हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
Hitopadesha (with Hindi Translation)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
कहीं अच्छे प्रकारसे किया हुआ काम भी भाग्यके वशसे बिगड़ जाता है' ॥२॥
-४ ] हितकारी वचन को मानना लाभदायक है २१५
है इसलिये यह उसीका काम दीख पड़ता है।' राजाने क्षण भर सोच कर
कहा-'यह मेरी प्रारब्ध ही फूटी है;
तथा चोक्तम्,—
अपराधः स दैवस्य न पुनर्मन्त्रिणामयम् ।
कार्यं सुचरितं कापि दैवयोगाद्विनश्यति'॥ २ ॥
जैसा कहा है—वह प्रारब्धका दोष है, मंत्रियोंका कुछ दोष नहीं है, क्योंकि
कहीं अच्छे प्रकारसे किया हुआ काम भी भाग्यके वशसे बिगड़ जाता है' ॥२॥
मन्त्री ब्रूते—'उक्तमेवैतत्,—
मंत्री बोला—ऐसा भी कहा है,—
विषमां हि दशां प्राप्य दैवं गर्हयते नरः ।
आत्मनः कर्मदोषांश्च नैव जानात्यपण्डितः ॥ ३ ॥
मूर्ख मनुष्य बुरी दशाको पा कर भाग्यकी निन्दा करता है और यह अपने
कर्मका दोष ऐसा नहीं मानता ॥ ३ ॥
अपरं च,—
सुहृदां हितकामानां यो वाक्यं नाभिनन्दति ।
स कूर्म इव दुर्बुद्धिः काष्ठाद्भ्रष्टो विनश्यति'॥ ४ ॥
और दूसरे-जो मनुष्य हितकारी मित्रोंका वचन नहीं मानता है वह मूर्ख
काठसे गिरे हुए कछुएके समान मरता है' ॥ ४ ॥
राजाह—'कथमेतत् ?' । मन्त्री कथयति—
राजा बोला-'यह कथा कैसी है ?' मंत्री कहने लगा ।—
कथा २
[ दो हंस और उनका स्नेही कछुएकी कहानी २ ]
‘अस्ति मगधदेशे फुल्लोत्पलाभिधानं सरः । तत्र चिरं संकट-
विकटनामानौ हंसौ निवसतः । तयोर्मित्रं कम्बुग्रीवनामा कूर्मश्च
प्रतिवसति । अथैकदा धीवरैरागत्य तत्रोक्तम्-‘तदत्रास्माभिर-
द्योषित्वा प्रातर्मत्स्यकूर्मादयो व्यापादयितव्याः ।' तदाकर्ण्य कूर्मो
हंसावाह—'सुहृदौ ! श्रुतोऽयं धीवरालापः; अधुना किं मया कर्त-
२१६ हितोपदेशः [ संधिः ५-
व्यम् ?।' हंसावाहतुः—'ज्ञायताम् । पुनस्तावत्प्रातर्यदुचितं तत्कर्त्त-
व्यम् ।' कूर्मो ब्रूते—'मैवम् । यतो दृष्टव्यतिकरोऽहमत्र ।
'मगध देशमें फुल्लोत्पल नाम एक सरोवर है । वहाँ बहुत कालसे संकट और
विकट नामक दो हंस रहा करते थे और उन दोनोंका मित्र एक कम्बुग्रीव नाम
कछुआ रहता था । फिर एक दिन धीवरोंने वहाँ आ कर कहा कि—आज हम
यहाँ रह कर प्रातःकाल मछली कछुआ आदि मारेंगे' यह सुन कर कछुआ हंसोंसे
कहने लगा—'मित्रो ! धीवरोंकी यह बात मैने सुनी । अब मुझे क्या करना
उचित है ? हंसोंने कहा-'समझलो । फिर प्रातःकाल जो उचित हो सो करना।'
कछुआ बोला-'ऐसा मत कहो, क्योंकि मैं यहाँ पर भय देख चुका हूं।
तथा चोक्तम्,—
अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिस्तथा ।
द्वावेतौ सुखमेधेते यद्भविष्यो विनश्यति ॥ ५ ॥
जैसा कहा है-अनागतविधाता याने आगे होने वाली बातको प्रथमही सोचने
वाला और प्रत्युत्पन्नमति अर्थात् अवसर जान कर कार्य करने वाला इन दोनोंने
आनंद भोगे हैं और यद्भविष्य मारा गया' ॥ ५ ॥
तावाहतुः—'कथमेतत् ?' । कूर्मः कथयति—
वे दोनों बोले-'यह कथा कैसे है ?' कछुआ कहने लगा ।—
कथा ३
[ दूरदर्शी दो मच्छ और यद्भविष्य मच्छकी कहानी ३ ]
'पुरास्मिन्नेव सरस्येवंविधेषु धीवरेषूपस्थितेषु मत्स्यत्रयेणालो-
चितम् । तत्रानागतविधाता नामैको मत्स्यः । तेनालोचितम्—
'अहं तावज्जलाशयान्तरं गच्छामि' इत्युक्त्वा हृदान्तरं गतः ।
अपरेण प्रत्युत्पन्नमतिनाम्ना मत्स्येनाभिहितम्—' भविष्यदर्थे प्रमा-
णाभावात् कुत्र मया गन्तव्यम् ? तदुत्पन्ने यथाकार्यं तदनुष्ठेयम् ।
'पहले इसी सरोवर पर जब ऐसे ही धीवर आये थे तब तीन मछलियोंने विचार
किया । और उनमें अनागतविधाता नाम एक मच्छ था, उसने विचार किया-'मैं
तो दूसरे सरोवरको जाता हूँ।' इस प्रकार कह कर वह दूसरे सरोवरको चला गया ।
-६] आपत्ति में शीघ्र उपाय से सफलता २१७
फिर दूसरे प्रत्युत्पन्नमति नाम मच्छने कहा- 'होने वाले काममें निश्चय न होनेसे मैं
कहाँ जाऊँ ? इसलिये काम आ पड़ने पर जैसा होगा वैसा करूंगा।
तथा चोक्तम्, —
उत्पन्नामापदं यस्तु समाधत्ते स बुद्धिमान् ।
वणिजो भार्यया जारः प्रत्यक्षे निहुतो यथा' ॥ ६ ॥
जैसा कहा है— जो उत्पन्न हुई आपत्तिका उपाय करता है वह बुद्धिमान् है,
जैसे कि बनियेकी स्त्रीने प्रत्यक्षमें जारको छुपा लिया' ॥ ६ ॥
यद्द्रविष्यः पृच्छति— 'कथमेतत् ?' । प्रत्युत्पन्नमतिः कथ-
यति—
यद्द्रविष्य पूछने लगा-'यह कथा कैसी है?' प्रत्युत्पन्नमति कहने लगा।—
कथा ४
[ एक बनिया, उसकी व्यभिचारिणी स्त्री और उसके
यारकी कहानी ४]
'पुरा विक्रमपुरे समुद्रदत्तो नाम वणिगस्ति । तस्य रत्नप्रभा
नाम गृहिणी स्वसेवकेन सह सदा रमते । अथैकदा सा रत्नप्रभा
तस्य सेवकस्य मुखे चुम्बनं ददती समुद्रदत्तेनावलोकिता । ततः
सा बन्धकी सत्वरं भर्तुः समीपं गत्वाह — 'नाथ ! एतस्य सेवकस्य
महती निर्वृतिः । यतोऽयं चौरिकां कृत्वा कर्पूरं खादतीति
मयाऽस्य मुखमाघ्राय ज्ञातम् ।' तथा चोक्तम्- "आहारो
द्विगुणः स्त्रीणाम्” इत्यादि ।' तच्छ्रुत्वा सेवकेन प्रकुप्योक्तम्—
'नाथ ! यस्य स्वामिनो गृह एतादृशी भार्या तत्र सेवकेन कथं
स्थातव्यं यत्र प्रतिक्षणं गृहिणी सेवकस्य मुखं जिघ्रति ।' ततो-
ऽसावुत्थाय चलितः साधुना यत्नात्प्रबोध्य धृतः । अतोऽहं
