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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 270, कुल 302 में से

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पृष्ठ 270

[Page Header: २५० हितोपदेशः [ संधिः ९१-]

उस साँपकी पीठ पर चढ़ लिया । और वह सर्प उसे अपने पीठ पर बैठा कर
विचित्र विचित्र चालोंसे फिरने लगा । दूसरे दिन चलनेके लिये असमर्थ सर्पसे
मेंढकोंके राजाने कहा-‘आज तुम धीरे धीरे क्यों रेंगते हो ? सर्पने कहा-‘महा-
राज ! खानेको नहीं मिलनेसे असमर्थ हूं.’ मेंढकोंके स्वामीने कहा-‘हमारी आज्ञासे
मेंढकोंको खा लो ।’ फिर “यह महाप्रसाद मैंने ग्रहण किया” यह कह कर वह
क्रम क्रमसे मेंढकोंको खाने लगा । फिर मेंढकोंसे खाली सरोवरको देख कर मेंढ़-
कोंके राजाकोभी खा लिया. इसलिये मैं कहता हूं, “शत्रुओंको भी कंधे पर चढ़ावे”
इत्यादि. हे महाराज ! अब पहले वृत्तान्तके कहनेको रहने दीजिए. सब प्रकारसे
यह हिरण्यगर्भ राजा सन्धि करने योग्य है, इसलिए मेरी समझमें तो सन्धि
कर लीजिये.’ राजाने कहा-‘यह तुम्हारा कैसा विचार है ? क्योंकि इसको तो
हम जीत चुके हैं, फिर जो वह हमारी सेवाके लिये रहे तो भलेही रहे, नहीं
तो युद्ध किया जाय.
अत्रान्तरे जम्बूद्वीपादागत्य शुकेनोक्तम्—‘देव ! सिंहलद्वीपस्य
सारसो राजा संप्रति जम्बूद्वीपमाक्रम्यावतिष्ठते ।’ राजा ससं-
भ्रमं ब्रूते—‘किं किम् ?’ । शुकः पूर्वोक्तं कथयति । गृध्रः स्वगतमु-
वाच—‘साधु रे चक्रवाक मन्त्रिन् सर्वज्ञ ! साधु ।’ राजा सको-
पमाह—‘आस्तां तावदयम् । गत्वा तमेव समूलमुन्मूलयामि ।’
इसी अवसर बीच जम्बूद्वीपसे आ कर तोतेने कहा—‘महाराज ! सिंहल-
द्वीपका सारस राजा अब जम्बूद्वीपको घेरे हुये डटा हुआ है।’ राजा घबरा कर
बोला-‘क्या क्या ?’ तोतेने पहिली बात दोहरा कर कही । गिद्धने अपने मनमें
सोचा कि ‘धन्य है ! अरे चकवे मंत्री सर्वज्ञ ! तुझे धन्य है, धन्य है !’ राजा
झुंझला कर बोला-‘इसे तो रहने दो । मैं जा कर उसीको जड़से नाश करूंगा.’
दूरदर्शी विहस्याह—
‘न शरन्मेघवत् कार्यं वृथैव घनगर्जितम् ।
परस्यार्थमनर्थं वा प्रकाशयति नो महान् ॥ ९१ ॥
दूरदर्शी हँस कर बोला-‘शरदृतुके मेघके समान वृथा गंभीर गर्जना नहीं
चाहिये, बड़े पुरुष शत्रुके अर्थको अथवा अनर्थको प्रकट नहीं करते हैं ॥ ९१ ॥