभिघातिनः ।
    सदर्पोऽप्युरगः कीटैर्बहुभिर्नाश्यते ध्रुवम् ॥ ९२ ॥
    और दूसरे-राजा एकही समय पर बहुतसे शत्रुओंसे नहीं लड़े; क्योंकि,
    अहंकारी सर्पकोभी निश्चय करके बहुतसी (क्षुद्र) चीटियां मार डालती हैं ॥९२॥
    देव ! किमिति विना संधानं गमनमस्ति ? यतस्तदास्तत्पश्चात्प्र-
    कोपोऽनेन कर्तव्यः ।
    हे महाराज ! बिना मेल किये कैसे जाते हो ? क्योंकि फिर हमारे जानेके
    बाद यह बड़ा कोप करेगा.
    अपरं च,—
    योऽर्थतत्त्वमविज्ञाय क्रोधस्यैव वशं गतः ।
    स तथा तप्यते मूढो ब्राह्मणो नकुलाद्यथा' ॥ ९३ ॥
    और दूसरे-जो मूर्ख मनुष्य बातके भेदको न जान कर केवल क्रोधकेही
    वश हो जाता है वह वैसाही दुःख पाता है जैसा नेवलेसे ब्राह्मण दुःखी
    हुआ' ॥ ९३ ॥
    राजाह—'कथमेतत् ?' । दूरदर्शी कथयति—
    राजा बोला-‘यह कथा कैसी है ? दूरदर्शी कहने लगा ।—
    कथा १३
    [ माधव ब्राह्मण, उसका बालक, नेवला और साँपकी
    कहानी १३ ]
    ‘अस्त्युज्जयिन्यां माधवो नाम विप्रः । तस्य ब्राह्मणी प्रसूत-
    बालापत्यस्य रक्षार्थं ब्राह्मणमवस्थाप्य स्नातुं गता । अथ ब्राह्म-
    णाय राज्ञः पार्वणश्राद्धं दातुमाह्वानमागतम् । तच्छ्रुत्वा ब्राह्मणः
    सहजदारिद्र्यादचिन्तयत्—'यदि सत्वरं न गच्छामि तदाऽन्यः
    कश्चिच्छ्रुत्वा श्राद्धं ग्रहीष्यति ।
    ‘उज्जयिनी नगरीमें माधव नाम ब्राह्मण रहता था । उसकी ब्राह्मणीके एक
    बालक हुआ । वह उस बालककी रक्षाके लिये ब्राह्मणको बैठा कर नहानेके लिये