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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 256, कुल 302 में से

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पृष्ठ 256

२३६ हितोपदेशः [ संधिः ५१-
अथ प्रणिधिरागत्योवाच—'देव ! श्रूयतां तत्रत्यप्रस्तावः । एवं
तत्र गृध्रेणोक्तम्—'देव ! यन्मेघवर्णस्तत्र चिरमुषितः स वेत्ति
किं संधेयगुणयुक्तो हिरण्यगर्भो न वा ?' इति । ततोऽसौ राज्ञा
समाहूय पृष्टः—'वायस ! कीदृशोऽसौ हिरण्यगर्भः ? चक्रवाको
मन्त्री वा कीदृशः ?' वायस उवाच—'देव ! हिरण्यगर्भो राजा
युधिष्ठिरसमो महाशयः, चक्रवाकसमो मन्त्री न क्वाप्यवलो-
क्यते ।' राजाह—'यद्येवं तदा कथमसौ त्वया वञ्चितः ?' ।
फिर दूतने आ कर कहा-'महाराज ! वहाँका समाचार सुनिये । वहाँ गिद्धने
यों कहा है कि हे महाराज ! मेघवर्ण काक जो वहाँ बहुत दिनों तक रहा था वह
जानता है कि हिरण्यगर्भ मिलापके योग्य गुणोंसे युक्त है या नहीं।' फिर राजाने
उसे बुला कर पूछा-'हे कौए ! वह हिरण्यगर्भ कैसा है?' और चकवा मंत्री कैसा
है ?' कौएने उत्तर दिया-'महाराज ! राजा हिरण्यगर्भ युधिष्ठिरके समान सज्जन
है; चकवेके समान मंत्री कहीं भी नहीं दीखा है।' राजा बोला—'जो ऐसाही
है तो तूने उसे कैसे ठग लिया ?'
विहस्य मेघवर्णः प्राह—'देव !
मेघवर्णने हँस कर कहा-'महाराज !
विश्वासप्रतिपन्नानां वञ्चने का विदग्धता ? ।
अङ्कमारुह्य सुप्तं हि हत्वा किं नाम पौरुषम् ? ॥ ५१ ॥
विश्वास करने वाले मनुष्योंको ठगनेमें क्या चतुराई है ? जैसे गोदमें लेट कर
सोए हुएको मार देनेमें कौनसा पुरुषार्थ है ? अर्थात् कुछ भी नहीं है ॥ ५१ ॥
शृणु देव ! तेन मन्त्रिणाहं प्रथमदर्शन एव ज्ञातः । किंतु महाशयो-
ऽसौ राजा । तेन मया विप्रलब्धः ।
सुनिये महाराज ! उस मंत्रीने पहले देखते ही मुझे जान लिया था, परन्तु
वह राजा बड़ा सज्जन है इसलिये मेरी ठगाईमें आ गया;
तथा चोक्तम्,—
आत्मौपम्येन यो वेत्ति दुर्जनं सत्यवादिनम् ।
स तथा वञ्च्यते धूर्तैर्ब्राह्मणश्छागतो यथा' ॥ ५२ ॥