ब्रवीमि-“उत्पन्नामापदम्” इत्यादि ॥'
'किसी समय विक्रमपुरमें समुद्रदत्त नाम एक बनिया रहता था । उसकी
रत्नप्रभा नाम स्त्री अपने सेवकके संग सदा व्यभिचार किया करती थी। पीछे एक
दिन उस रत्नप्रभाको उस सेवकका मुखचुम्बन करते हुए समुद्रदत्तने देख
लिया । फिर वह व्यभिचारिणी शीघ्र अपने पतिके पास जा कर बोली-
२१८ हितोपदेशः [ संधिः ७-
'स्वामी ! इस सेवकको बड़ा सुख है, क्योंकि यह चोरी करके कपूर खाया
करता है, यह मैंने इसका मुख सूँघ कर जान लिया।' जैसा कहा है-'स्त्रियोंका
भोजन दूनो होता है' इत्यादि।' यह सुन कर सेवकने क्रोध कर कहा-'हे स्वामी !
जिस स्वामीकी ऐसी स्त्री है वहाँ सेवक कैसे टिक सकता है कि जहाँ क्षणक्षणमें
घरवाली सेवकका मुख सूँघती है?' फिर वह उठ कर जाने लगा, तब बनियेने
बड़ी कोशिशसे समझा कर रख उसे लिया । इसलिये मैं कहता हूँ-"आपत्तिके
उत्पन्न होने पर" आदि ।'
ततो यद्भविष्येणोक्तम्,—
'यदभावि न तद्भावि भावि चेन्न तदन्यथा ।
इति चिन्ताविषघ्नोऽयमगदः किं न पीयते ?' ॥ ७ ॥
फिर यद्भाविष्यने कहा-'जो होनहार नहीं है वह कभी नहीं होगा, और जो
होनहार है उससे उलटा कभी न होगा अर्थात् होनहार अवश्य होगा यह
चिंतारूपी विषका नाश करने वाली औषध क्यों नहीं पीते हो ?' ॥ ७ ॥
ततः प्रातर्जालेन बद्धः प्रत्युत्पन्नमतिर्मृतवदात्मानं संदर्श्य
स्थितः । ततो जालादपसारितो यथाशक्त्युत्प्लुत्य गभीरं नीरं
प्रविष्टः । यद्भाविष्यश्च धीवरैः प्राप्तो व्यापादितः । अतोऽहं
ब्रवीमि-"अनागतविधाता" इत्यादि ॥ तद्यथाहमन्यह्रदं प्राप्नोमि
तथा क्रियताम् ।' हंसावाहतुः—'जलाशयान्तरे प्राप्ते तव
कुशलम्, स्थले गच्छतस्ते को विधिः ?' कूर्म आह—'यथाऽहं
भवद्भ्यां सहाकाशवर्त्मना यामि तथा विधीयताम् ।' हंसौ
ब्रूतः—'कथमुपायः संभवति ?' । कच्छपो वदति—'युवाभ्यां
चञ्चुधृतं काष्ठखण्डमेकं मया मुखेनावलम्ब्य गन्तव्यम् । युवयोः
पक्षबलेन मयाऽपि सुखेन गन्तव्यम् ।'
फिर प्रातःकाल जालसे बँध कर प्रत्युत्पन्नमति अपनेको मरेके समान दिखला
कर बैठा रहा । फिर जालसे बाहर निकाला हुआ अपनी शक्तिके अनुसार उछल
कर गहरे पानीमें घुस गया और यद्भविष्यको धीवरोंने पकड़ लिया और मार
डाला । इसलिये मैं कहता हूँ, “अनागतविधाता” इत्यादि—॥ सो जिस प्रकार
मैं दूसरे सरोवरको पहुँच जाऊँ वैसे करो।' दोनों हंस बोले-'दूसरे सरोवरके
१ सुहृद्भेदका ११९ वाँ श्लोक देखो ।
-८ ] उपायके साथ अपायका चिन्तन २१९
जानेमें तुम्हारी कुशल है । परंतु पटपड़में तुम्हारे जानेका कौनसा उपाय है ?'
