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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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पृष्ठ 252

२३२ हितोपदेशः [ संधिः ३३-
दूसरेके राज्यमें रहने वाला, बहुतसे शत्रुओंसे युक्त, वे अवसर लडाई ठानने
वाला, और सत्य धर्मसे रहित, ये बीस पुरुष हैं ॥ ३२ ॥
एतैः संधिं न कुर्वीत विगृह्णीयात्तु केवलम् ।
एते विगृह्यमाणा हि क्षिप्रं यान्ति रिपोर्वशम् ॥ ३३ ॥
इनके साथ सन्धि न करे, केवल ही संग्राम करे, क्योंकि ये लड़ कर अवश्य
शीघ्र ही शत्रुके वशमें आ जाते हैं ॥ ३३ ॥
बालस्याल्पप्रभावत्वान्न लोको योद्धुमिच्छति ।
युद्धायुद्धफलं यस्माज्ज्ञातुं शक्तो न बालिशः ॥ ३४ ॥
बालकके थोड़े प्रताप होनेसे पुरुष युद्ध (विरोध)करनेकी इच्छा नहीं करता है,
क्योंकि बालक लड़ने और नहीं लड़नेका फल ( भला या बुरा ) नहीं जान
सकता है ॥ ३४ ॥
उत्साहशक्तिहीनत्वाद्वृद्धो दीर्घामयस्तथा ।
स्वैरेव परिभूयेते द्वावप्येतावसंशयम् ॥ ३५ ॥
और वृद्ध तथा बहुत कालका रोगी ये दोनों, उत्साह और शक्तिसे हीन होनेके
कारण अवश्य आप ही पराजय पाते हैं ॥ ३५ ॥
सुखोच्छेद्यो हि भवति सर्वज्ञातिबहिष्कृतः ।
त एवैनं विनिघ्नन्ति ज्ञातयस्त्वात्मसात्कृताः ॥ ३६ ॥
सब जातिसे बाहर निकाला गया शत्रु सहजही मारा जा सकता है, क्योंकि
उसी जातिके ही मनुष्य इसके धनादिको अपने वशमें करके इसको मार डालते
हैं ॥ ३६ ॥
भीरुर्युद्धपरित्यागात् स्वयमेव प्रणश्यति ।
तथैव भीरुपुरुषः संग्रामे तैर्विमुच्यते ॥ ३७ ॥
और डरपोक मनुष्य युद्धमें पीठ दे कर भाग जानेसे अपने आप ही नष्ट हो
जाता है, और उस डरपोकको संग्राममें उसके साथी भी छोड़ देते हैं ॥ ३७ ॥
लुब्धस्यासंविभागित्वान्न युध्यन्तेऽनुयायिनः ।
लुब्धानुजीविकैरेष दानभिन्नैर्निहन्यते ॥ ३८ ॥
और यथा योग्य भाग नहीं देनेसे लोभीकी सेनाके लोग नहीं लड़ते हैं और
पारितोषिक नहीं पाने वाले लोभी सेवकोंसे वह मार डाला जाता है-अर्थात्
विपत्ति आने पर वे उसे छोड़ कर चले जाते हैं ॥ ३८ ॥