हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
Hitopadesha (with Hindi Translation)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
-१०९ ] बूढा बनिया और उसकी स्त्रीकी कहानी ४९
-१०९ ] बूढा बनिया और उसकी स्त्रीकी कहानी ४९
परिव्राजकः समायातः। तेन सह कथाप्रसङ्गावस्थितो मम त्रासार्थं
जर्जरवंशखण्डेन चूडाकर्णो भूमिमताडयत्। वीणाकर्ण उवाच—
‘सखे ! किमिति मम कथाविरक्तोऽन्यासक्तो भवान् ?’ चूडाकर्णे-
नोक्तम्—‘मित्र ! नाहं विरक्तः। किंतु पश्यायं मूषिको ममापकारी
सदा पात्रस्थं भिक्षान्नमुत्प्लुत्य भक्षयति।’ वीणाकर्णो नागदन्तकं
विलोक्याह—‘कथं मूषिकः स्वल्पबलोऽप्येतावद्दूरमुत्पतति ? तदत्र
केनापि कारणेन भवितव्यम् ।
चम्पका नाम नगरीमें संन्यासियोंकी एक वस्ती है । वहां चूडाकर्ण नाम
संन्यासी रहता था। और वह भोजनसे बचेखुचे भिक्षाके अन्नसहित भिक्षा-
पात्रको खूंटीपर टांग कर सोजांया करता था। और मैं उस भोजनके पदार्थको
उछल उछल कर नित्य खाया करता था । उसके उपरान्त उसका प्रिय
मित्र वीणाकर्ण नाम संन्यासी आया । चूडाकर्णने उसके साथ नानाभांतिकी
कथाके प्रसंगमें लग कर मुझको डरानेके लिये एक पुराने बाँसके टुकड़ेसे पृथिवी
खटखटायी. वीणाकर्ण बोला—‘मित्र ! यह क्या बात है ? कि (तुम) मेरी
कथामें विरक्त और दूसरीमें लगे हो’॥ चूडाकर्णने कहा कि ‘मित्र ! मैं विरक्त
नहीं हूं। परन्तु देखो—यह चूहा मेरा अपकारी है, पात्रमें धरे हुए भिक्षाके
अन्नको सदा उछल उछल कर खा जाता है.’ वीणाकर्णने खूंटीकी ओर देख कर
कहा—‘यह दुबला पतला-सा भी चूहा कैसे इतना ऊपर उछलता है ? इसलिये
इसमें कुछ न कुछ कारण होना चाहिए ।
तथा चोक्तम्—
अकस्माद्युवती वृद्धं केशेष्वाकृष्य चुम्बति ।
पतिं निर्दयमालिङ्ग्य हेतुरत्र भविष्यति’ ॥ १०९ ॥
जैसा कहा है कि—यकायक एक जवान स्त्रीने केश पकड़ कर और प्रेमसे
आलिंगन करके अपने बूढ़े पतिका मुख चुम्बन किया (वैसाही) इसमें कोई कारण
होगा’ ॥ १०९ ॥
चूडाकर्णः पृच्छति—‘कथमेतत् ?’ । वीणाकर्णः कथयति—
चूडाकर्ण पूछने लगा—‘यह कथा कैसे है?’ वीणाकर्ण कहने लगा—
कथा ५
[ बूढा बनिया और उसकी व्यभिचारिणी स्त्रीकी कहानी ५ ]
