हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
Hitopadesha (with Hindi Translation)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
युद्ध और जी ले कर भागना इन बातोंको जैसा बन पड़े अपनी शक्तिके अनुसार
२१० हितोपदेशः [ विग्रहः १३९-
यतः,—
सुमन्त्रितं सुविक्रान्तं सुयुद्धं सुपलायितम् ।
कार्यकाले यथाशक्ति कुर्यान्न तु विचारयेत्' ॥ १३९ ॥
अवसरके आ पड़ने पर अच्छा उपाय, अच्छी भाँति पराक्रम, भली भाँति
युद्ध और जी ले कर भागना इन बातोंको जैसा बन पड़े अपनी शक्तिके अनुसार
करना ही चाहिये और सोचना नहीं चाहिये' ॥ १३९ ॥
राजहंसः स्वभावान्मन्दगतिः सारसद्वितीयश्च चित्रवर्णस्य
सेनापतिना कुक्कुटेनागत्य वेष्टितः । हिरण्यगर्भः सारसमाह-
'सारस सेनापते ! ममानुरोधादात्मानं कथं व्यापादयिष्यसि ?
त्वमधुना गन्तुं शक्तः । तद्गत्वा जलं प्रविश्यात्मानं परिरक्ष ।
अस्मत्पुत्रं चूडामणिनामानं सर्वज्ञसंमत्या राजानं करिष्यसि ।'
सारसो ब्रूते—'देव ! न वक्तव्यमेवं दुःसहं वचः । यावच्चन्द्रार्कौ
दिवि तिष्ठतस्तावद्विजयतां देवः । अहं देवदुर्गाधिकारी । मन्मां-
सासृग्विलिप्तेन द्वारवर्त्मना प्रविशतु शत्रुः ।
राजहंस तो स्वभावहीसे धीरे चलने वाला था और उसके साथी सारसको
चित्रवर्णके सेनापति मुर्गेने आ कर घेर लिया । हिरण्यगर्भने सारससे कहा-'हे
सेनापति सारस ! हमारे पीछे अपनेको क्यों मारता है ? तू अभी जा सकता है;
इसलिये जा कर, जलमें घुस और अपनी रक्षा कर । मेरे चूड़ामणि नाम बेटेको
सर्वज्ञकी संमतिसे राजा कर दीजिये ।' सारसने कहा-'महाराज ! इस प्रकार
कठोर वचन नहीं कहना चाहिये । जब तक आकाशमें सूर्य और चन्द्रमा ठहरे
हुए हैं तब तक महाराजकी जय हो । महाराज ! मैं गढ़का अधिकारी हूँ,
मेरे मांस और लोहूसे सने हुए द्वारके मार्गसे भलेही शत्रु घुस जाय;
अपरं च,—
दाता क्षमी गुणग्राही स्वामी दुःखेन लभ्यते ।'
और दूसरे-दाता, क्षमावान्, गुणग्राही स्वामी दुःखसे मिलता है ।'
राजाह—'सत्यमेवैतत् ।
राजा बोला-'यह तो ठीक ही है;
किंतु,—
शुचिर्दक्षोऽनुरक्तश्च जाने भृत्योऽपि दुर्लभः' ॥ १४० ॥
-१४४ ] सारसकी स्वामिभक्तिमें परायणता २११
परंतु,-मैं जानता हूँ कि नेक, सच्चा, चतुर और स्वामीको चाहने वाला
सेवक तो मिलना भी कठिन है ॥ १४० ॥
सारसो ब्रूते—'शृणु देव !
सारसने कहा-'महाराज ! सुनिये,—
यदि समरमपास्य नास्ति मृत्यो-
र्भयमिति युक्तमितोऽन्यतः प्रयातुम् ।
अथ मरणमवश्यमेव जन्तोः,
किमिति मुधा मलिनं यशः क्रियेत ? ॥ १४१ ॥
जो युद्धको छोड़ कर जानेमें मृत्युका भय न हो तो यहाँसे अन्य कोई स्थानमें
चले जाना ठीक है; पर प्राणीका मरण अवश्य ही है इसलिये जा कर क्यों
वृथा अपना यश मलिन करना चाहिये ? ॥ १४१ ॥
अन्यच्च,—
भवेऽस्मिन्पवनोद्भ्रान्तवीचिविभ्रमभङ्गुरे ।
जायते पुण्ययोगेन परार्थे जीवितव्ययः ॥ १४२ ॥
और दूसरे-वायुसे उठी हुई ल्हरियोंके खेलके समान क्षणभंगुर इस असार
संसारमें पराये उपकारके लिये प्राणोंका त्याग बड़े पुण्यसे होता है ॥ १४२ ॥
स्वाम्यमात्यश्च राष्ट्रं च दुर्गं कोशो बलं सुहृत् ।
राज्याङ्गानि प्रकृतयः पौराणां श्रेणयोऽपि च ॥ १४३ ॥
और स्वामी, मंत्री, राज्य, गढ़, कोश, सेना, मित्र और पुरवासियोंके समूह
ये राज्यके अंग हैं ॥ १४३ ॥
देव ! त्वं च स्वामी सर्वथा रक्षणीयः ।
और हे महाराज ! आप स्वामी हैं, आपकी सर्वथा रक्षा करनी चाहिये;
यतः,—
प्रकृतिः स्वामिनं त्यक्त्वा समृद्धापि न जीवति ।
अपि धन्वन्तरिर्वैद्यः किं करोति गतायुषि ? ॥ १४४ ॥
