हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)
Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar
स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा
२४ हिन्दुत्व
तक इस संसारमें और राष्ट्रीय तथा जातीय भेद इतने बलवान
हैं कि मनुष्योंको पशु बना देते हैं, तबतक हिन्दुस्थानको यदि
जीना है, चाहे वह जीवन राजनीतिक हो या आध्यात्मिक, तो
राष्ट्रीय और जातीय अखंडतासे उत्पन्न होनेवाले बलकी उपेक्षा
करनेसे काम नहीं चल सकता। इस प्रकार तत्कालीन देश-
नेताओंका जी विश्वबन्धुत्वकी इन बातोंसे ऊब गया और वे कहने
लगे—
ये त्वया देव निहता असुराश्चैव विष्णुना ।
ते जाता म्लेच्छरूपेण पुनरद्य महीतले ॥
व्यापादयन्ति ते विप्रान् घ्नंति यज्ञादिकाः क्रियाः ।
हरन्ति मुनिकन्याश्च पापाः किं किं न कुर्वति ॥
म्लेच्छाक्रांते च भू लोके निर्वषट्कार मंगले ।
यज्ञायागादि विच्छेदाद्वै लोकोऽवसीदति ॥ ( गुणाढ्य )
और जिन जंगली शकों और हूणोंने भिक्षुवेश धारण किये
और शस्त्र त्यागकर हाथमें तुलसी-माला लिये अहिंसाव्रती इस
सुरम्य देशको उजाड़ डाला था, उन्हें इन्होंने सिन्धु नदीके पार
मार भगाया और सुदृढ़ तथा अखंड राष्ट्रकी स्थापना की। तब
स्वभावतः ही हमारे देश-नेताओंके ध्यानमें यह बात भी आ गयी
कि इस नवीन राष्ट्रीय राज्यके पीछे यदि वैसे ही राष्ट्रीय धर्मका
बल हो तो फिर राष्ट्रकी शक्तिका क्या कहना है।
और एक बात ध्यानमें रखनेकी यह है कि हम और हमारे
शत्रुओंके बीच जितनी बातें समान होंगी, उतना ही उनका
प्रथम खण्ड: भौगोलिक, सांस्कृतिक एवं रक्त-सम्बन्ध की एकता
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सामना करनेका हमारा बल कम होगा। जिस शत्रुके साथ
हमारा किसी भी बातमें मेल नहीं है, उसका हम घोरतम विरोध
कर सकते हैं, जैसे जिस मित्रके साथ हमारा हर बातमें मेल हो
और हम जिसकी प्रत्येक बातको अपने अन्दर पाकर उसकी
कदर करते हैं, उस मित्रके साथ हमारा सबसे अधिक प्रेम होता
है। हिन्दुस्थान विश्वबन्धुत्व और अहिंसाके नशेमें इतना चूर
हो गया था कि पाप, अपराध और आक्रमणका प्रतीकार करने-
की शक्ति भी उसकी नष्ट हो गयी थी, ऐसी अवस्थामें अन्याय-
की तरफसे देशके चित्तमें अत्यंत तीव्र तिरस्कार उत्पन्न करके
उसके प्रतीकारकी अदम्य शक्तिका संचार करनेके लिये यह
आवश्यकता हुई कि जिनके साथ हमें लड़ना है, उनसे हर
बातमें विषमता उत्पन्न की जाय, दोनोंके बीच उपासना-मार्गकी
जो समानता थी, वह भी नष्ट की जाय; क्योंकि इस उपासनामें
अपने उन सहधर्मियोंको गले लगाना पड़ता था, जिन्होंने उक्त
प्रकारसे देशका गला घोंटा था। ऐसे विश्वधर्मको लेकर क्या
करना है, जो राष्ट्रोंकी भयानक तामसी वृत्ति और पाशविक
अहंकारका दमन करनेके बदले हिन्दुस्थानको निश्चिन्त और
बेखबर बनाकर उन राष्ट्रोंकी अधिकार-लालसाको और भी उत्ते-
जित कर देता है? इसलिये उस बल और वीर्यपर ही भरोसा
किया गया, जो राष्ट्रीय आत्मचैतन्यसे ही उत्पन्न हुआ करता है।
इसके पूर्व वह अहिंसाके मार्गपर चलनेके लिये अपना सर्वस्व दे
चुका था, पर उससे उसकी सिद्धि नहीं हुई!