अस्ति गौडीये कौशाम्बी नाम नगरी । तस्यां चन्दनदासनामा
वणिङ्महाधनो निवसति । तेन पश्चिमे वयसि वर्तमानेन कामाधि-
हि० ४
ष्टितचेतसा धनदर्पल्लीलावती नाम वणिक्पुत्री परिणीता। सा च
मकरकेतोर्विजयवैजयन्तीव यौवनवती बभूव । स च वृद्धपति-
स्तस्याः संतोषाय नाभवत् ।
बंगाल देशमें कौशाम्बी नाम एक नगरी है । उसमें चन्दनदास नाम एक
बड़ा धनवान् बनिया रहता था । उसने बुढ़ापेमें कामातुर हो कर धनके मदसे
लीलावती नाम एक बनियेकी बेटीसे विवाह कर लिया । वह लीलावती काम-
देवकी विजयपताकाके समान तारुण्यतरङ्गिता हुई. पर वह बूढ़ा पति उसके
संतोष करनेके लिये योग्य नहीं था ।
यतः,—
शशिनीव हिमार्तानां घर्मार्तानां रवाविव ।
मनो न रमते स्त्रीणां जराजीर्णेन्द्रिये पत्यौ ॥ ११० ॥
क्योंकि—जैसे पालेसे मरे हुओंका चित्त चन्द्रमामें, और धूपसे दुःखियों का
सूरजमें नहीं लगता है वैसेही स्त्रियोंका मन शिथिल इन्द्रियोंवाले पतिमें नहीं
लगता है ॥ ११० ॥
अन्यच्च,—
पतितेषु हि दृष्टेषु पुंसः का नाम कामिता ? ।
भेषज्यमिव मन्यन्ते यदन्यमनसः स्त्रियः ॥ १११ ॥
और दूसरे—जब बाल श्वेत हो गये तब पुरुषको कामकी योग्यता कहां ?
क्योंकि जिन स्त्रियोंका दिल अन्य पुरुषोंसे लग रहा है वे (ऐसे पतिको)
औषधके समान समझती हैं ॥ १११ ॥
स च वृद्धपतिस्तस्यामतीवानुरागवान् ।
और वह बूढ़ा पति उस पर अत्यंत आसक्त था.
यतः,—
धनाशा जीविताशा च गुर्वी प्राणभृतां सदा ।
वृद्धस्य तरुणी भार्या प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ॥ ११२ ॥
क्योंकि-प्राणधारियोंको धन और जीवनकी बड़ी आशा होती है, लेकिन
बूढ़ेको तरुण स्त्री प्राणोंसेभी अधिक प्यारी होती है ॥ ११२ ॥
नोपभोक्तुं न च त्यक्तुं शक्नोति विषयाञ्जरी ।
अस्थि निर्दशनः श्वेव जिह्वया लेढि केवलम् ॥ ११३ ॥
बूढ़ा मनुष्य न तो विषयोंको भोग सकता है और न त्यागभी कर सकता
है। जैसे दंतहीन कुत्ता हड्डीको चबा नहीं सकता है, (पर आसक्त होनेसे)
केवल जीभसे चाटता है ॥ ११३ ॥
अथ सा लीलावती यौवनदर्पादतिक्रान्तकुलमर्यादा केनापि
वणिक्पुत्रेण सहानुरागवती बभूव ।
फिर उस लीलावतीने यौवनके मदसे अपनी कुलकी मर्यादाको छोड़ किसी
बनियेके पुत्रसे प्रेमवश हुई.
