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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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पृष्ठ 264

२४४ हितोपदेशः [ संधिः ६६-
आसन्नततरतामेति मृत्युर्जन्तोर्दिने दिने ।
आघातं नीयमानस्य वध्यस्येव पदे पदे ॥ ६६ ॥
मारनेके लिये वधस्थानमें ले गये हुए वध्य पुरुषके समान मृत्यु प्राणियोंके
दिन पर दिन पास चली जाती है ॥ ६६ ॥
अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं द्रव्यसंचयः ।
ऐश्वर्यं प्रियसंवासो मुह्येत्तत्र न पण्डितः ॥ ६७ ॥
यौवन, रूप, जीवन, द्रव्यका संचय, ऐश्वर्य तथा स्त्रीपुत्रादि प्यारोंसे बोल-
चाल, रहना सहना, ये सब अनित्य हैं; इस लिए बुद्धिमानको चाहिये कि वह
इनसे मोह न करें ॥ ६७ ॥
यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयातां महोदधौ ।
समेत्य च व्यपेयातां तद्वद्भूतसमागमः ॥ ६८ ॥
जैसे समुद्रमें दो काष्ठके लट्ठे अपने आप बहते हुए चले जाते हैं और मिल कर
फिर अलग हो जाते हैं इसी तरह (संसारमें) प्राणियोंका स्त्री, पुत्र, मित्रादि
परिवारके साथ मिलना या जुदा होना होता है ॥ ६८ ॥
यथा हि पथिकः कश्चिच्छायामाश्रित्य तिष्ठति ।
विश्रम्य च पुनर्गच्छेत्तद्वद्भूतसमागमः ॥ ६९ ॥
जैसे कोई मुसाफिर मार्गमें छायाका आसरा ले कर बैठ जाता है और आराम
ले कर फिर चला जाता है वैसा ही (इस दुनियामें स्त्री, पुत्र और मित्र वगैरह)
प्राणियोंका समागम है ॥ ६९ ॥
अन्यच्च,—
पञ्चभिर्निर्मिते देहे पञ्चत्वं च पुनर्गते ।
स्वां स्वां योनिमनुप्राप्ते तत्र का परिदेवना ? ॥ ७० ॥
और दूसरे-पृथ्वी, जल, तेज, वायु, और आकाश इन पाँच तत्त्वोंसे देह बनी
है, फिर अपनी अपनी योनिमें अर्थात् पाँच तत्त्व पाँच तत्त्वोंमें मिल जाने पर
उसमें क्या पछतावा है ? ॥ ७० ॥
यावन्तः कुरुते जन्तुः संबन्धान्मनसः प्रियान् ।
तावन्तोऽपि निखन्यन्ते हृदये शोकशाङ्कवः ॥ ७१ ॥
प्राणी जितना मनको अच्छे लगने वाले संबन्धोंको अर्थात् स्नेहकी गाँठोंको
मजबूत करता है, उतनी ही हृदयमें शोककी कुठारें लगती हैं ॥ ७१ ॥