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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 259, कुल 302 में से

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पृष्ठ 259

-५५] अभयदानका भंग करनेमें कौवेकी युक्ति २३९
यतः,-
त्यजेत् क्षुधार्ता महिला स्वपुत्रं,
खादेत् क्षुधार्ता भुजगी स्वमण्डम् ।
बुभुक्षितः किं न करोति पापं ?
क्षीणा नरा निष्करुणा भवन्ति ॥ ५४ ॥
क्योंकि-भूखी स्त्री अपने पुत्रको छोड़ देती है, भूखी नागन अपने अंडेको
खा लेती है, और भूखा क्या क्या पाप नहीं करता है ? क्योंकि क्षीण मनुष्य
करुणाहीन होते हैं, अर्थात् भूख और बुढ़ापेसे क्षीण यह सिंह दयारहित बन
जायगा ॥ ५४ ॥
अन्यच्च,-
मत्तः प्रमत्तश्चोन्मत्तः श्रान्तः क्रुद्धो बुभुक्षितः ।
लुब्धो भीरुस्त्वरायुक्तः कामुकश्च न धर्मवित्' ॥ ५५ ॥
और दूसरे-मतवाला, असमर्थ, उन्मत्त, थका हुआ, क्रोधित, भूखा, लोभी,
डरपोक, बिना विचारे करने वाला, और कामी ये धर्मके जानने वाले नहीं होते
हैं ॥ ५५ ॥
इति संचिन्त्य सर्वे सिंहान्तिकं जग्मुः । सिंहेनोक्तम्-'आहारार्थं
किंचित्प्राप्तम् ?'। तैरुक्तम्-'यत्नादपि न प्राप्तं किंचित् ।' सिंहेनो-
क्तम्-'कोऽधुना जीवनोपायः ?' । काको वदति-'देव ! स्वाधी-
नाहारपरित्यागात् सर्वनाशोऽयमुपस्थितः ।' सिंहेनोक्तम्-
'अत्राहारः कः स्वाधीनः ?' । काकः कर्णे कथयति-'चित्रकर्णः'
इति । सिंहो भूमिं स्पृष्ट्वा कर्णौ स्पृशति । अभयवाचं दत्त्वा
धृतोऽयमस्माभिः । तत्कथमेवं संभवति ?
यह विचार कर सब सिंहके पास गये । सिंहने कहा-'आहारके लिये कुछ
मिला?' उन्होंने कहा-'यत्न करनेसे भी कुछ नहीं मिला ।' सिंहने कहा-'अब
जीनेका क्या उपाय है ? कागने कहा-महाराज ! आपने आधीन आहारको
त्यागनेसे यह सब नाश आ पहुँचा है'। सिंहने कहा-'यहाँ पर कौनसा आहार
अपने आधीन है ?' कागने कानमें कहा-'चित्रकर्ण ।' सिंहने भूमिको छू कर
कान छुए । अभय वाचा दे कर इसको हमने रक्खा है, इसलिये ये कैसे हो
सकता है ?'