क्योंकि—स्वामीको त्याग कर प्रजा, सब ऐश्वर्यसे युक्त भी नहीं जी
सकती है, जैसे आयु का अंत होने पर धन्वन्तरि वैद्य भी क्या कर सकता
है? ॥ १४४ ॥
२१२ हितोपदेशः [ विग्रहः १४५-
अपरं च,—
नरेशे जीवलोकोऽयं निमीलति निमीलति ।
उदेत्युदीयमाने च रवाविव सरोरुहम्' ॥ १४५ ॥
और दूसरे-सूर्यके उदय तथा अस्त होनेसे कमलके समान, राजाके मरने पर
यह जीवलोक मरता है और उदय होने (जीने) पर जीता है' ॥ १४५ ॥
अथ कुक्कुटेनागत्य राजहंसस्य शरीरे खरतरनखाघातः कृतः ।
तदा सत्वरमुपसृत्य सारसेन स्वदेहान्तरितो राजा जले क्षिप्तः ।
अथ कुक्कुटैर्नखप्रहारजर्जरीकृतेन सारसेन कुक्कुटसेना बहुशो
हताः । पश्चात्सारसोऽपि चञ्चुप्रहारेण विभिद्य व्यापादितः ।
अथ चित्रवर्णो दुर्गं प्रविश्य दुर्गावस्थितं द्रव्यं ग्राहयित्वा बन्दि-
भिर्जयशब्दैरानन्दितः स्वस्कन्धावारं जगाम ॥
फिर मुर्गेने आ कर राजहंसके शरीर पर बड़े तीखे तीखे नोहट्टे मारे । तब
सारसने तुरन्त पास जा कर और अपनी देहसे छिपा कर राजाको जलमें फेंक
दिया । फिर मुर्गोंके नोहट्टोंसे व्याकुल हुए सारसने मुर्गोंकी सेनाको बहुत मारा ।
पीछे सारस भी चोंचोंके प्रहारसे छिद कर मारा गया । फिर चित्रवर्ण गढ़में
घुस कर गढ़में धरे हुए द्रव्यको लिवा कर बंदिजनोंके जय जय शब्दसे प्रसन्न
होता हुआ अपने डेरेमें चला गया ।
अथ राजपुत्रैरुक्तम्—'तस्मिन् राजबले स पुण्यवान् सारस एव,
येन स्वदेहत्यागेन स्वामी रक्षितः ।
फिर राजकुमारोंने कहा-'उस राजाकी सेनामें एक सारस ही पुण्यात्मा था
जिसने अपनी देहको त्याग करके स्वामीकी रक्षा की ।
उक्तं चैतत्,—
जनयन्ति सुतान् गावः सर्वा एव गवाकृतीन् ।
विषाणोल्लिखितस्कन्धं काचिदेव गवां पतिम्' ॥ १४६ ॥
और ऐसा कहा है कि-सभी गायें गौके आकारके समान बछड़ोंको जनती हैं,
परन्तु दोनों सींगोंसे ऊंचे दीखते हुए कंधे वाले साँड़को विरलीही जनती है' १४६
विष्णुशर्मोवाच—'स तावद्विद्याधरीपरिजनः स्वर्गसुखमनुभवतु
महासत्त्वः ।
[Page Header]
-१४९ ] रणवीरों की प्रशंसा २१३
[Page Content]
विष्णुशर्मा बोले-'वह महात्मा सारस विद्याधरियोंके परिवारके साथ स्वर्गका
सुख भोगें ।
तथा चोक्तम्,—
आहवेषु च ये शूराः स्वाम्यर्थे त्यक्तजीविताः ।
भर्तृभक्ताः कृतज्ञाश्च ते नराः स्वर्गगामिनः ॥ १४७ ॥
जैसा कहा है-जिन शूर वीरोंने संग्राममें अपने स्वामीके लिये प्राणत्याग किए
हैं वे स्वामीके भक्त तथा राजाके उपकारको मानने वाले मनुष्य स्वर्गको पाते हैं ॥
यत्र तत्र हतः शूरः शत्रुभिः परिवेष्टितः ।
अक्षयाँल्लभते लोकान् यदि क्लीब्यं न गच्छति ॥ १४८ ॥
और जिस किसी स्थानमें शत्रुओंसे घिर कर मरा हुआ शूर जो युद्धभूमि
छोड़ नहीं भागा तो वह अमर लोकोंको पाता है ॥ १४८ ॥
विग्रहः श्रुतो भवद्भिः ?' । राजपुत्रैरुक्तम्,—'श्रुत्वा सुखिनो भूता
वयम् ।'
'आपने विग्रह सुन लिया ।' राजपुत्रोंने कहा-'हम सुन कर बहुत संतुष्ट हुए ।'
विष्णुशर्माऽब्रवीत्—'अपरमप्येवमस्तु—
विग्रहः करितुरङ्गपत्तिभि-
र्नो कदापि भवतां महीभुजाम् ।
नीतिमन्त्रपवनैः समाहताः
संश्रयन्तु गिरिगह्वरं द्विषः' ॥ १४९ ॥
इति हितोपदेशे विग्रहो नाम तृतीयः कथासंग्रहः समाप्तः ।
विष्णुशर्मा बोले-'यह और भी हो-आपके समान महाराजाओंका कभी
हाथी घोड़े और पैदल आदि सेनासे संग्राम न हो और नीतिके मंत्ररूपी
पवनसे उड़ाये गये शत्रु पर्वतकी गुफामें ( जा कर ) आसरा लें' ॥ १४९ ॥
पं० रामेश्वरभट्टका किया हुआ हितोपदेश ग्रंथके विग्रह नामक तीसरे
भागका भाषा अनुवाद समाप्त हुआ. शुभम्.