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बौद्ध-मतके विश्वबन्धुत्वके भावका तब तो और भी जोरसे
विरोध होने लगा, जब बौद्ध भारतवर्षमें बौद्ध राज्यकी पुनः
स्थापना करनेकी चेष्टा करने लगे। राष्ट्रीय भावको यह स्वीकार
नहीं था कि राष्ट्रीय स्वाधीनता नष्ट हो और किसी विदेशीय
विजेताको हम अपने राजाधिराज मानें। परंतु यदि यह विदेशीय
आक्रमणकारी कोई बौद्धमतावलंबी हुआ, तब तो यह निश्चय ही
था कि भारतीय बौद्ध उसके साथ गुप्त सहानुभूति रखते, जैसे
कैथोलिक संप्रदायके स्पैनिश उद्योगियोंको इंग्लैण्डकी राजगद्दी-
पर किसी कैथोलिक संप्रदायके वंशको स्थापित करनेके उद्योगमें
इंग्लैण्डके कैथोलिकोंसे अवश्य ही सहायता मिलती थी। यह
केवल निराधार तर्ककी बात नहीं है। प्राचीन ग्रंथोंमें इस बातके
प्रमाण हैं कि कई बार कुछ विदेशी बौद्ध राजाओंने भारतमें बौद्ध
राज्य स्थापित करनेके उद्देश्यसे भारतपर आक्रमण भी किया
था। उस जमानेके इतिहासका विस्तारपूर्वक विवेचन करनेका
यह स्थान नहीं है। पर यहां एक पुराणमें वर्णित ऐसे एक
आक्रमणके वर्णनकी ओर निर्देशमात्र कर सकते हैं। यह वर्णन
कुछ तो अलंकारात्मक और कुछ वास्तविक है। यह “आर्य-
देशजों” पर न्यनपत्ति (हूणोंके राजा) के आक्रमणकी कथा है।
पौराणिक पद्धतिसे बताया गया है कि किस प्रकार “हहा”
नदीके किनारे एक महान् युद्ध हुआ था और किस प्रकार चीनसे
बौद्ध सेना आयी थी (“चीनदेशमुपागम्य युद्धभूमिरकारयत्”)
और किस प्रकार कितने ही अन्य बौद्ध राष्ट्रोंने उसकी सहा-
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यताके लिये अपनी अपनी सेनाएँ भेजी थीं—
श्यामदेशोद्भवा लक्षास्तथा लक्षाश्च जावकाः ।
दशलक्षाश्चीनदेश्या युद्धाय समुपस्थिताः ॥
और कैसा घमासान युद्धके होनेके पश्चात् बौद्ध हारे और
इस हारसे उन्हें कितनी जिल्लत उठानी पड़ी। उन्हें हिन्दुस्थानके
सम्बन्धमें अपने सब गुप्त राजनीतिक हेतु प्रकट रूपसे त्याग
देने पड़े और यह प्रतिज्ञा करनी पड़ी कि अब हम लोग किसी
राजनीतिक हेतुसे भारतमें प्रवेश न करेंगे। पर धर्मसहिष्णुता
जिस भारतकी विशेषता है, उस भारतसे बौद्धोंको व्यक्तिशः कुछ
भी भय नहीं था; पर भारतके राष्ट्रीय जीवन और स्वातंत्र्यपर
चढ़ाई करनेका स्वप्न देखना उन्हें परित्याग करना पड़ा ।
सर्वैश्च बौद्धवृन्दैश्च तत्रैव शपथं कृतम्।
आर्यदेशं न यास्यामः कदाचिद्राष्ट्रहेतवे ॥ (भविष्यपुराण—
प्रतिसर्ग पर्व )
और इस प्रकार हमारे आचार-विचारकी जो विशेषताए
थीं, वे फिरसे प्रकट होने लगीं—वर्णाश्रमव्यवस्था बौद्धोंके
कालमें भी नष्ट नहीं हुई थी और अब तो उसकी लोकप्रियता
इतनी बढ़ गयी कि बड़े-बड़े राजा-महाराजा “वर्णव्यवस्थापनपरः”
(सोनपत-ताम्र लेख)—“वर्णाश्रमव्यवस्थापनप्रवृत्तचक्रः” (मध-
वत ताम्रपट) कहलानेमें अपनी बड़ी प्रतिष्ठा समझते थे।
इस वर्णाश्रम-व्यवस्थाका इतना आदर बढ़ा कि मानों उसीमें
सारी राष्ट्रीयता समा गयी। हमारे और विदेशियोंके बीच जो
२८ हिन्दुत्व
भेद निर्दिष्ट किया गया, वह यही तो था कि—
चातुर्वर्ण्यं व्यवस्थानं यस्मिन्देशे न विद्यते ।
तं म्लेच्छदेशं जानीयादार्यावर्तस्ततःपरः ॥
इसीके एक कदम आगे बढ़कर यह किया गया कि हमारे
लोग समुद्रपारके उन देशोंमें न जायँ, जो हमारे रहने योग्य नहीं
हैं और जहाँ हमारे आचार-विचारका आदर नहीं होता; उलटे
विरोध होता है और इसलिये जहाँ हम अपने आचार-विचारोंकी
रक्षा न कर सकेंगे । बौद्ध-मतसे जो चित्त हट गया, उसकी यह
तद्विरुद्ध प्रतिक्रिया थी और अवश्य ही यह अति मात्रामें थी ।
तथापि, यदि राजनीतिक दृष्टिसे विचार किया जाय तो इसका
अर्थ समझमें आ जाता है; क्योंकि आज भी तो इस बातका
आन्दोलन होता रहता है कि जिन देशोंमें हमारी जातिका अपमान
होता है, उन देशोंमें हमारे यहाँके लोग न भेजे जाय—उपनिवेशों-
में भारतीयोंका भेजा जाना बन्द किया जाय ।
इस प्रकार भारतवर्षसे बौद्धमत जो उठ गया, उसका कार्य-
