हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 268, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें२४८ हितोपदेशः [ संधिः ८६-
तथा हि,—
आत्मा नदी संयमपुण्यतीर्था
सत्योदका शीलतटा दयोर्मिः ।
तत्राभिषेकं कुरु पाण्डुपुत्र !
न वारिणा शुध्यति चान्तरात्मा ॥ ८६ ॥
जैसा कहा है कि-हे युधिष्ठिर ! इन्द्रियोंका संयमन (रोकना) ही जिसका
पुण्यतीर्थ है, सत्यही जिसका जल है, शील जिसका किनारा है और दयाही जिसमें
लहरियोंकी माला है, ऐसी आत्मारूपी नदीमें स्नान कर, क्योंकि केवल पानीसे
( स्नान करनेसे ) ही अंदरकी आत्मा शुद्ध नहीं हो सकती है ॥ ८६ ॥
विशेषतश्च,—
जन्ममृत्युजराव्याधिवेदनाभिरुपद्रुतम् ।
संसारमिममुत्पन्नमसारं त्यजतः सुखम् ॥ ८७ ॥
और विशेष करके—जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा, रोग और शोक इनसे भरे हुए
अत्यन्त असार इस संसारको छोड़ देने वाले मनुष्यको सुख है ॥ ८७ ॥
यतः,—
दुःखमेवास्ति न सुखं यस्माद्यदुपलक्ष्यते ।
दुःखार्तस्य प्रतीकारे सुखसंज्ञा विधीयते' ॥ ८८ ॥
क्योंकि-इस संसारमें दुःखही दुःख है सुख नहीं है कि जिस दुःखसे जो
कुछ सुखकाभी अनुभव होता है, पर दुःखसे पीड़ित मनुष्यके दुःख दूर होने
परसे वह दुःखही सुख कहाता है' ॥ ८८ ॥
कौण्डिन्यो ब्रूते—‘एवमेव ।' ततोऽहं तेन शोकाकुलेन ब्राह्मणेन
शप्तः—'यदद्यारभ्य मण्डूकानां वाहनं भविष्यसि' इति । कपिलो
ब्रूते—‘संप्रत्युपदेशासहिष्णुर्भवान् । शोकाविष्टं ते हृदयम् ।
‘कौंडिन्य बोला कि-'ऐसेही है ॥' तब उस शोकसे व्याकुल ब्राह्मणने मुझे
शाप दिया--'आजसे लेकर तू मेंडकोंका वाहन होगा । 'कपिल बोला-‘तुम अभी
उपदेशको नहीं सुन सकते हो । तुम्हारा चित्त शोकमें डूबा हुआ है।
तथापि कार्यं शृणु,—
तोभी जो करना चाहिये सो सुनो ॥