कछुआ बोला- 'जिस प्रकार मैं तुम्हारे साथ आकाशमार्गसे जाऊँ वैसा करो ।'
हंसोंने कहा-'उपाय कैसे हो सकता है ?' कछुयेने कहा- 'तुम दोनों एक
काठके टुकड़ेको चोंचसे पकड़ लो और मैं मुखसे पकड़ कर चलूंगा और तुम्हारे
पंखोंके बलसे मैं सुखसे पहुँच भी जाऊँगा ।'
हंसौ ब्रूतः- 'संभवत्येष उपायः; किंतु,-
हंस बोले-'यह उपाय तो हो सकता है; परंतु,-
उपायं चिन्तयन् प्राज्ञो ह्यपायमपि चिन्तयेत् ।
पश्यतो बकमूर्खस्य नकुलैर्भक्षिताः प्रजाः' ॥ ८ ॥
पण्डितको उपाय सोचना चाहिये साथ साथ और विपत्तिका भी विचार
करना चाहिये । जैसे मूर्ख बगुलेके देखते देखते नेवले सब बच्चे खा गये' ॥ ८ ॥
कूर्मः पृच्छति-'कथमेतत् ?' । तौ कथयतः-
कछुआ पूछने लगा-'यह कथा कैसी है ?' वे दोनों कहने लगे ।-
कथा ५
[ बगुले, साँप और नेवलेकी कहानी ५ ]
'अस्त्युत्तरापथे गृध्रकूटनाम्नि पर्वते महान्पिप्पलवृक्षः । तत्रा-
नैकबका निवसन्ति । तस्य वृक्षस्याधस्ताद्विवरे सर्पो बालाप-
त्यानि खादति । अथ शोकार्तानां बकानां विलापं श्रुत्वा केनचि-
द्वृद्धेनाभिहितम्- 'एवं कुरुत । यूयं मत्स्यानुपादाय नकुलवि-
वरादारभ्य सर्पविवरं यावत्पङ्किक्रमेण विकिरत । ततस्तदाहार-
लुब्धैर्नकुलैरागत्य सर्पो द्रष्टव्यः स्वभावद्वेषाद्व्यापादयितव्यश्च ।'
तथानुष्ठिते तद्वृत्तम् । ततस्तत्र वृक्षे नकुलैर्बकशावकरावः श्रुतः ।
पश्चात्तैर्वृक्षमारुह्य बकशावकाः खादिताः । अत आवां ब्रूवः-
“उपायं चिन्तयन्” इत्यादि ॥ आवाभ्यां नीयमानं त्वामवलोक्य
लोकैः किंचिद्वक्तव्यमेव । तदाकर्ण्य यदि त्वमुत्तरं दास्यसि तदा
त्वन्मरणम् । तत्सर्वथाऽत्रैव स्थीयताम् ।' कूर्मो वदति-'किमहम-
प्राज्ञः ? नाहमुत्तरं दास्यामि किमपि न वक्तव्यम् । तथानुष्ठिते
तथाविधं कूर्ममालोक्य सर्वे गोरक्षकाः पश्चाद्धावन्ति वदन्ति च।
२२० | हितोपदेशः | [ संधिः ८-
कश्चिद्वदति—'यद्ययं कूर्मः पतति तदाऽत्रैव पक्त्वा खादितव्यः।'
कश्चिद्वदति—'अत्रैव दग्ध्वा खादितव्योऽयम्।' कश्चिद्वदति—
'गृहं नीत्वा भक्षणीयः' इति। तद्वचनं श्रुत्वा स कूर्मः कोपाविष्टो
विस्मृतपूर्वसंस्कारः प्राह—'युष्माभिर्भस्म भक्षितव्यम्।' इति
वदन्नेव पतितस्तैर्व्यापादितश्च। अतोऽहं ब्रवीमि—"सुहृदां
हितकामानाम्" इत्यादि॥' अथ प्रणिधिर्बकस्तत्रागत्योवाच—
'देव! प्रागेव मया निगदितम्। दुर्गशोधनं हि प्रतिक्षणं कर्तव्य-