कारण राजनीतिक और राष्ट्रीय प्रयोजन था । बौद्ध-मतका कोई
भौगोलिक केन्द्र नहीं था । बौद्धमतको स्वीकार करके भारतवर्षने
अपना वह भौगोलिक केंद्र खो दिया था और अब फिरसे उसकी
स्थापना करनी थी । जब राष्ट्रका आत्म-चैतन्य पूर्ण रूपसे जागा
और उसे स्व-परके भेदाभेदकी पूरी पहचान हुई, तब उसने यह
भेद निर्दिष्ट भी कर दिया और अपनी स्थिति अपने सामने ऐसी
स्पष्ट कर दी कि उसे यह मालूम हो कि हम कहाँ हैं और संसार
हिन्दुस्थान और म्लेच्छस्थान २६
भी जाने कि यह एक जाति है, एक राष्ट्र है, केवल यही नहीं, यह
एक देश है और एक राज्य है। दक्षिण ओर हमारे देशकी स्वाभा-
विक सीमा आप ही बँध चुकी थी। दक्षिण-महासागरसे इस
सीमाकी शोभा और पूर्णता निर्मित थी। "समुद्र-रचना" का
दृश्य देख देखकर हमारे कवि और देशभक्त सदासे ही अपने
नेत्रोंको तृप्त किया करते थे। परन्तु उत्तर-पश्चिम ओर जातियोंका
संमिश्रण बड़े बेढंगे तौरपर हो रहा था तथा हमारे देशकी सीमा
भी सदा अस्थिर रहा करती थी। इसलिये इस ओर सीमा निर्दिष्ट
करनेकी आवश्यकता यदि स्वतः स्थापित होनेके इस उद्योगमें
हमें प्रतीत न होती, तो निश्चय ही यह बड़े आश्चर्यकी बात होती ।
उज्जैनके "महाकाल" के अधिष्ठानमें जिन्होंने स्वराष्ट्र-स्थापनका
इतना महान् उद्योग किया, वे इस सीमाको निर्दिष्ट करनेकी आव-
श्यकताकी उपेक्षा नहीं कर सकते थे । उत्तर-पश्चिमकी यह सीमा
वेगवती, साथ ही गम्भीर स्रोतस्वती सिन्धु नदीके सिवाय और
क्या होती ? जिस दिन हमारे पूर्वज उस नदीको पार करके इधर
आये, उसी दिन उनका सम्बन्ध उन लोगोंसे छूट गया जिन्हें छोड़
कर वे इधर आये और एक नवीन राष्ट्रके संस्थापक हुए—एक
नवीन आशा, नवीन उद्देश्यको धारण कर वे एतद्देशप्रसूत
जातियोंको मिलाते और वंश-विस्तार करते हुए एक जाति और
एक राष्ट्र हो गये। जिस जाति और राष्ट्रको सिन्धु या हिन्दू
कहनेमें जो औचित्य और प्रेम है, वह और किसी नाममें नहीं है।
सिन्धु-नदीको ही अपनी सीमा करना कोई नवीन बात भी
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नहीं था, "फिरसे वेदोंकी स्थापना" की जो पुकार राष्ट्रमें मची
हुई थी उसीका यह स्वाभाविक परिणाम था। वैदिक धर्मके
अधिष्ठानमें जिस वैदिक राज्यकी स्थापना हो, उसका नाम भी तो
वैदिक ही होना चाहिये और क्या यह भी आवश्यक नहीं है कि
नामकरणका प्रकार भी वैदिक ही हो ? ऐसा ही हुआ। पुराणों-
में लेख है कि विक्रमादित्यके पौत्र शालिवाहनने विदेशियोंका
इस देशमें दूसरी बार घुस आनेका प्रयत्न विफल किया और
उन्हें सिन्धु नदीके पार मार भगाकर यह राजाज्ञा घोषित की
कि आजसे आर्य और अनार्य राष्ट्रोंके बीच सिन्धु नदी सीमा
मानी जायगी—
“एतस्मिन्नंतरे तत्र शालिवाहन भूपतिः ।
विक्रमादित्यपौत्रश्च पितृराज्यं प्रपेदिरे ॥
जित्वा शकान् दुराधर्षान् चीनतैत्तिरिदेशजान् ।
बाल्हिकान् कामरूपांश्च रोमजान् खुरजान् शठान् ॥
तेषां कोषान् गृहीत्वाच दण्डयोग्यानकारयत् ।
स्थापिता तेन मर्यादा म्लेच्छार्याणां पृथक् पृथक् ॥
सिन्धुस्थानमितिज्ञेयं राष्ट्रमार्यस्य चोत्तमम् ।
म्लेच्छस्थानं परं सिन्धोः कृतं तेन महात्मना ॥
(भविष्यपुराण प्रतिसर्ग पर्व)
हमारे देशका प्राचीनसे प्राचीन नाम जो ग्रन्थोंमें मिलता है,
वह "सप्तसिन्धु" या "सिन्धु" है। "भारतवर्ष" भी पीछेका
नाम है और यह वैयक्तिक है। व्यक्तिविशेषका गौरव चाहे वह
हिन्दुस्थान और म्लेच्छस्थान ३१
कितना ही महान् हो, समय बीतनेके साथ क्षीण हो ही जाता है।
जिस नाममें वैयक्तिक गौरव और पराक्रम ही भरा हुआ है, वह
नाम राष्ट्रकी कृतज्ञता-बुद्धि और आत्मगौरव जब बढ़ने
लगता है, तब उस राष्ट्रके चित्तका वैसा समाधान नहीं कर
सकता, जैसा कि कोई ऐसा नाम करे जिसमें राष्ट्रीय पराक्रम भरा
हो, जिसमें राष्ट्रके पूर्व पुरुषोंकी स्मृति संरक्षित हो और इसके साथ
जो कोई उत्तम और स्थायी प्राकृतिक पावन दृश्य नेत्रोंके सामने
उपस्थित करता हो। महाराज भरत आये और चले गये। ऐसे
