हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
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नायमत्यन्तसंवासो लभ्यते येन केनचित् ।
अपि स्वेन शरीरेण किमुतान्येन केनचित् ॥ ७२ ॥
किसी प्राणीको अपने शरीरका भी ऐसा बहुत काल तक साथ नहीं मिलता
है, फिर दूसरों ( पुत्रादिकों ) से क्या आशा है ? ॥ ७२ ॥
अपि च,—
संयोगो हि वियोगस्य संसूचयति संभवम् ।
अनतिक्रमणीयस्य जन्ममृत्योरिवागमम् ॥ ७३ ॥
और भी—जैसे जन्म अवश्य होने वाली मृत्युके आगमनको सूचना करता है
वैसे ही संयोग अवश्य होने वाले वियोगको सूचना करता है ॥ ७३ ॥
आपातरमणीयानां संयोगानां प्रियैः सह ।
अपथ्यानामिवान्नानां परिणामोऽतिदारुणः ॥ ७४ ॥
और अपथ्य अर्थात् हित नहीं करने वाली भक्ष्य वस्तुओंके समान क्षण-
भर सुन्दर लगने वाले स्त्री-पुत्रादि प्रिय-जनोंके साथ मिलनेका अन्त बड़ा
कष्टदायक होता है ॥ ७४ ॥
अपरं च,—
व्रजन्ति न निवर्तन्ते स्रोतांसि सरितां यथा ।
आयुरादाय मर्त्यानां तथा रात्र्यहनी सदा ॥ ७५ ॥
और भी, जैसे नदीके जलप्रवाह जाते हैं और फिर नहीं लौटते हैं, वैसे ही
रात और दिन प्राणियोंकी आयुको ले कर प्रतिक्षणको चले जाते हैं और
लौटते नहीं हैं ॥ ७५ ॥
सुखास्वादपरो यस्तु संसारे सत्समागमः ।
स वियोगावसानत्वादुःखानां धुरि युज्यते ॥ ७६ ॥
संसारमें सज्जनोंका संग अत्यन्त सुख देने वाला है, परन्तु उस संयोगके
अंतमें वियोग होनेसे वह सुख-दुःखोंके आगे जोड़ा बन जाता है, अर्थात्
अन्तमें दुःख देने वाला होता है ॥ ७६ ॥
अत एव हि नेच्छन्ति साधवः सत्समागमम् ।
यद्वियोगासिलूनस्य मनसो नास्ति भेषजम् ॥ ७७ ॥
इसीसे विवेकी जन अच्छे लोगोंके समागमको नहीं चाहते हैं कि जिसके
वियोगरूपी तलवारसे कटे हुए मनकी औषध नहीं है ॥ ७७ ॥