हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४६ हितोपदेशः [संधिः ७८-
सुकृतान्यपि कर्माणि राजभिः सगरादिभिः ।
अथ तान्येव कर्माणि ते चाऽपि प्रलयं गताः ॥ ७८ ॥
सगर आदि राजाओंने अच्छे अच्छे कर्म यज्ञ वगैरह किये, फिर वे कर्म
और वे राजा भी नाश हो गये ॥ ७८ ॥
संचिन्त्य संचिन्त्य तमुग्रदण्डं
मृत्युं मनुष्यस्य विचक्षणस्य ।
वर्षाम्बुसिक्ता इव चर्मबन्धाः
सर्वे प्रयत्नः शिथिलीभवन्ति ॥ ७९ ॥
बड़े दंड करने वाली मृत्युको बार बार सोच कर बुद्धिमान् मनुष्यके भी सब
उपाय, बरसातमें भीगे हुए चमड़ेकी गाँठोंके समान ढीले पड़ जाते हैं ॥ ७९ ॥
यामेव रात्रिं प्रथमामुपैति
गर्भे निवासी नरवीरलोकः ।
ततः प्रभृत्यस्खलितप्रयाणः
स प्रत्यहं मृत्युसमीपमेति ॥ ८० ॥
वीर पुरुष जिस पहली रातको गर्भमें आता है उसी दिनसे निरंतर गतिसे
वह नित्य मृत्युके पास सरकता जाता है ॥ ८० ॥
अतः संसारं विचारय । शोकोऽयमज्ञानस्य प्रपञ्चः ।
इसलिये संसारको विचारो । यह शोक अज्ञानका पाखंड है ।
पश्य,—
अज्ञानं कारणं न स्याद्वियोगो यदि कारणम् ।
शोको दिनेषु गच्छत्सु वर्धतामपयाति किम् ? ॥ ८१ ॥
देखो,-जो वियोगही दुःखका कारण होता और अज्ञान कारण नहीं होता,
तो प्रतिदिन शोक बढ़ना चाहिये था, फिर भला घटता क्यों जाता है ?
इसलिये अज्ञान ही शोकका मूल कारण है ॥ ८१ ॥
तदत्रात्मानमनुसंधेहि । शोकचर्चां परिहर ।
इसलिये इसमें आत्माको स्थिर करो, शोककी चर्चाको दूर करो;
यतः,—
अकाण्डपातजातानां गात्राणां मर्मभेदिनाम् ।
गाढशोकप्रहाराणामचिन्तैव महौषधिः' ॥ ८२ ॥