और भी कितने ही महान् राजा हो गये !—पर सिन्धु अभीतक
वर्तमान है और सदा ऐसी ही वर्तमान रहेगी, हमारी कृतज्ञता-
बुद्धिको सदा इसी प्रकार जगाती और बढ़ाती रहेगी, हमारे
आत्मसम्मानकी इसी प्रकार वृद्धि करती रहेगी, हमारे पूर्वजोंकी
स्मृतिका संचार करती रहेगी—हमारी भवितव्यतापर उसका
पहरा रहेगा। यही हमारे राष्ट्रके कालशरीरका वह मेरुदण्ड
है, जो अति प्राचीनके साथ सुदूर भविष्यका सम्बन्ध रखता
है। जो नाम हमारे राष्ट्रको एक नदीके साथ सम्बद्ध करता
और उसके साथ मिला देता है, वह प्रकृतिको हमारी तरफ ला
देता है और हमारे राष्ट्रीय जीवनको एक ऐसे आधारपर स्था-
पित करता है, जो आधार (जहांतक मानवी दृष्टिकी पहुँच है)
चिरस्थायी है। ये सब बातें हमारे पूर्वजोंके ध्यानमें आयी होंगी
और इन्हींसे प्रेरित होकर उन्होंने हमारे राष्ट्र और देशका नाम
“सिन्धुस्थान” रखा होगा।
३२ हिन्दुत्व
“सिन्धुस्थान” वैदिक नाम तो है ही, पर इससे एक और
विचित्र लाभ हुआ है । अवश्य ही यह संयोग मात्र है, पर उसकी
उपेक्षा नहीं कर सकते । संस्कृत भाषामें “सिन्धु” केवल सिन्धु
नदीका ही नाम नहीं है, समुद्रका भी है जो दक्षिण द्वीप कलाकी
मेखला—समुद्ररशना—है । इस तरह इस अकेले “सिन्धु”
शब्दके उच्चार-मात्रसे हमारे देशकी चतुःसीमा निर्दिष्ट हो जाती
है । यदि हम इस दन्तकथाको न भी मानें कि पूर्ववाहिनी ब्रह्मपुत्रा
इसी सिन्धुकी शाखा है और इस प्रकार सिन्धु ही हिमाचलके
पश्चिम और पूर्व दोनों उतारोंपर प्रवाहित होती है और इसलिये
हमारी पश्चिम सीमाकी तरह पूर्व सीमा भी सिन्धु ही है—यदि
इस बातको हम न भी मानें—तौभी इसमें कोई संदेह नहीं कि
उत्तर और पश्चिम ओरसे इसी नदीने इस देशको घेरा है और
इसलिये सिन्धुस्थान कहनेसे, सिन्धु-नदीसे सिन्धु (समुद्र)
पर्यन्त हमारी मातृ-भूमिकी सम्पूर्ण प्रतिमा हमारे नेत्रोंके सामने
आ जाती है ।
पर कोई यह न समझे कि “सिन्धु” नाम केवल भौगोलिक सुबीता
देखकर ही ग्रहण किया गया । इस शब्दसे जो भावना उत्पन्न
होती थी, वह केवल भौगोलिक नहीं बल्कि राष्ट्रीय थी । सिन्धुस्थान
केवल एक भूखण्डका ही नाम नहीं था बल्कि एक राष्ट्र था ।
सिन्धुस्थानमें जिस संस्कृतिका प्रचार था, वह “सिन्धु” थी और
सिन्धुस्थानके अधिवासी भी वैदिक कालसे ही “सिन्धु” थे ।
सिन्धुस्थान “राष्ट्रमार्यस्य चोत्तमम्” था और इसके परे विदेशियों-
हिन्दुस्थान और म्लेच्छस्थान ३३
का म्लेच्छस्थान था। सिन्धुस्थानकी यह परिभाषा किसी
पौराणिक लेखकके शब्दोंके बालकी खाल खींचकर या धार्मिक
उन्मादसे नहीं की गयी है। भविष्यपुराणान्तर्गत उक्त श्लोकोंमें
"आर्य" शब्दका अर्थ ही उन सब लोगोंसे है जो सिन्धुके इस पार
एक राष्ट्र और एक जातिके अखण्ड अङ्ग हो गये थे—वैदिक-
अवैदिक, ब्राह्मण-चांडाल, सबका उसमें समावेश था और सब-
की एक संस्कृति थी, सबको एक जाति थी, एक देश था, एक
राजनीति थी; "म्लेच्छ" शब्द "सिन्धुस्थान" के मुकाबले विदे-
शियोंका बोधक है जिनका राष्ट्र और जाति भिन्न है—धर्म चाहे
एक हो या भिन्न हो ।
यह राजाज्ञा, सिन्धुस्थानकी अन्य राजाज्ञाओंके समान,
सब लोगोंके ही विचार और उद्योगका फल था। यदि ऐसा न
हो तो अटक स्थानको लोग जो परंपरासे अपने देशका सीमान्त
या "अटक" मानते आये इसका कारण क्या है ? कारण यही
है कि ऐसी ही राष्ट्रीय भावना थी कि यह सिन्धुओंके देशकी
सीमा और विदेशियोंकी गतिकी अटक है। सब लोग—राजा-
रंक—जो अबतक यही मानते चले आये हैं इसीसे यह मालूम
होता है कि इस तरहकी कोई राजाज्ञा निकली होगी और
उसमें हमारे देशकी सीमा "सिन्धु" और हमारे देश और
राष्ट्रका नाम सिन्धुस्थान घोषित किया गया होगा। और इस
राजाज्ञा तथा सर्वजनेच्छाका सबसे श्रेष्ठ धार्म्मिक संस्कार भी
कराया गया होगा जिससे हमारे देशका प्राचीन वैदिक नाम
३४ हिन्दुत्व
फिरसे स्थापित करनेका प्रयत्न पूर्ण सफल हुआ । अवश्य ही, इन