मिति। तच्च युष्माभिर्न कृतं तदनवधानस्य फलमनुभूतम्।
दुर्गदाहो मेघवर्णेन वायसेन गृध्रप्रयुक्तेन कृतः।'
'उत्तर दिशामें गृध्रकूटक नाम पर्वत पर एक बड़ा पीपलका पेड़ है। उस पर
बहुतसे बगले रहते थे। उस वृक्षके नीचे बिलमें एक साँप बगुलोंके छोटे छोटे
बच्चोंको खा लिया करता था। फिर शोकसे व्याकुल बगुलोंके विलापको सुन कर
किसी बगुलेने कहा—'ऐसा करो। तुम मछलियोंको ले कर नेवलेके बिलसे साँपके
बिले तक लगातार फैला दो। फिर उनको खानेके लोभी नेवले वहाँ आ कर साँपको
देखेंगे और अपने स्वभावके वैरसे उसे मार डालेंगे। ऐसा करने पर वैसा ही
हुआ। पीछे उस वृक्षके ऊपर नेवलोंने बगुलोंके बच्चोंका चहचहाट सुना। फिर
उन्होंने पेड़ पर चढ़ कर बगुलोंके बच्चे खा लिये। इसलिये हम दोनों कहते हैं कि
"उपायको सोचना चाहिये" इत्यादि। और हम दोनोंसे ले जाते हुए तुमको देख
कर लोग कुछ कहेंगेही। वह सुन कर जो तुम उत्तर दोगे तो तुम मरोगे। इस-
लिये चाहे जो कुछ भी हो, पर यहाँ ही रहो।' कछुआ बोला-'क्या मैं मूर्ख हूँ?
मैं उत्तर नहीं दूँगा। कुछ न बोलूँगा। और वैसा करने पर कछुएको वैसा देख
कर सब ग्वाले पीछे दौड़े और कहने लगेः कोई कहता था-जो यह कछुआ गिर
पड़े तो यहाँ ही पका कर खा लेना चाहिये। कोई कहता था—यहाँ ही इसे भून
कर खा लें। कोई कहता था कि घर ले चल कर खाना चाहिये। उन सभीका
वचन सुन कर वह कछुआ क्रोधयुक्त हो कर पहले उपदेशको भूल कर बोला—
'तुम सभीको धूल फाँकनी चाहिये।' यह कहतेही गिर पड़ा और उन्होंने मार
डाला। इसलिये मैं कहता हूँ—"हितकारी मित्रोंका" इत्यादि।' फिर दूत बगुला
वहाँ आ कर बोला-'हे महाराज! मैंने तो पहले ही जता दिया था कि गढ़का
-१० ] चित्रवर्ण की मनमोहक बातें करना २२१
संशोधन क्षणक्षणमें अवश्य करना चाहिये। और वह आपने नहीं किया इसलिये
उस भूलका फल भुगता । गिद्धके सिखाये भलाये मेघवर्ण कौएने दुर्ग जला दिया।
राजा निःश्वस्याह, —
'प्रणयादुपकाराद्वा यो विश्वसिति शत्रुषु ।
स सुप्त इव वृक्षाग्रात् पतितः प्रतिबुध्यते' ॥ ९ ॥
राजाने साँस भर कर कहा—'जो मनुष्य स्नेहसे अथवा उपकारसे शत्रुओं पर
विश्वास करता है वह सोये हुएके समान वृक्षकी फुनगीसे गिर कर जाग पड़ता है,
अर्थात् आपत्तिमें पड़ कर उसे जानता हैं' ॥ ९ ॥
प्रणिधिरुवाच— 'इतो दुर्गदाहं विधाय यदा गतो मेघवर्णस्तदा
