हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 262, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें२४२ हितोपदेशः [ संधिः ६०-
तथा चोक्तम्,—
स्कन्धेनापि वहेच्छत्रून् कार्यमासाद्य बुद्धिमान् ।
यथा वृद्धेन सर्पेण मण्डूका विनिपातिताः' ॥ ६० ॥
जैसा कहा भी है-चतुर मनुष्यकों अपना काम निकालनेके लिये शत्रुओंको
कंधे पर बैठा लेना चाहिये। जैसे वृद्ध सर्पने मेंडूकोंको मार डाला' ॥ ६० ॥
राजाह—'कथमेतत् ?' । मेघवर्णः कथयति—
राजा बोला—'यह कथा कैसी है ?' मेघवर्ण कहने लगा।—
कथा १२
[ भूखा साँप और मेंडकों की कहानी १२ ]
'अस्ति जीर्णोद्याने मन्दविषो नाम सर्पः। सोऽतिजीर्णतया-
ऽऽहारमप्यन्वेष्टुमक्षमः सरस्तीरे पतित्वा स्थितः। ततो दूरादेव
केनचिन्मण्डूकेन दृष्टः, पृष्टश्च—'किमिति त्वमाहारं नान्वि-
ष्यसि ?' । सर्पोऽवदत्—'गच्छ भद्र ! मम मन्दभाग्यस्य प्रश्नेन
किम् ?' । ततः संजातकौतुकः स च भेकः सर्वथा कथ्यताम्'
इत्याह । सर्पोऽप्याह—'भद्र ! ब्रह्मपुरवासिनः श्रोत्रियस्य कौण्डि-
न्यस्य पुत्रो विंशतिवर्षीयः सर्वगुणसंपन्नो दुर्दैवान्मम नृशंस-
स्वभावाद्दष्टः । तं पुत्रं सुशीलनामानं मृतमालोक्य मूर्च्छितः
कौण्डिन्यः पृथिव्यां लुलोठ । अनन्तरं ब्रह्मपुरवासिनः सर्वे
बान्धवास्तत्रागत्योपविष्टाः ।
एक पुराने उपवनमें मंदविष नाम सर्प रहता था। वह अधिक बूढ़ा होनेसे
आहार भी ढूँढ़नेके लिये असमर्थ हुआ सरोवरके किनारे पर लटक कर बैठा था।
फिर दूसरे किसी मेंढ़कने देखा, और पूछा—'क्या बात है जो तुम भोजनको नहीं
ढूँढ़ते हो ?' सर्पने कहा—'मित्र ! जाओ, मुझ भाग्यहीनका क्या पूछना है ?'
फिर आश्चर्ययुक्त हो कर उस मेंढ़कने यह कहा कि 'अवश्य ही कहो।' सर्पने कहा-
'मित्र ! ब्रह्मपुरके निवासी कौंडिन्य नामक वेदपाठीके सब गुणोंसे युक्त बीस
[L27: बरसके पुत्रको दुर्भाग्य और दुष्ट स्वभावसे मैंने डस लिया। तब उस सुशील
नाम पुत्रको मरा हुआ देख कर कौंडिन्य पछाड़ खा कर धरतीपर गिर पड़ा !
पीछे सब ब्रह्मपुरवासी बान्धव वहाँ आ कर बैठे ।