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हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा

DevanagariHindipublished167 पृष्ठ

पृष्ठ 51, कुल 167 में से

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पृष्ठ 51

हिन्दुस्थान और म्लेच्छस्थान ३५
अब इस “हिन्दू” नामके इतिहासकी और बातें लिखनेके
पूर्व हम अपने ही चित्तके समाधानके लिये कुछ निवेदन करना
चाहते हैं। इस परिच्छेदको लिखते हुए हमने अपने ही हृदयको
चोट पहुंचाई है। इसलिये हम यह बतलाना चाहते हैं कि भारत-
वर्षने बौद्धमतका किस राजनीतिक संकटको दूर करनेके लिये
परित्याग किया। उसका विवेचन करते हुए हमने कुछ कठोर शब्दों-
का प्रयोग किया है पर उनसे कोई यह न समझे कि बौद्ध नामके
विषयमें हमारे हृदयमें बहुत आदर नहीं है। नहीं, नहीं, उस महान्
और पवित्र संघके हम भी वैसे ही श्रद्धालु और उपासक हैं जैसे
कोई बौद्धमतानुयायी हो। संसारमें सबसे पवित्र संघ बौद्धसंघ
है। हमने इस संघकी दीक्षा नहीं ली, इसलिये नहीं कि संघको
हम अपने सम्मिलित होने योग्य न समझते हों; बल्कि इसलिये
कि उस दिव्य मन्दिरकी सीढियोंपर पैर रखनेके हम योग्य
परित्याग नहीं कर सकते; क्योंकि मानव-जातिके प्राचीन कार्यकलापके ये
ही तो वर्णन हैं। विशेष करके उन बातोंको छोड़ देनेका तो कोई कारण नहीं
है जो असंभव या अस्वाभाविक कोटिकी नहीं हैं और जो ऐसी घटनाएँ
है जो अन्य प्रकारसे भी प्रमाणित होती हैं। पुराणोंमें जो कुछ लिखा है वह
सब मिथ्या है जबतक उसकी सत्यता किसी विदेशी प्रमाणसे सिद्ध न हो,
यह जो कुछ लोगोंका ख्याल हो गया है वह बिलकुल वाहियात है। ठीक
रास्ता तो यह है कि इन पुराण ग्रन्थोंमें जो घटनाएँ वर्णित हैं उन्हें हम
सत्य मानें, वे सत्य ही हैं जबतक उनके विरुद्ध कोई ऐसा प्रमाण नहीं मिलता
जो पूर्ण विश्वसनीय हो। केवल किसीके तर्कके भरोसेपर पुराणोंकी बातें झूठ
कह देना कोई युक्तिसंगत बात नहीं है। भविष्य पुराणका ही उदाहरण
लीजिये, क्योंकि इसमें कुछ त्रुटियां और असम्भवसी बातें हैं। और क्या