चित्रवर्णेन प्रसादितेनोक्तम्— 'अयं मेघवर्णोऽत्र कर्पूरद्वीपराज्ये-
ऽभिषिच्यताम् ।
दूत बोला—'यहाँसे गढ़का दाह करके जब मेघवर्ण गया तब चित्रवर्णने
प्रसन्न हो कर कहा—'इस मेघवर्णको इस कर्पूरद्वीपके राज्य पर राजतिलक
कर दो ।
तथा चोक्तम्,—
कृतकृत्यस्य भृत्यस्य कृतं नैव प्रणाशयेत्।
फलेन मनसा वाचा दृष्ट्या चैनं प्रहर्षयेत्' ॥ १० ॥
जैसा कहा है— जिस सेवकने कार्य सिद्ध किया है उसके किये हुए कृत्यको
कभी निष्फल नहीं करना चाहिये; वरना पारितोषिकसे, मनसे, वचनसे और
दृष्टिसे, उसको प्रसन्न करना चाहिये' ॥ १० ॥
चक्रवाको ब्रूते —'ततस्ततः ?।' प्रणिधिरुवाच —'ततः प्रधान-
मन्त्रिणा गृध्रेणाभिहितम्— 'देव ! नेदमुचितम् । प्रसादान्तरं
किमपि क्रियताम् ।
चकवा पूछने लगा—'उसके पीछे फिर क्या हुआ ?' दूत बोला- 'पीछे प्रधान
मंत्री गिद्धने कहा— 'महाराज ! यह बात उचित नहीं है, कुछ दूसरे भी
प्रसाद कीजिये;
यतः,—
अविचारयतो युक्तिकथनं तुषखण्डनम् ।
नीचेषूपकृतं राजन् ! बालुकास्विव मुद्रितम् ॥ ११ ॥
क्योंकि—हे राजन् ! पूर्वापरको नहीं विचारने वालेको उपाय बतलाना भुसीके
पीसनेके समान बेखारथ है और नीचोंमें उपकार करना धुलिमें चिह्न करनेके
समान है, अर्थात् जैसा धुलिका चिह्न थोड़ीसी देरमें मिट जाता है वैसा नीचोंमें
किया हुआ उपकार और अविचारी पुरुषोंमें उपदेश किया हुआ नष्ट हो
जाता है ॥ ११ ॥
महतामास्पदे नीचः कदापि न कर्तव्यः ।
ऊँचे ओहदे पर नीचकी नियुक्ति कभी नहीं करनी चाहिये । जैसा कहा है—
तथा चोक्तम्,—
नीचः श्लाघ्यपदं प्राप्य स्वामिनं हन्तुमिच्छति ।
मूषिको व्याघ्रतां प्राप्य मुनिं हन्तुं गतो यथा १॥ १२ ॥
नीच अच्छे पदको पा कर स्वामीको मारना चाहता है, जैसे चूहा व्याघ्रत्वको
पा कर मुनिको मारने चला' ॥ १२ ॥
चित्रवर्णः पृच्छति—'कथमेतत् ?' । मन्त्री कथयति—
चित्रवर्ण पूछने लगा—'यह कथा कैसी है ?' मंत्री कहने लगा ।—
कथा ६
[ महातप नामक संन्यासी और एक चूहेकी कहानी ६ ]
'अस्ति गौतमस्य महर्षेस्तपोवने महातपा नाम मुनिः । तत्र
तेन मुनिना काकेन नीयमानो मूषिकशावको दृष्टः । ततः
स्वभावदयात्मना तेन मुनिना नीवारकणैः संवर्धितः । ततो
बिडालस्तं मूषिकं खादितुमुपधावति । तमवलोक्य मूषिकस्तस्य
मुनेः क्रोडे प्रविवेश । ततो मुनिनोक्तम्—'मूषिक ! त्वं मार्जारो
भव ।' ततः स बिडालः कुक्कुरं दृष्ट्वा पलायते । ततो