यतः,—
स्वातन्त्र्यं पितृमन्दिरे निवसतिर्यात्रोत्सवे संगति-
र्गोष्ठी पुरुषसंनिधावनियमो वासो विदेशे तथा ।
संसर्गः सह पुंश्चलीभिरसकृद्वृत्तेर्निजायाः क्षतिः
पत्युर्वार्धकमीर्षितं प्रवसनं नाशस्य हेतुः स्त्रियः ॥ ११४ ॥
क्योंकि-स्वतन्त्रता, पिताके घरमें (ज्यादह काल) रहना, यात्रा आदि
उत्सवमें किसीका संग, पुरुषके साथ गप लडाना, नियममें न रहना, परदेशमें
रहना, व्यभिचारिणी स्त्रियोंके सहवासमें रहना, वार वार अपने सच्चरित्रका
खोना, पतिका बूढ़ा होना, ईर्ष्या करना, और स्वामीका परदेशमें रहना ये
स्त्रियोंके नाश(बिगड़ने)के कारण हैं ॥ ११४ ॥
अपरं च,—
पानं दुर्जनसंसर्गः पत्या च विरहोऽटनम् ।
स्वप्नश्चान्यगृहे वासो नारीणां दूषणानि षट् ॥ ११५ ॥
और दूसरे—मद्यपान, दुष्ट लोगोंका सहवास, पतिका विरह, इधर उधर
घूमते रहना, दूसरेके घरमें सोना अगर रहना, ये छः स्त्रियोंके दूषण हैं ॥११५॥
स्थानं नास्ति क्षणं नास्ति नास्ति प्रार्थयिता नरः ।
तेन नारद ! नारीणां सतीत्वमुपजायते ॥ ११६ ॥
हे नारद ! (व्यभिचारके लिये) ऐकांत स्थान, मौका और प्रार्थना करने वाला
मनुष्य इनके न होनेसे स्त्रियोंका पतिव्रतधर्म रहता है ॥ ११६ ॥
न स्त्रीणामप्रियः कश्चित्प्रियो वापि न विद्यते ।
गावस्तृणमिवारण्ये प्रार्थयन्ति नवं नवम् ॥ ११७ ॥
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५२ हितोपदेशः [मित्रलाभः ११८-
स्त्रियोंका कोई अप्रिय अथवा प्रियभी नहीं है, जैसे वनमें गायें नये नये तृणको
चाहती हैं वैसेही स्त्रियें भी नवीन नवीन पुरुषको चाहती हैं ॥११७॥
अपरं च,—
घृतकुम्भसमा नारी तप्ताङ्गारसमः पुमान् ।
तस्माद्घृतं च वह्निं च नैकत्र स्थापयेद्बुधः ॥ ११८ ॥
और,—स्त्री घीके घड़ेके समान है और पुरुष जलते हुये अंगारके समान है,
इसलिये बुद्धिमानको चाहिए कि घी और अग्निको पास पास न रखे ॥ ११८ ॥
मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा नो विविक्तासनो भवेत् ।
बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ॥ ११९ ॥
पुरुषको, माता, बहिन और बेटी, इनके पासभी एकांतमें नहीं बैठना चाहिये,
क्योंकि इंद्रियां बड़ी बलवान् हैं, ये जितेन्द्रियकोभी वशमें कर लेती हैं ॥ ११९ ॥
न लज्जा न विनीतत्वं न दाक्षिण्यं न भीरुता ।
प्रार्थनाभाव एवैकं सतीत्वे कारणं स्त्रियाः ॥ १२० ॥
स्त्रियोंको पतिव्रत रखनेमें न लज्जा, न विनय, न चतुरता और न भय
कारण है, परन्तु केवल प्रार्थनाका न होना (अर्थात् परपुरुषसे संभोगकी प्रार्थना
न होना) ही एक कारण है ॥ १२० ॥
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने ।
पुत्रश्च स्थाविरे भावे न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥ १२१ ॥
