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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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पृष्ठ 263

-६५] स्नातकका कौण्डिन्यको उपदेश २४३
तथा चोक्तम्, —
उत्सवे व्यसने युद्धे दुर्भिक्षे राष्ट्रविप्लवे ।
राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः' ॥ ६१ ॥
जैसा कहा है—विवाह आदि उत्सवमें, दुःखमें, संग्राममें, अकालमें, राज्यके
पालटेमें, राजद्वारमें और श्मशानमें जो साथ रहता है वह सच्चा बान्धव है' ॥
तत्र कपिलो नाम स्नातकोऽवदत्—'अरे कौण्डिन्य ! मूढोऽसि,
तेनैव विलपसि ।
वहाँ एक कपिल नाम भिक्षुने कहा-'अरे कौंडिन्य ! तुम मूर्ख हो, इसीसे
विलाप करते हो ।
शृणु,—
क्रोडीकरोति प्रथमं यथा जातमनित्यता ।
धात्रीव जननी पश्चात्तथा शोकस्य कः क्रमः ? ॥ ६२ ॥
सुनो—जैसे पहले प्राणीके उत्पन्न होते ही, अनित्यता (नश्वरता) ग्रहण
करती है, वैसे ही पीछे धायके समान माता गोदमें खिलाती है, इसलिये इसमें
शोककी कौनसी बात है ? ॥ ६२ ॥
क्व गताः पृथिवीपालाः ससैन्यबलवाहनाः ? ।
वियोगसाक्षिणी येषां भूमिरद्यापि तिष्ठति ॥ ६३ ॥
सेनाके चतुरंग बल तथा हाथी, घोड़े इत्यादिसे युक्त राजा कहाँ गये ?
जिन्होंनेके वियोगकी साक्षी देने वाली पृथ्वी आज तक वर्तमान है ॥ ६३ ॥
अपरं च,—
कायः संनिहितापायः संपदः पदमापदाम् ।
समागमाः सापगमाः सर्वमुत्पादि भङ्गुरम् ॥ ६४ ॥
और दूसरे-शरीरके संग नाश है, संपत्तियाँ विपत्तियोंका स्थान हैं, समागमके
साथ वियोग है, और सब उत्पन्न होने वाली वस्तु नाश होने वाली हैं ॥ ६४ ॥
प्रतिक्षणमयं कायः क्षीयमाणो न लक्ष्यते ।
आमकुम्भ इवाम्भःस्थो विशीर्णः सन् विभाव्यते ॥ ६५ ॥
यह शरीर क्षणक्षणमें घटता हुआ भी नहीं दीखता है, जैसा जलके भीतर
धरा हुआ कच्चा घड़ा जलसे खाली हो जाता है तब जाना जाता है ॥ ६५ ॥