मुनिनोक्तम्—'कुक्कुराद्विभेषि ? । त्वमेव कुक्कुरो भव ।' स च
कुक्कुरो व्याघ्राद्विभेति । ततस्तेन मुनिना कुक्कुरो व्याघ्रः कृतः ।
१ 'नीचेषूपकृतं राजन् ! बालुकास्विव मूत्रितम्' यह भी पाठ प्रचलित है, जिसका
अर्थ—नीच पुरुषमें उपकार करना तो सचमुच धूलि(रेत)में मूतने के समान है'
- १३ ] नीच की बड़े पदपर हानिदायिता २२३
अथ तं व्याघ्रं मुनिर्मूषिकोऽयमिति पश्यति । अथ तं मुनिं
दृष्ट्वा व्याघ्रं च सर्वे वदन्ति—'अनेन मुनिना मूषिको व्याघ्रतां
नीतः।' एतच्छ्रुत्वा स व्याघ्रोऽचिन्तयत्—'यावदनेन मुनिना
स्थीयते तावदिदं मे रूपाख्यानमकीर्तिकरं न पलायिष्यते'
इत्यालोच्य मूषिकस्तं मुनिं हन्तुं गतः । ततो मुनिना तज्ज्ञात्वा
'पुनर्मूषिको भव' इत्युक्त्वा मूषिक एव कृतः । अतोऽहं
ब्रवीमि—“नीचः श्लाघ्यपदं” इत्यादि ॥
'गौतम महर्षिके तपोवनमें महातपा नाम एक मुनि था । वहाँ उस मुनिने
कौएसे लाये हुए एक चूहेके बच्चेको देखा । फिर स्वभावसे दयामय उस मुनिने
तृणके धान्यसे उसको बड़ा किया । फिर बिलाव उस चूहेको खानेको दौड़ा ।
उसे देख कर चूहा उस मुनिकी गोदमें चला गया । फिर मुनिने कहा कि-‘हे
चूहे ! तू बिलाव हो जा ।' फिर वह बिलाव कुत्तेको देख कर भागने लगा । फिर
मुनिने कहा-‘तू कुत्तेसे डरता है ? जा तू भी कुत्ता हो जा।' बाद वह कुत्ता बाघसे
डरने लगा । फिर उस मुनिने उस कुत्तेको बाघ कर दिया । वह मुनि, उस
बाघको “यह तो चूहा है” ऐसे (उसे असली स्वरूपसे) देखता था । उस मुनिको
और व्याघ्रको देख कर सब लोग कहा करते थे कि “इस मुनिने इस चूहेको
बाघ बना दिया है ।” यह सुन कर वह बाघ सोचने लगा-‘जब तक यह मुनि
जिंदा रहेगा तब तक यह मेरा अपयश करने वाले स्वरूपकी कहानी नहीं
मिटेगी ।' यह विचार कर चूहा उस मुनिको मारनेके लिये चला । फिर मुनिने
यह जान कर “फिर चूहा हो जा” यह कह कर चूहाही कर दिया । इसलिये मैं
कहता हूँ—“नीच ऊँचा पद पर” इत्यादि;
अपरं च, सुकरमिदमिति न मन्तव्यम् । शृणु,—
और दूसरे-यह बात सुलभ है ऐसा नहीं जानना चाहिये । सुनिये,—
भक्षयित्वा बहून्मत्स्यानुत्तमाधममध्यमान् ।
अतिलोभाद्वकः पश्चान्मृतः कर्कटकग्रहात्' ॥ १३ ॥
एक बगुला बहुतसे बड़े छोटे, और मध्यम मच्छोंको खा कर अधिक लोभसे
कर्कटके पकड़नेसे मारा गया' ॥ १३ ॥
चित्रवर्णः पृच्छति—'कथमेतत् ?' । मन्त्री कथयति—
चित्रवर्ण पूछने लगा—'यह कथा कैसी है ?' मंत्री कहने लगा।—