बचपनमें पिता, जवानीमें पति, और बुढ़ापेमें पुत्र रक्षा करता है, एवं स्त्रीको
कदापि स्वतंत्रता योग्य नहीं है ॥ १२१ ॥
एकदा सा लीलावती रत्नावलीकिरणकर्बुरे पर्यङ्के तेन वणि-
क्पुत्रेण सह विश्रम्भालापैः सुखासीना तमलक्षितोपस्थितं पति-
मवलोक्य सहसोत्थाय केशेष्वाकृष्य गाढमालिङ्ग्य चुम्बितवती ।
तेनावसरेण जारश्च पलायितः ।
एक दिन (पतिकी अनुपस्थितिमें) वह लीलावती रत्नोंकी बाढ़की झलकसे
रंगबिरंगे पलंग पर उस बनियेके पुत्रके साथ जी खोल कर बातें करती हुई
आनन्दसे बैठी थी इतनेमें अचानक आये हुए उस अपने पतिको देख कर
यकायक उठी और बाल पकड़ कर, अत्यन्त चिपट कर उसको चूमने लगी और
इस अवसरमें (मौका देख कर) यारभी भाग गया;
१२३ ] धनकी प्रशंसा ५३
उक्तं च,—
उशना वेद यच्छास्त्रं यच्च वेद बृहस्पतिः ।
स्वभावेनैव तच्छास्त्रं स्त्रीबुद्धौ सुप्रतिष्ठितम् ॥ १२२ ॥
और कहा भी है कि—जो शास्त्र शुक्राचार्य जानते हैं और जो शास्त्र
बृहस्पतिजी जानते हैं वह शास्त्र स्त्रीकी बुद्धिमें स्वभावहीसे होता है ॥ १२२ ॥
तदालिङ्गनमवलोक्य समीपवर्तिनी कुट्टन्यचिन्तयत्—'अकस्मा-
दियमेनमुपगूढवती' इति ततस्तया कुटन्या तत्कारणं परिज्ञाय सा
लीलावती गुप्तेन दण्डिता; अतोऽहं ब्रवीमि—"अकस्माद्युवती
वृद्धम्” इत्यादि । मूषिकबलोपष्टम्मेन केनापि कारणेनात्र
भवितव्यम् ।'
बूढे पतिके साथ स्त्रीका आलिंगन देख कर पास बैठने वाली कुटनी चिंता
करने लगी कि, 'भला यह जवान औरत इस बूढेको क्यों लिपट गई ?' फिर उस
कुटनीने उसका कारण जान कर लीलावतीको अकेली देखकर डाटा; इसलिये मैं
कहता हूं "अचानक जवान स्त्रीने वृद्धको" इत्यादि ॥ चूहेको बलका अहंकार
यहां परभी किसी न किसी कारणसेही है ॥
क्षणं विचिन्त्य परिव्राजकेनोक्तम्—'कारणं चात्र धनबाहुल्यमेव
भविष्यति ।
थोड़ी देर विचार कर संन्यासीने कहा—'इसमें धनकी अधिकताका कारण
होगा,
यतः,—
धनवान् बलवाँल्लोके सर्वः सर्वत्र सर्वदा ।
प्रभुत्वं धनमूलं हि राज्ञामप्युपजायते' ॥ १२३ ॥
क्योंकि—सर्वत्र, संसारमें सब मनुष्य धनसेही सदा बलवान् होते हैं और
राजाओंकी प्रभुताकी जड़ धनही होता है ॥ १२३ ॥
ततः खनित्रमादाय तेन विवरं खनित्वा चिरसंचितं मम धनं
गृहीतम् । ततः प्रभृति निजशक्तिहीनः सत्त्वोत्साहरहितः स्वाहार-
मप्युत्पादयितुमक्षमः सत्रासं मन्दं मन्दमुपसर्पञ्चूडाकर्णेनावलो-
कितः ।
५४ हितोपदेशः [ मित्रलाभः १२४-
फिर कुदाली लाकर उसने बिलको खोद कर मेरा बहुत दिनका इकट्ठा किया
हुआ धन ले लिया। उसी दिनसे अपने सामर्थ्यसे हीन, बल और उत्साहसे
रहित, अपना आहारभी ढूंढ़नेके अयोग्य, डरके मारे धीरे धीरे चलते हुए
मुझको चूड़ाकर्णने देखा ॥
ततस्तेनोक्तम्—
'धनेन बलवाँल्लोके धनाद्भवति पण्डितः ।
पश्यैनं मूषिकं पापं स्वजातिसमतां गतम् ॥ १२४ ॥