सिन्धु और सिन्धुस्थान नामका हमारे देश और राष्ट्रपर ऐसा
प्रभाव कि हमारे राष्ट्रका संपूर्ण विचार उस नामसे रंग जाय
और राष्ट्र उसे अपनी चिररक्षित संपत्ति समझे — पूर्ण
रूपसे स्थापित होनेमें कई शताब्दियां लगी होंगी। और आज हम
यह देखते हैं कि “आर्यावर्त” और “भारतवर्ष” इन नामोंका
अर्थ बहुतोंको नहीं मालूम है, पर प्रत्येक मनुष्य — अदनासे
अदना मनुष्य यह जानता है कि हिन्दू हमारा नाम है और हिन्दु-
स्थान हमारा देश है।*
❄ भविष्य पुराणसे जो श्लोक ऊपर दिये गये हैं वे पूर्ण विश्वसनीय
प्रतीत होते हैं; कारण एक तो उनमें परंपरासे सुनी हुई बातका ही उल्लेख
किया गया है; दूसरे हमारे इतिहासकी सामान्य गतिसे भी यही अनुमान
होता है कि उन श्लोकोंमें वर्णित घटनाएं अवश्य हुई होंगी; तीसरे हमें जो
बात यहां दिखलानी है उसके लिये यह कोई बात नहीं है कि उल्लिखित
राजाज्ञाकी तिथि अथवा वह राजाज्ञा निकालनेवाले राजाका नाम न मालूम
हो तो काम न चले; और चौथे, ग्रन्थकार जिस बातका वर्णन कर रहा है वह
अटकल-पच्चू नहीं बता रहा है, उसके विषयमें उसका निश्चय है। विक्रमा-
दित्यकी जो वंशावली उसने ग्रन्थके अन्य भागमें दी है वह यहां दी हुई
वंशावलीसे पूरे तौरपर मिलती है। जो ग्रन्थकार यह वंशावली जानता है वह
उस वंशके प्रमुख राजाओंके चरित्रोंकी मुख्य बातें भी अवश्य जानता
होगा।
और फिर हमारे इतिहासके मुख्य साधन भी तो ये ही परंपरासे सुनी हुई
बातें हैं जो हमारे पुराणोंमें, रामायण और महाभारतमें तथा अन्य प्राचीन
ग्रन्थोंमें ग्रथित हैं। इन बातोंके ब्यौरेपर भले ही कोई संदेह करे, उसकी
तिथियां निश्चित करे या गलत बता दे पर ब्यौरेकी इन त्रुटियोंसे अथवा
आलंकारिक वर्णनोंसे घबराकर हम इन ग्रन्थोंमें वर्णित बातोंको निर्माल्यवत्
हिन्दुस्थान और म्लेच्छस्थान ३५
अब इस “हिन्दू” नामके इतिहासकी और बातें लिखनेके
पूर्व हम अपने ही चित्तके समाधानके लिये कुछ निवेदन करना
चाहते हैं। इस परिच्छेदको लिखते हुए हमने अपने ही हृदयको
चोट पहुंचाई है। इसलिये हम यह बतलाना चाहते हैं कि भारत-
वर्षने बौद्धमतका किस राजनीतिक संकटको दूर करनेके लिये
परित्याग किया। उसका विवेचन करते हुए हमने कुछ कठोर शब्दों-
का प्रयोग किया है पर उनसे कोई यह न समझे कि बौद्ध नामके
विषयमें हमारे हृदयमें बहुत आदर नहीं है। नहीं, नहीं, उस महान्
और पवित्र संघके हम भी वैसे ही श्रद्धालु और उपासक हैं जैसे
कोई बौद्धमतानुयायी हो। संसारमें सबसे पवित्र संघ बौद्धसंघ
है। हमने इस संघकी दीक्षा नहीं ली, इसलिये नहीं कि संघको
हम अपने सम्मिलित होने योग्य न समझते हों; बल्कि इसलिये
कि उस दिव्य मन्दिरकी सीढियोंपर पैर रखनेके हम योग्य
परित्याग नहीं कर सकते; क्योंकि मानव-जातिके प्राचीन कार्यकलापके ये
ही तो वर्णन हैं। विशेष करके उन बातोंको छोड़ देनेका तो कोई कारण नहीं
है जो असंभव या अस्वाभाविक कोटिकी नहीं हैं और जो ऐसी घटनाएँ
है जो अन्य प्रकारसे भी प्रमाणित होती हैं। पुराणोंमें जो कुछ लिखा है वह
सब मिथ्या है जबतक उसकी सत्यता किसी विदेशी प्रमाणसे सिद्ध न हो,
यह जो कुछ लोगोंका ख्याल हो गया है वह बिलकुल वाहियात है। ठीक
रास्ता तो यह है कि इन पुराण ग्रन्थोंमें जो घटनाएँ वर्णित हैं उन्हें हम
सत्य मानें, वे सत्य ही हैं जबतक उनके विरुद्ध कोई ऐसा प्रमाण नहीं मिलता
जो पूर्ण विश्वसनीय हो। केवल किसीके तर्कके भरोसेपर पुराणोंकी बातें झूठ
कह देना कोई युक्तिसंगत बात नहीं है। भविष्य पुराणका ही उदाहरण
लीजिये, क्योंकि इसमें कुछ त्रुटियां और असम्भवसी बातें हैं। और क्या
३६ हिन्दुत्व
नहीं हैं। चट्टानोंपर उठे हुए राजमहलोंकी अपेक्षा बुद्धिगत सिद्धा-
न्तोंपर उठा हुआ यह मन्दिर अधिक दीर्घजीवी है। मनुष्यके
अंदर जो स्वाभाविक पाशविक वृत्ति है उससे मनुष्यको स्वतंत्र
करनेका महान् और बहुत कुछ सफल उद्योग उन अर्हतों और
भिक्षुओंने ही सर्वप्रथम किया जो भारतवर्षमें उत्पन्न हुए, जो
