हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
Hitopadesha (with Hindi Translation)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
(मूलपाठेन, अनुवादेन, विविध-विषय-विवरणेन, कथानु-
॥श्रीः॥
व्रजजीवन प्राच्यभारती ग्रन्थमाला
१८
नारायणपण्डितसङ्गृहीतः
हितोपदेशः
(मूलपाठेन, अनुवादेन, विविध-विषय-विवरणेन, कथानु-
क्रमणिकायुक्तेन, श्लोकानुक्रमणिकया, परीक्षोपयोगि-
प्रश्नपद्याद्यनेकविषयैश्च संयुतः)
भाषान्तरकार
पं. रामेश्वर भट्ट
सम्पादक
श्री नारायण राम आचार्य 'काव्यतीर्थ'
ज्ञाने सर्वं प्रतिष्ठितम्
चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान
दिल्ली
HPD
हितोपदेशः
प्रकाशक
चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान
(भारतीय संस्कृति एवं साहित्य के प्रकाशक तथा वितरक)
38 यू. ए. जवाहर नगर, बंगलो रोड
पो. बा. नं. 2113, दिल्ली - 110007
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चौखम्बा विद्याभवन
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दरियागंज, नई दिल्ली - 110002
मुद्रक :
ए. के. लिथोग्राफर्स, दिल्ली
THE
VRAJAJIVAN PRACHYABHARATI GRANTHAMALA
18
HITOPADEŚA
OF
NĀRĀYAṆA PAṆḌITA
(Containing Original Text, Hindi Translation,
Exposition of Internal Subject-matter, Index
of Stories and Verses and Question Papers etc.)
Translated by
Pt. Rameshwar Bhatta
Edited by
Narayan Ram Acharya 'Kavyatirtha'
ज्ञाने सर्वं प्रतिष्ठितम्
CHAUKHAMBA SANSKRIT PRATISHTHAN
DELHI
HPD
HITOPADEŚA
Publishers :
CHAUKHAMBA SANSKRIT PRATISHTHAN
38 U. A., Bungalow Road, Jawahar Nagar
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Delhi 110007
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A. K. Lithographers, Delhi
भूमिका
विदित हो कि नीति एक ऐसा शास्त्र है कि जिसको मनुष्यमात्र
व्यवहार में लाता है, क्योंकि बिना इसके संसार में सुखपूर्वक निर्वाह
नहीं हो सकता, और यदि नीति का अवलम्बन न किया जाय तो
मनुष्य को सांसारिक अनेक घटनाओं के अनुकूल कृतकार्य होने में
बड़ी कठिनता पड़े, और जो लोग नीति के जानने वाले हैं वे
बड़े बड़े दुस्तर और कठिन कार्यों को सहज में शीघ्र कर लेते हैं;
परन्तु नीतिहीन मनुष्य छोटे छोटे-से कार्यों में भी मुग्ध हो कर हानि
उठाते हैं । नीति दो प्रकारकी है-एक धर्म, दूसरी राजनीति; और
इन दोनों नीतियों के लिये भारतवर्ष प्राचीन समय से सुप्रसिद्ध है ।
सर्वसाधारण को राजनीति से प्रतिदिन काम पड़ता है । अत एव
विदेशी विद्वानों ने भारत में आ कर नीतिविद्या सीख ली और अपने
देशों में जा कर उसका अनुकरण किया और अपनी अपनी मातृ-
भाषा में उसका अनुवाद कर के देश को लाभ पहुंचाया ॥
यद्यपि राजनीति के एक से एक अपूर्व ग्रंथ संस्कृत भाषा में पाये
जाते हैं तथापि पण्डित विष्णुशर्मारचित पञ्चतन्त्र परम प्रसिद्ध है,
क्योंकि उस ग्रंथ में नीतिकथा इस उत्तम प्रणाली से लिखी गई है
कि जिसके पढ़ने में रुचि और समझने में सुगमता होती है और
अन्य देशियों ने भी इसका बड़ा ही समादर किया कि अरबी, फारसी
इत्यादि भाषाओं में इसका अनुवाद पाया जाता है । पण्डित नारा-
यणजी ने उक्त पञ्चतन्त्र तथा अन्य अन्य नीति के ग्रन्थों से हितोपदेश
नामक एक नवीन ग्रन्थ संगृहीत करके प्रकाशित किया, कि जो