फिर उसने कहा कि, दुनियामें आदमी धनसे बलवान् और धनसेही पण्डित
माना जाता है ॥ इस पापी चूहेको देखो ( धनहीन होनेसे ) अपनी जातिके
समान हो गया ॥ १२४ ॥
किं च,—
अर्थेन तु विहीनस्य पुरुषस्याल्पमेधसः।
क्रियाः सर्वा विनश्यन्ति ग्रीष्मे कुसरितो यथा ॥ १२५ ॥
और धनसे रहित बुद्धिहीन मनुष्यके तो सब काम बिगड़ जाते हैं, जैसे
गरमीकी ऋतुमें छोटी छोटी नदियां (सूख जा कर बिगड़ जाती हैं) ॥ १२५ ॥
अपरं च,—
यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः ।
यस्यार्थाः स पुमाँल्लोके यस्यार्थाः स हि पण्डितः ॥ १२६ ॥
और दुनियामें जिसके पास धन है उसीके सब मित्र और उसीके बान्धव हैं;
और जिसके पास धन है वही महान् पुरुष और वही बड़ा पण्डित है ॥ १२६ ॥
अन्यच्च,—
अपुत्रस्य गृहं शून्यं सन्मित्ररहितस्य च ।
मूर्खस्य च दिशः शून्याः सर्वशून्या दरिद्रता ॥ १२७ ॥
और सच्चे मित्रसे हीन और पुत्रहीन (पुरुष)का घर सूना है । मूर्खकी सब
दिशाएँ सूनी हैं, अर्थात् मूर्खताके कारण कहीं आदर नहीं पा सकता है,
और दरिद्रता तो सब सूनोंका (केन्द्र) स्थान है अर्थात् सब सुखोंसे रहित
है ॥ १२७ ॥
अपि च,—
दारिद्र्यान्मरणाद्वापि दारिद्र्यमवरं स्मृतम् ।
अल्पक्लेशेन मरणं दारिद्र्यमतिदुःसहम् ॥ १२८ ॥
-१३२ ] बुद्धिमान् पुरुषके लिये शिक्षा ५५
और भी—दरिद्रता और मरना इन दोनोंमेंसे दरिद्रता बुरी कही है, क्योंकि
मरना तो थोड़े क्लेशसे होता है और दरिद्रता हमेशा दुःख देती है ॥ १२८ ॥
अपरं च,—
तानीन्द्रियाण्यविकलानि तदेव नाम
सा बुद्धिरप्रतिहता वचनं तदेव ।
अर्थोष्मणा विरहितः पुरुषः स एव
अन्यः क्षणेन भवतीति विचित्रमेतत्' ॥ १२९ ॥
और दूसरे—वे ही विकारसे रहित इन्द्रियां हैं, वही नाम है, वही निर्मल
बुद्धि है, वही वाणी है, परन्तु धनकी उष्णतासे रहित वो ही मनुष्य क्षणभरमें
कुछका कुछ हो जाता है; ॥ १२९ ॥
एतत्सर्वमाकर्ण्य मयालोचितम्-‘ममात्रावस्थानमयुक्तमिदानीम्।
यच्चान्यस्मै एतद्वृत्तान्तकथनं तदप्यनुचितम् ।
यह सब सुन कर मैंने सोचा—‘मेरा अब यहां रहना ठीक नहीं है । और
जो दूसरेसे यह समाचार कहना भी उचित नहीं है,
यतः,—
अर्थनाशं मनस्तापं गृहे दुश्चरितानि च ।
वञ्चनं चापमानं च मतिमान्न प्रकाशयेत् ॥ १३० ॥
क्योंकि--बुद्धिमान् पुरुषको अपने धनका नाश, मनका संताप, घरका दुराचार,
ठगा जाना, और अपमान, ये प्रकट न करने चाहिये ॥ १३० ॥
अपि च,—
आयुर्वित्तं गृहच्छिद्रं मन्त्रमैथुनभेषजम् ।
तपो दानापमानं च नव गोप्यानि यत्नतः ॥ १३१ ॥
औरभी—आयु, धन, घरका भेद ( रहस्य ), गुप्त बात, मैथुन, औषधि,
तप, दान और अपमान, इन नौ बातोंको यत्नसे गुप्त रखना चाहिये ॥ १३१ ॥
तथा चोक्तम्,—
अत्यन्तविमुखे दैवे व्यर्थे यत्ने च पौरुषे ।
मनस्विनो दरिद्रस्य वनादन्यत्कुतः सुखम् ? ॥ १३२ ॥