भारतवर्षमें ही पले और जो भारतवर्षको ही अपनी धर्मभूमि
समझते थे। इस बातका ख्याल हमें है और इससे हमारे हृदयमें
जो भाव उठते हैं उन्हें हम शब्दों द्वारा नहीं व्यक्त कर सकते।
जब संघके बारेमें हमारे हृदयमें ये भाव हैं तब उस संघके संस्था-
पक भगवान बुद्धदेवके संबन्धमें हम कह ही क्या सकते हैं? हम
क्षुद्रसे क्षुद्र मनुष्य हैं। तथागत! हम अज्ञ हैं, हम कुछ भी
प्लटार्क ऐसी बातोंसे खाली है ? भविष्यपुराणमें सिकंदरशाहके जन्मकी
कथाका अस्वाभाविक वर्णन है। इसलिये क्या यह मानना होगा कि
सिकंदरशाह कोई आदमी ही नहीं हुआ ? यां ये बातें बिलकुल मिथ्या है
कि चन्द्रगुप्तने सेल्युकसकी कन्यासे विवाह किया जैसा कि भविष्यपुराणके
इस श्लोकमें वर्णित है ?—
चन्द्रगुप्तस्तस्य सुतः पौरस्त्याधिपतेः सुताम् ।
सुलवस्य तथोद्वाह्य यावनों बाद्धतत्पर : (?) ॥
सच बात तो यह है कि इन पुराण ग्रन्थोंका हमारे ऊपर बड़ा भारी ऋण
है जो इन्होंने हमारी जातिके पराक्रमोंकी बातें ऐसे ऐसे विप्लवोंसे सुरक्षित
रखी हैं जिन विप्लवोंने अन्य देशोंमें तो समूचे राष्ट्रों और उनकी सभ्यताके
नामतकको मिटा दिया है। हम तो यह कहते हैं कि पाश्चात्य विद्वानोंके
जिन आधुनिक "पुराणों" ने यह आविष्कार किया है कि रामायण ग्रन्थ
तो विजयनगर राज्यकी स्थापनाका ही गीत है अथवा गौतमबुद्धका वर्णन
तो सूर्योदयका ही रूपक है उनकी अपेक्षा हमारे ये प्राचीन पुराण और इति-
हास अधिक सच्चे, अधिक दुरुस्त और अधिक विश्वसनीय हैं।
हिन्दुस्थान और म्लेच्छस्थान ३७
नहीं जानते। यही भाव है जिससे हम आपकी पूजा करते हैं।
आपके शब्दोंका अभिप्राय हृदयंगम करनेमें हम असमर्थ हैं, पर
हम यह जानते हैं कि आप जो कहते हैं वही सत्य है; कारण
आपके शब्द ईश्वरके मुखसे निकले हुए हैं, और हमारे शब्द इस
जड़ जगतके कोलाहलके हैं। शायद आपने इस धरातलपर
अवतीर्ण होकर अपना झंडा फहरानेमें बहुत जल्दी की; क्योंकि
संसार अभी बच्चा है ! आपकी बातको वह नहीं समझता और
आपके प्रकाशसे उसकी आंखें चकाचौंध हो जाती हैं-वह आपके
उपदेशको पूर्णरूपमें अपनी दृष्टिके सामने नहीं रख सकता । जब-
तक संसारमें प्राणियोंके परस्पर व्यवहारका यही नियम चलता
है कि—
चलानामचला भक्ष्या दंष्ट्रिणामप्यदंष्ट्रिणः ।
अहस्तानां सहस्ताश्च शूराणां चैव भीरवः ॥ (मनु)
और यह इतना प्रत्यक्ष है कि आकाशमें चमकनेवाले नक्षत्रोंके
समान साधुताके मनोहर उपदेशोंके सुन्दर दृश्योंसे उसका अस्ति-
त्व कोई अस्वीकार नहीं कर सकता, तबतक राष्ट्रीयताका झंडा
विश्वबन्धुत्वकी वेदीपर बलि नहीं दिया जा सकता । देवीदेवता-
ओंने भी इस झंडेकी पूजा की है। शाक्यसिंह भी इस झंडेके नीचे
न लाये जाते तो इसके गौरवमें उतनी ही हीनता रह जाती। परन्तु
हे तथागत ! आप हमारे हैं जैसे श्रीरामचन्द्र या श्रीकृष्णचन्द्र
अथवा श्रीमहावीर हमारे हैं; और आपके शब्द हमारी ही राष्ट्रीय
आत्माकी भावनाओंकी प्रतिध्वनि हैं, आपके दिव्यलोकदर्शन
३८ हिन्दुत्व
हमारे ही स्वप्न हैं और यदि इस मृत्युलोकमें कभी साधुताका
ही नियम चला तो हे तथागत ! आप देखेंगे कि जिस भूमिके
पालनेमें आप पले, जिस जातिने आपको दूध पिलाया वही उस
नियमको सिद्ध करनेमें सबके आगे रहेगी। यह बात इसके पूर्व
भी सिद्ध हो चुकी है।
( ४ )
“हिन्दवानेकी ढाल”
यहां तक हमने संस्कृत ग्रन्थोंके आधारपर सिन्धु शब्दकी
उत्पत्तिका पता चलाया और इस बाततक पहुँचे कि भारतीय
राष्ट्रकी कल्पना ज्यों-ज्यों व्यापक हुई त्यों-त्यों अन्य सब शब्दों
की अपेक्षा सिन्धुस्थान शब्द उस कल्पनाका अधिक द्योतक
हुआ। आर्यावर्त आदि शब्दोंके समान यह शब्द संप्रदाय विशेष
की ही संज्ञा नहीं है; उदाहरणार्थ, एक ग्रन्थकारने आर्यावर्तकी
परिभाषा यों दी है—
चातुर्वर्ण्यव्यवस्थानं यस्मिन्देशे न विद्यते ।
तं म्लेच्छदेशं जानीयादार्यावर्तस्ततः परम् ॥
यह परिभाषा है तो ठीक, पर यह स्थायी होनेवाली नहीं है।
