हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
पृष्ठ 261, कुल 302 में से
संदर्भ में पढ़ें-५९ ] कार्यसाधनमें युक्ति की प्रशंसा २४१
सिंहेनोक्तम्-‘वरं प्राणपरित्यागः । न पुनरीदृशि कर्मणि
प्रवृत्तिः ।’ जम्बुकेनापि तथोक्तम् । ततः सिंहेनोक्तम्-‘मैवम् ।’
अथ व्याघ्रेणोक्तम्-‘मद्देहेन जीवतु स्वामी’ । सिंहेनोक्तम्-‘न
कदाचिदेवमुचितम् ।’ अथ चित्रकर्णोऽपि जातविश्वासस्तथैवा-
त्मानमाह । ततस्तद्वचनात्तेन व्याघ्रेणासौ कुक्षिं विदार्य व्यापा-
दितः सर्वैर्भक्षितः । अतोऽहं ब्रवीमि-“मतिर्दोलायते सत्यम्”
इत्यादि । ततस्तृतीयधूर्तवचनं श्रुत्वा स्वमतिभ्रमं निश्चित्य छागं
त्यक्त्वा ब्राह्मणः स्नात्वा गृहं ययौ । स छागस्तैर्धूर्तैर्नीत्वा भक्षितः ।
अतोऽहं ब्रवीमि-“आत्मौपम्येन यो वेत्ति” इत्यादि ॥’ राजाह-
‘मेघवर्ण ! कथं शत्रुमध्ये त्वया चिरमुषितम् ? कथं वा तेषामनुनयः
कृतः ?’ मेघवर्ण उवाच-‘देव ! स्वामिकार्यार्थिना स्वप्रयोजन-
वशाद्वा किं न क्रियते ? ।
सिंहने कहा-‘मरना अच्छा है, पर ऐसे काममें मन चलाना अच्छा नहीं ।’
सियारने भी यही कहा। फिर सिंहने कहा-‘ऐसा कभी नहीं ।’ फिर बाघने कहा-
‘मेरे शरीरसे स्वामी प्राण-रक्षण करें।’ सिंहने कहा कि-‘यह भी कभी
उचित नहीं है ।’ पीछे चित्रकर्णने भी विश्वासके मारे वैसे ही अपनेको दान देनेके
लिये कहा । फिर उसके कहने पर उस बाघने कोखको फाड़कर उसे मार डाला
और सबने खा लिया । इसलिये मैं कहता हूँ कि “बुद्धि सचमुच चलायमान हो
जाती है” इत्यादि । फिर तीसरे धूर्तकी बात सुन कर अपनी बुद्धिकाही भ्रम
समझ कर बकरेको छोड़ कर ब्राह्मण नहा कर घर चला गया । उन धूर्तोंने उस
बकरेको ले जा कर खा लिया । इसलिये मैं कहता हूं-“जो अपने समान
( दूसरोंको ) जानता है” इत्यादि ।’ राजा बोला-‘हे मेघवर्ण ! शत्रुओंके बीचमें
इतने दिन तक तू कैसे रहा ? अथवा कैसे उन्होंकी विनती की ?’ मेघवर्णने
कहा-‘महाराज ! स्वामीके काम चाहने वालेको, अथवा अपने प्रयोजनके लिये
क्या नहीं करना पड़ता है ?
पश्य,—
लोको वहति किं राजन् ! न मूर्ध्ना दग्धुमिन्धनम् ? ।
क्षालयन्नपि वृक्षाङ्घ्रिं नदीवेगो निकृन्तति ॥ ५९ ॥
देखो—मनुष्य, जलानेके लिये ईंधनको क्या सिर पर नहीं उठाते हैं ? और
नदीका वेग वृक्षके चरण अर्थात् जड़को धोता हुआ भी उखाड़ देता है ॥५९॥
हि० १६