हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 257, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें-५३ ] ब्राह्मणका ठगोंसे ठगा जाना २३७
जैसा कहा है—जो मनुष्य अपने समान दुर्जनको सत्य बोलने वाला समझता
है वह मनुष्य वैसाही ठगा जाता है, जैसा बकरेके कारण धूर्त्तोंने ब्राह्मणको
ठगा लिया' ॥ ५२ ॥
राजोवाच—'कथमेतत् ?' । मेघवर्णः कथयति—
राजा बोला—'यह कथा कैसी है ? मेघवर्ण कहने लगा ।—
कथा १०
[ एक ब्राह्मण, बकरा और तीन ठगोंकी कहानी १० ]
'अस्ति गौतमस्यारण्ये प्रस्तुतयज्ञः कश्चिद्ब्राह्मणः। स च यज्ञार्थं
ग्रामान्तराच्छागमुपक्रीय स्कन्धे कृत्वा गच्छन् धूर्तत्रयेणावलो-
कितः । ततस्ते धूर्ता 'यद्येष च्छागः केनाप्युपायेन लभ्यते तदा
मतिप्रकर्षो भवति' इति समालोच्य वृक्षत्रयतले क्रोशान्तरेण तस्य
ब्राह्मणस्यागमनं प्रतीक्ष्य पथि स्थिताः । तत्रैकेन धूर्तेन गच्छन्स
ब्राह्मणोऽभिहितः—'भो ब्राह्मण ! किमिति कुक्कुरः स्कन्धेनोह्यते ?'।
विप्रेणोक्तम्—'नायं श्वा; किंतु यज्ञच्छागः।' अथानन्तरस्थितेना-
न्येन धूर्तेन तथैवोक्तम् । तदाकर्ण्य ब्राह्मणश्छागं भूमौ निधाय
मुहुर्निरीक्ष्य पुनः स्कन्धे कृत्वा दोलायमानमतिश्चलितः ।
'गौतमके वनमें किसी ब्राह्मणने यज्ञ करना आरंभ किया था। और उसको
यज्ञके लिये दूसरे गाँवसे बकरा मोल ले कर कंधे पर रख कर ले जाते हुए तीन
ठगोंने देखा । फिर उन ठगोंने "यह बकरा किसी उपायसे मिल जाय तो बुद्धिकी
चालाकी बढ़ जाय" यह विचार कर तीनों तीन वृक्षोंके नीचे, एक एक कोसके
अन्तरसे, उस ब्राह्मणके आनेकी बाट देख कर मार्गमें बैठ गये । वहाँ एक धूर्त्तने
जा कर उस ब्राह्मणसे कहा—'हे ब्राह्मण ! यह क्या बात है कि कुत्ता कंधे पर
लिये जाते हो ?' ब्राह्मणने कहा,-'यह कुत्ता नहीं है, यज्ञका बकरा है।' फिर
इससे आगे बैठे हुए दूसरे धूर्तने वैसे ही कहा। यह सुन कर ब्राह्मण बकरेको
धरनी पर रख कर बार बार देख फिर कंधे पर रख कर चलायमान चित्त-सा हो
कर चलने लगा ।
यतः,—
मतिर्दोलायते सत्यं सतामपि खलोक्तिभिः ।
ताभिर्विश्वासितश्चासौ म्रियते चित्रकर्णवत्' ॥ ५३ ॥