कोई संस्था या संप्रदाय समाजके लिये होता है न कि समाज
उस 'स्था या संप्रदायके लिये । “चातुर्वर्ण्यव्यवस्थानं” रह भी
सकता है अथवा अपना काम पूरा करके नष्ट भी हो सकता ;
पर उससे हमारा देश “म्लेच्छदेश”—विदेशियोंका देश—नहीं
जायगा। संन्यासी, आर्यसमाजी, सिख तथा और भी कई संप्रदाय
हिन्दुवानेकी ढाल ३६
चातुर्वर्ण्यव्यवस्था नहीं मानते पर इससे क्या वे म्लेच्छ या विदेशी
हो गये ? ईश्वर न करे ऐसा हो ! उनका और हमारा रक्त एक है,
जाति एक है, देश एक है, और ईश्वर तो एक है ही । इसकी
अपेक्षा अच्छी परिभाषा तो यही है कि
“तं वर्षं भारतं नाम भारती यत्र संततिः ॥”
हम हिन्दू सब एक हैं, एक ही जाति हैं, क्योंकि सबका रक्त
एक है—सब भारती संतति हैं।
इस समयके इतिहासमें, बौद्धमतके उत्थान और पतनके साथ
साथ भारतमें प्राकृत भाषाओंका बड़ी तेजीके साथ प्रचार और
विस्तार हो रहा था और संस्कृत केवल पण्डितोंकी भाषा हो रही थी,
यहां तक कि नवीन कल्पनाओं और नवीन नामोंका संस्कृतीकरण
करना पड़ता था और तब किसी प्रामाणिक ग्रन्थमें उन्हें स्थान
मिलता था । इससे समाजका नित्यनैमित्तिक जीवन प्रचलित
प्राकृतों द्वारा ही प्रकट होता था। फलतः सिन्धु और सिन्धुस्थान
शब्द कहीं कहीं संस्कृत ग्रन्थोंमें मिलते हैं सही, पर संस्कृत ले-
खक भारत शब्दको ही परंपरागत या अधिक प्रौढ़ मानते थे और
उसीका प्रयोग करते थे। इसी प्रकार प्राकृतोंमें देखिये तो 'भारत'
या 'आर्यावर्त' इन प्राचीन और प्रिय नामोंके स्थानमें सर्वत्र हिंदु-
स्थान ( सिन्धुस्थान ), इस प्रचलित और जीवित नामका प्रयोग
किया गया है। यहां यह पिष्टपेषण करनेकी आवश्यकता नहीं कि
संस्कृतका 'स' प्रायः प्राकृतमें 'ह' हो जाता है। इससे हम देखते
हैं, भारतके वर्तमान प्राकृत साहित्यमें सर्वत्र हिन्दुस्थान या
हिन्दुओंका वर्णन है। संस्कृत भाषा हमारी जातिकी परम पवित्र
सम्पत्ति है और वह सदा वैसी ही रहेगी, उससे हमारी जाति
मूलतः एक है यह बात सामने रहेगी, उससे जीवनकी समृद्धिके
साधन प्राप्त होते रहेंगे, उससे हमारे आदर्श उच्च होंगे, हमारा
जीवन पवित्र रहेगा—यह सब होगा; परन्तु हमारी जातिकी प्रच-
लित जीवित भाषा होनेका सम्मान उस प्राकृतको ही प्राप्त हुआ
है जो संस्कृतकी सबसे बड़ी बेटी है और वह हिन्दी या
हिन्दुस्थानी ही कहलाती भी है। प्राचीन सिन्धुओं या हिन्दुओंके
वर्तमान वंशजोंकी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक भाषा यही है। हिन्दु-
स्थानी ही हिन्दुस्थानकी भाषा है। हिन्दीको राष्ट्रभाषाके उच्चपद-
पर बैठानेका प्रयत्न नवीन भी नहीं है और कृत्रिम भी नहीं है।
हिन्दुस्थानमें ब्रिटिश राज्य स्थापित होनेकेकई शताब्दियां पूर्व अपने
इतिहास ग्रन्थोंमें हम यह लिखा हुआ पाते हैं कि भारतवर्षभरमें
यही माध्यम भाषा थी। कोई साधु या सौदागर रामेश्वरसे चल-
कर हरद्वारतक जाते हुए इसी भाषाके द्वारा अपनी बात दूसरोंको
समझाता और दूसरोंकी बात स्वयं समझता था। संस्कृत भाषा-
के द्वारा कोई भी पण्डितोंकी सभा और राजाओंके दरबारमें
पहुंच सकता था, परन्तु बाजारसे लेकर राजसभातक सर्वत्र
अनायास पहुंचनेके लिये हिन्दी भाषा ही आम परवाना थी।
नानक, चैतन्य, रामदास देशभरमें वैसी ही स्वच्छन्दताके साथ
भ्रमण करते थे जैसे वे अपने अपने प्रदेशमें करते और सबको
इसी भाषाके द्वारा अपने उपदेश सुनाते थे। हमारी इस वास्त-
[Header] हिन्दवानेकी ढाल ४१
त्रिक राष्ट्रभाषाकी उत्पत्ति और वृद्धि उसी समयसे हुई है जिस
समयसे सिन्धुस्थान या हिन्दुस्थान और सिन्धु या हिन्दू इन
प्राचीन नामोंका पुनः स्थापन और प्रचार हुआ है और इसलिये
स्वभावतः ही जो भाषा संपूर्ण राष्ट्रकी अपनी भाषा थी वह
हिन्दुस्थानो या हिन्दी कहलायी ।
हूणों और शकोंको मार भगानेके पश्चात् सिन्धुस्थानके क्षात्र-
बलकी बदौलत कई शताब्दियोंतक यहां शान्ति विराजती रही
और एक बार फिर हिन्दुस्थानने सुख और समृद्धिका बड़ा
जमाना देखा । स्वाधीनताका सुख राजा और रङ्क सभीको समा-
नरूपसे प्राप्त हुआ। देशभक्तग्रन्थकारोंने हमारे इतिहासके इस बड़े
भारी अध्यायमें सहस्राधिक वर्षव्यापी तत्कालीन गौरव और सुखा-
नुभवका देशाभिमानसे मस्त होकर इस प्रकार वर्णन किया है—
ग्रामे ग्रामे स्थितो देवः देशे देशे स्थितो मखः ।
गेहे गेहे स्थितं द्रव्यं धर्मश्चैव जने जने ॥
( भविष्यपुराण प्रतिसर्ग पर्व )
सिंहलद्वीपसे काश्मीरपर्यन्त एक ही राजवंशके राजपूतोंका
राज्य था और सब राजा परस्परमे विवाह-बन्धनसे बंधे थे;
इससे भी अधिक सबकी संस्कृति, धर्म और पूर्व-परंपरा एक थी,
समस्त राष्ट्रका जीवन एकरस था। वह जितना समृद्ध था उत-
नाही पवित्र था। और सबकी एक राष्ट्रभाषा थी। राष्ट्रभाषाकी
यह एकता हमारे राष्ट्रीय जीवनकी आन्तरिक एकताका ही
बाह्य रूप था।
४२ हिन्दुत्व
परन्तु इतिहासमें यह प्रायः देखा जाता है कि अकंटक सुख
और समृद्धिसे गफलत आ जाती है और राष्ट्रको स्वप्न देखते हुए
पड़े रहनेका अभ्याससा हो जाता है। सिन्धुस्थानकी यही गति
हुई । सिन्धुराष्ट्र स्वप्न देखता रहा। अन्तको महम्मद गजनवी
सिन्धुस्थानकी सीमा-रेखा सिन्धु नदी पार करके सिन्धुस्थानपर
चढ़ आया। तब आंखें मलता हुआ हिन्दुस्थान जागा। जीवन-
मरणका संग्राम उस दिन आरम्भ हुआ। आत्म-चैतन्य अना-
त्मके साथ युद्ध करनेसे ही बहुत अच्छी तरहसे प्रकट होता है।
समस्त राष्ट्रको एक करनेकी शक्ति जितनी समान शत्रुके आक्रम-
णके दृश्यमें है उतनी और किसीमें नहीं। द्वेष परस्परको बिल-
गाता और एक भी करता है। हिन्दुस्थानके अखंड, अभेद्य और
एक होनेका वह उत्तम अवसर था जब वह दुर्द्दिन उपस्थित हुआ
कि उस मूर्ति-भंजक म्लेच्छने सिन्धुको पार किया। कासिमकी
मुसलमान सेनाने भी सिन्धुको पार किया था, पर उसकी
चोट गहरी नहीं थी, उससे हृदयमें घाव नहीं हुआ, हृदयपर उसने
वार भी नहीं किया। सच्चा संग्राम तो महम्मद गजनवीके साथ ही
आरम्भ हुआ—(और समाप्त कब हुआ ?—अब्दालीके साथ ?)
वर्षानुवर्ष बीत चले, शताब्दियां उलट गयीं और संग्राम जारी
रहा। अरब-स्थान जो कुछ था वह नहीं रहा, ईरान नष्ट हो
गया; मिश्र, शाम, अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, तारतरी-ग्रना-
डासे गजनी तक—सब राष्ट्र अपनी संस्कृतिके साथ इस्लामके
खड्गके सामने ढेर हो गये। परन्तु हिन्दुस्थानमें उस खड्गने वार तो
किया पर वह उसे मार न सका। प्रत्येक वारके साथ उस खड्गकी
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धार कुन्द होती गयी। प्रत्येक चोट पहलेसे अधिक गहरी हुई,
पर फिरसे वार करनेके लिये खड्ग उस जखमसे निकालकर ज्योंही
ऊपर उठाया जाता त्योंही घाव भर जाता। वार करनेवालेकी
जीवनी शक्तिसे वार सहनेवालेकी जीवनी शक्ति अधिक प्रमा-
णित हुई। संग्राम बराबरीवालोंमें नहीं था। किसी एक जाति
या राष्ट्रके साथ हिन्दुस्थानको नहीं लड़ना पड़ रहा था। प्रायः
समस्त एशिया आक्रमणकारी सेनाके पीछे खड़ा था और
उसके पीछे लगभग सारा यूरोप था। अरबोंने सिन्धमें
प्रवेश किया। अकेले वे इससे अधिक और कर ही क्या सकते
थे ! कुछ कालके बाद वे अपने ही देशकी स्वाधीनताकी
रक्षा नहीं कर सके और इसके बाद अरब जातिका नाम भी नहीं
सुना गया। परन्तु यहां अकेले हिन्दुस्थानको अरबों, ईरानियों,
पठानों, बलूचियों, तारतरों, तुर्कों और मुगलोंका सामना करना
पड़ा—सहारेके रेगिस्तानने मानों मानवी सेनाका रूप धारण
किया था और उसमें अकेले फंसे हुए हिन्दुस्थानपर सारी दुनि-
याका तूफान उठा था ! "धर्म" में गति देनेकी बड़ी भारी शक्ति
है। लूटमारमें भी ऐसी ही शक्ति है। परन्तु जहां धर्मपर लूटमार-
का अंकुश रहता है और धर्मके नामपर लूटमार होती है वहां इन
दोनोंके संयोगकी शक्ति बड़ी ही भयानक होती है और उसका
परिणाम भी वैसा ही भयानक होता है—जहांतहां हाहाकार मच
जाता है। स्वर्ग और नरक दोनों एक हो गये थे और बड़ा ही
भयानक रूप धारण कर महम्मदने सिन्धुको पार कर हिंदुस्थानपर